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शिव का गृहपति अवतारः विश्वानर की पत्नी शुचचिष्मति के गर्भ से महादेव ने लिया अवतार

शिव का गृहपति अवतारः विश्वानर की पत्नी शुचचिष्मति के गर्भ से महादेव ने लिया अवतार

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नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था. वहां विश्वानर नाम के एक मुनि अपनी पत्नी शुचिष्मती के साथ निवास करते थे. वे परम पुण्यात्मा और बड़े शिवभक्त थे.

शुचिष्मती मातृत्व सुख प्राप्त नहीं कर पाई थीं. इससे दुखी शुचिष्मति ने विश्वानर से कहा- स्वामी आपके सान्निध्य में मैंने वे सभी सुख भोगे जिसकी एक स्त्री को पति से कामना रहती है. बस मातृत्व सुख अधूरा है.

विश्वानर भी संतानहीन होने से दुखी थे. शुचिष्मति ने कहा- मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं भोलेनाथ के समान एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दूं. आप तो इतने बड़े शिवभक्त हैं. आप शिवजी को प्रसन्न कर पुत्ररूप में आने का वरदान मांगे.

पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए विश्वनार काशी आ गए घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना करने लगे. उन्हें लगता था कि संभवतः स्वयं पिनाकी भगवान शुष्चिमती के जिह्वा पर विराजमान हो गए और ऐसी इच्छा व्यक्त की.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इसी विश्वास के साथ विश्वानर महादेव की आराधना करते रहे. विश्वानर को तप करते तेरह मास हुए. तेरहवें मास में जैसे ही वह एक दिन गंगास्नान के बाद शिवलिंग की पूजा के लिए पहुंचे तो उन्हें वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया.

उसके मस्तक पर पीली जटा चमक रही थी और मुखमंडल सूर्य की तरह प्रकाशित था. भस्म शृंगार से युक्त वह अलौकिक बालक श्रुतियों का पाठ कर रहा था. मुनि ने बालरूपधारी शिव की अभिलाषापूर्ण करने वाले आठ पदों से स्तुति की.

पूजा से प्रसन्न हो भगवान शिव ने विश्वानर से कहा- आप निश्चिंत होकर घर जाइए. मैं समय आने पर आपके घर में पुत्र रूप में आउंगा. मेरा नाम गृहपति होगा. मैं परम पावन तथा समस्त देवताओं को प्रिय होउंगा.

कालांतर में शुचिष्मति गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए. स्वयं पितामह ब्रह्मा ने दिव्य बालक का जातकर्म संस्कार किया बालक का नाम गृहपति रखा.

नवां वर्ष आने पर गृहपति को देखने देवर्षि नारद आए. उन्होंने कहा- मुनिवर आपका पुत्र परम भाग्यवान है किंतु मुझे आशंका है कि बारहवें वर्ष में इसपर बिजली और अग्नि का भय आएगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अपने पिता को चिंतित देखकर गृहपति ने पिता की आज्ञा लेकर शिव आराधना के लिए काशी जाने का निर्णय किया. काशी में वह प्रतिदिन एक सौ आठ कलशों से भगवान का अभिषेक और शिवमंत्र का जप करने लगे.

जन्म से बारहवें वर्ष आने पर इंद्र प्रकट होकर बोले- विप्रवर, अपनी इच्छानुसार वर मांग लें. गृहपति ने कहा- अहिल्या का सतीत्व नष्ट करने वाले से मुझे कुछ नहीं चाहिए. मैं महादेव के अतिरिक्त किसी से कोई वरदान नहीं चाहता.

गृहपति की बात से इंद्र क्रोधित हुए और वज्र से डराने लगे. गृहपति इससे मूर्च्छित हो गए. तत्काल महादेव प्रकट हुए और गृहपति से बोले- मेरे भक्त का इंद्र तो क्या यम भी नहीं कुछ बिगाड़ सकते.

इंद्र भय से कांपने लगे और उन्होंने महादेव से अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी. महादेव ने गृहपति को वरदान दिया- आज से मैं तुम्हें अग्निपद प्रदान करता हूं. तुम्हारे द्वारा स्थापित यह लिंग काशी में अग्निश्वर नाम से प्रसिद्ध होगा.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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