भागवत कथाः मेनका की पुत्री शकुंतला से दुष्यंत का गंधर्व विवाह, शकुंतला को दुर्वासा का शाप और भरत की जन्म कथा

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ॠषि विश्वामित्र के घोर तप से इन्द्र को भय हुआ कि कहीं विश्वामित्र इंद्रासन ही न प्राप्त कर लें. इंद्र उनका तप भंग करने के लिए उपाय सोचने लगे. स्वर्ग की अप्सरा मेनका को इंद्र ने समझा-बुझाकर विश्वामित्र का तप भंग करने भेजा.
मेनका ने कामदेव और वसंत की सहायता से आखिरकार विश्वामित्र को रिझा ही लिया. विश्वामित्र की समाधि भंग हुई और वह मेनका के साथ गृहस्थ की तरह रहने लगे. मेनका ने समय आने पर सुन्दर कन्या को जन्म दिया.
स्वर्ग की अप्सरा को पृथ्वी पर क्यों मन लगता. वह तो तप भंग के लिए आई थी जो पूरा हुआ तो फिर उसका धरती पर रहने का कोई प्रयोजन बचा ही नहीं था.
विश्वामित्र तप के लिए कहीं और चले गए तो मेनका ने एक रात कन्या को विश्वामित्र के आश्रम में छोड़ा और चली गई. अकेली कन्या की शंकुल पक्षियों ने रक्षा की.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कण्व ऋषि वहां से गुजर रहे थे. उन्होंने कन्या को देखा तो उस पर उन्हें बड़ा प्रेम आया. वह उसे अपने साथ आश्रम लेकर आए और पिता के समान पालन-पोषण किया.
एक दिन उस प्रदेश का राजा दुष्यंत शिकार के लिए आए और भटकते-भटकते कण्व के आश्रम तक आ गए. वह कण्व के दर्शन के लिए आश्रम आए लेकिन कण्व नहीं थे.
शकुंतला उनके लिए जल लेकर आई. स्वर्ग की अप्सरा मेनका की पुत्री के रूप पर दुष्यंत रीझ गए. शकुंतला को भी उनमें प्रेम हो गया. दुष्यंत ने शकुंतला से विवाह का प्रस्ताव रखा.
दोनों ने कण्व ॠषि की अनुपस्थिति में गंधर्व विवाह कर लिया. कुछ समय तक शकुंतला के पास रूककर दुष्यंत यह वादा कर लौटे कि शकुंतला को जल्द ही सामाजिक रीति से ब्याह कर ले जाएंगे.
जाते समय राजा ने शकुंतला को अपनी अंगूठी देकर कहा कि इसे संभाल कर रखना इसे देखते ही मैं तुम्हें पहचान लूंगा. दुश्यंत राजधानी पहुंचकर राजकाज की उलझन में फंस गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इस बीच एक दिन दुर्वासा कण्व के आश्रम में आए और उन्होंने शकुंतला को पुकारा. दुष्यंत के ख्यालों में खोई शकंतुला को सुनाई न पड़ा. दुर्वासा ने कई बार पुकारा. क्रोधित होकर उन्होंने शाप दे दिया कि जिसके ख्यालों में हो वह तुम्हें भूल जाएगा.
शकुंतला ने ऋषि के पांव पकड़ लिए तो उन्होंने क्षमा करते हुए कहा कि यदि तुम उसकी कोई निशानी उसे दिखाओगी तो उसे तुम्हारा स्मरण आएगा और तुम्हें आदर-सत्कार के साथ अपने हृदय में रखेगा.
शकुंतला गर्भवती थी. उसनें गर्भावस्था के लक्षण दिखाई पड़ रहे थे लेकिन दुश्यंत नहीं आए. ॠषि कण्व और शकुंतला परेशान हो गए. उन्होंने सोचा कि शकुंतला को ही महल में भेज देते हैं.
राजा दुष्यंत की दी हुई अंगूठी के साथ कण्व ॠषि ने शकुंतला को एक नाव में बैठाकर राजा के पास भेज दिया. होनी को कुछ और ही मंजूर था. नदी पार करते समय शकुंतला की अंगूठी पानी में गिर गई और एक मछली ने उसे निगल लिया.
शकुंतला को इसका ध्यान ही न रहा. जब दुष्यंत के राजदरबार पहुंची तो शाप के प्रभाव से दुष्यंत को कुछ भी याद न आया. शकुंतला ने अनेक प्रसंग याद दिलाये लेकिन कोई लाभ न हुआ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तब शकुंतला ने राजा को उसने दी हुई अंगूठी की याद दिलायी और अपने उंगली से उसे निकालना चाहा. उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उस ने देखा कि अंगूठी तो खो गई है.
शकुंतला को वहां से निकाल दिया गया. शकुंतला ने गर्भ के शिशु को जन्म देने की ठान ली और जंगल में चल दी. समयानुसार उसने एक अतिसुंदर और स्वस्थ बालक को जन्म दिया. उसका नाम रखा भरत.
भरत जन्म से ही बहादुर था. सिंह जैसे भयानक हिंसक जानवरों से डरने के स्थान पर वह उनपर शासन करता. जानवर उसका आदेश मानते थे. वह शेरों की सवारी करता था.
उधर दुष्यंत के दरबार में एक दिन एक अजीब घटना घटी. एक मछुआरे के जाल में एक बडी सी मछली फॅंसी. उसने उस मछली को जब काटा तो मछली के पेट में से राजा की अंगूठी मिली जो शकुंतला के हाथ से गिर गई थी.
मछुआरा राजदरबार पहुँचा और उसने राजा को राजमुद्रिका दी. अपनी अंगूठी देखते ही राजा दुष्यंत को शकुंतला का स्मरण हुआ. दरबारियों से मालूम हुआ कि शकुंतला गर्भवती थी. वह दरबार आई थी फिर उसी अवस्था में जंगल की ओर चल पडी थी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजा ने शकुंतला की तलाश का आदेश दिया और सारा शासन शकुंतला की खोज में व्यस्त हो गया. खबर आई कि शकुंतला जैसी एक नारी अपने शिशु के साथ दूर के जंगल में रहती है. दुष्यंत उसे लाने के लिए चल पड़े.
जब दुष्यंत शकुंतला की कुटिया क़े पास पहुंचे तो उन्होंने एक छोटे बालक को शेर के पीठ पर सवार पाया. इसे देखकर राजा तो स्तंभित हो गए. फिर भरत शेर के बच्चे के मुंह में हाथ डालकर उसके दांत गिनने लगा. दुष्यंत बहुत देर तक सब देखते रहे.
दुष्यंत ने शकुंतला और भरत को लेकर राजधानी लौट आए. राजा दुष्यंत के पश्चात भरत राजा बने उन्होंने पिता के राज्य को एक विशाल देश में परिवर्तित कर चक्रवर्ती सम्राट बने. उनके नाम पर ही यह देश भारतवर्ष कहलाता है.
भरत के तीन पुत्र हुए लेकिन उन्होंने तीनों को ही अयोग्य पाया. उत्तम पुत्र की प्राप्ति के लिए मरूत्सोम यज्ञ किया जिससे मरूदगण प्रसन्न हुए और भरद्वाज नामक पुत्र प्रदान किया. जारी….
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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