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नलकूबर के शाप के भय से सीता को रावण ने महल के बजाय अशोक वाटिका में रखा- रामकथा में अशोक वाटिका प्रसंग

नलकूबर के शाप के भय से सीता को रावण ने महल के बजाय अशोक वाटिका में रखा- रामकथा में अशोक वाटिका प्रसंग


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एक प्रसंग आता है कि रावण ने यदि देवी सीता का अपहरण विवाह के लिए किया था तो फिर उन्हें अपने महल में रखने के बजाय अशोक वाटिका में क्यों रखा?

इससे जुड़ी एक कथा प्रचलित है. आज वही कथा आपके सामने रखता हूं.

रावण के नाना राक्षसराज सुमाली के बड़े भाई थे माल्यवान. माल्यवान की एक अपूर्व सुंदरी नतिनी थी जिसका नाम कुंभनिसी था.

वह रिश्ते में रावण की बहन लगती थी और लंका में ही रहती थी. दैत्यों में कुंभनिसी के रूप की बड़ी चर्चा थी.

एक बार रावण जल में प्रवेश कर घोर तपस्या कर रहा था, कुंभकर्ण गहरी निद्रा में था और मेघनाथ यज्ञ करने में व्यस्त था.

कुंभनिसी के हरण का सही समय जानकर मधु नामक परम बलशाली दैत्य ने लंका पर चढ़ाई की. उसने लंका पर हमला किया और कुंभनिसी को उठा ले गया.

जब रावण लौटा तो उसे सारी बात पता चली. उसने मेघनाद और कुंभकर्ण के साथ एक विशाल सेना ली और मधु के साथ युद्ध करने चल पड़ा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मधु के महल में रहते-रहते कुंभनिसी को उससे प्रेम हो गया. उसने मधु को पति स्वीकार लिया था. रावण ने चढ़ाई की तो कुंभनिसी को मधु के प्राणों का भय हुआ.

वह रावण के पास आई. उसने रावण से कहा कि मधु को वह अपना पति मान चुकी है इसलिए बहन के सुहाग की रक्षा करे. उसने मधु को क्षमा कर दिया.

रावण युद्ध के लिए तैयार हो निकला था. मधु के साथ युद्ध टल गया पर राक्षसी प्रवृति हिंसा के लिए उसका रही थी. उसकी युद्ध की बड़ी इच्छा हो रही थी.

रावण को विचार आया कि जब युद्ध की तैयारी हो चुकी है तो बिना युद्ध के लंका लौटने से बेहतर है कि इंद्र के साथ युद्ध कर लिया जाए. वह इंद्र से युद्ध करने चला.

रास्ते में रावण की सेना ने कैलाश पर पड़ाव डाला. रात में रावण की नींद अचानक किसी के पायल की आवाज से खुली.

उसने देखा कि स्वर्गलोक की अप्सरा रंभा बन संवरकर कुबेर की नगरी अलकापुरी की ओर जा रही है.

रावण उस पर रीझ गया और उससे अपने प्रेम का इजहार किया. रंभा ने कहा- आप मेरे पिता समान लगेंगे. आपके लिए ऐसी बात शोभा नहीं देती.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रावण ने रंभा से पूछा कि आखिर उसने उसे पिता क्यों कहा, तो रंभा बोली- मैं आपके बड़े भाई कुबेर के पुत्र नलकूबर से प्रेम करती हूं. अभी उनके पास ही जा रही हूं. इस नाते आप मेरे ससुर हुए सो आपको पिता कहा.

रावण ने कहा- अप्सराएं जब किसी की पत्नी ही नहीं होतीं तो ससुर का प्रश्न कहां से आया. राक्षस स्वभाव का परिचय देते हुए उसने रंभा के साथ व्याभिचार किया.

रंभा फूट-फूटकर रोने लगी. उसकी आवाज में इतनी करुणा थी कि उसे अलकापुरी तक सुना जा सकता था. नलकूबर आए. रंभा ने सारी बात बताई.

क्रोध से कांपते नलकूबर ने अपने सभी पुण्यों का आह्वान कर हाथ में जल लिया और रावण को शाप दिया- रंभा द्वारा ससुर कहे जाने के बाद भी रावण ने उसके साथ अनाचार किया.

मेरा शाप है कि आज के बाद यदि उसने किसी परस्त्री के साथ उसकी सहमति के बिना अनाचार की कोशिश की तो उसका सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा.

रावण ज्ञानी होने के बावजूद राक्षसी प्रवृति का होने के कारण स्त्रियों के मान की रक्षा नहीं करता था. इस शाप के बाद उसने स्त्रियों के साथ अनाचार करना छोड़ा.

रावण जब माता सीता को लंका ले आया और उनके अलौकिक सौंदर्य को देखकर आसक्त हो उठा तो मंदोदरी ने उसे शाप की बात याद दिलाई.

डर के कारण रावण ने देवी को महल की बजाय महल के सामने स्थित अशोक वाटिका में रखा जहां से वह उन्हें देख सके.

यह कथा रामायण के अलावा कई और स्थानों में देखने को मिलती है.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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