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शरशय्या पर भीष्म से द्रोपदी का कटुप्रश्न- भीष्म बोले, जैसा अन्न वैसा मनः उपयोगी कथा

शरशय्या पर भीष्म से द्रोपदी का कटुप्रश्न- भीष्म बोले, जैसा अन्न वैसा मनः उपयोगी कथा

Mahabharata-Bhishma-Pitamah
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भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े प्राण त्यागने के लिए शुक्लपक्ष के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे. भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर युधिष्ठिर उनसे प्रतिदिन नीति ज्ञान लेते थे. द्रौपदी कभी नहीं जाती थीं.

इससे भीष्म के मन में पीड़ा थी. श्रीकृष्ण ने भांप लिया था. उन्होंने युधिष्ठिर से कहा- अंतकाल की प्रतीक्षा में साधनारत पूर्वज से सपरिवार मिलना चाहिए. परिवार पत्नी के बिना पूर्ण नहीं है.

इशारा समझकर युधिष्ठिर जिद करके द्रौपदी को भी साथ ले गए. पितामह उन्हें नीति ज्ञान देने लगे. द्रौपदी कुंठित होकर चुपचाप सुन रही थी. अचानक द्रोपदी को हंसी आ गई.

भीष्म ने कहा- पुत्री तुम्हारे हंसने का कारण मैं जानता हूं. द्रोपदी सकुचाई को भीष्म ने कहा- पुत्री तुम अपने मन की दुविधा पूछ ही लो. मुझे शांति मिलेगी.

द्रोपदी ने कहा- स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भीष्म के समान नीति का ज्ञाता दूसरा कोई नहीं किंतु आपका ज्ञान कहां लुप्त हो गया था जब पुत्रवधू आपके सामने निवस्त्र की जा रही थी?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भीष्म ने कहा- इसी प्रश्न की प्रतीक्षा थी. जैसा अन्न वैसा मन. मैं दुर्योधन जैसे अधर्मी का अन्न खा रहा था. उस अन्न ने मेरी बुद्धि जड़ कर दी थी. सही निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो गई थी.

अन्न ही रक्त का कारक है. अर्जुन के बाणों ने मेरे शरीर से वह रक्त धीरे-धीरे करके निकाल दिया है. अब इस शरीर में सिर्फ गंगापुत्र भीष्म शेष है. सिर्फ माता का अंश है जो सबको निर्मल करती हैं. इसलिए मैं नीति की बातें कर पा रहा हूं.

भीष्म की बात को अटल सत्य समझिए. दुराचार से या किसी को सताकर कमाए गए धन से यदि आप परिवार का पालन करते हैं तो वह परिवार की बुद्धि भ्रष्ट करता है. उससे जो सुख है वह क्षणिक है किंतु लंबे समय में वह दुख का कारण बनता है.

यदि आपके सामने गलत तरीके से पैसा कमाकर भी कोई फल-फूल रहा है तो यह समझिए कि वे उसके पूर्वजन्म के संचित पुण्य हैं जिसे निगल रहा है. जैसे ही वे पुण्य कर्म समाप्त होंगे, उसके दुर्दिन आरंभ होंगे.

भागवत पुराण में कहा गया है- आपके कर्म कई अंश में बंटते हैं. सबसे बड़ा अंश आपकी संतान के अंश में आता है. तो आप अधर्म पर चलकर उसके लिए कांटे बो रहे हैं जिसे आपने अपने रक्त से पैदा किया है. विचारिएगा जरूर.

संकलन प संपादनः प्रभु शरणम्

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