महादेव का श्रीकृष्ण को निर्देश, जृंभास्त्र चला मुझे निष्क्रिय कर पूरा करें मनोरथ, पार्वतीजी ने श्रीकृष्ण से मांग लिए बाणासुर के प्राणदानः भाग-3

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पिछली कथा से आगे…तीसरा भाग
भगवान शिव ने श्रीकृष्ण को बताया कि आप मुझपर जृंभास्त्र का प्रयोग करें. इसका मान रखने के लिए मुझे निद्रा घेर लेगी. इस तरह आप मुझे युद्ध में निष्क्रिय कर अपना मनोरथ पूरा कर सकते हैं.
भगवान श्रीकृष्ण ने महादेव की स्तुति की और उनके ही निर्देश पर भोलेनाथ पर जृंभास्त्र का प्रयोग किया. भोलेनाथ निद्रा से परे हैं किंतु हरिइच्छा में बाधक नहीं बनते इसलिए वह निद्रा में चले गए.
शिवजी के युद्धभूमि में शांत हो जाने के बाद श्रीकृष्ण पुनः बाणासुर पर टूट पड़े. बाणासुर भी अति क्रोध में आकर उनपर टूट पड़ा. अंत में श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र निकाला और बाणासुर की भुजाएं काटनी प्रारंभ कर दी.
एक एक करके उन्होंने बाणासुर की चार भुजाएं छोड़कर सारी भुजाएं काट दी. उन्होंने क्रोध में भरकर बाणासुर को मारने की ठान ली. वह बाणासुर का वध करने ही जा रहे थे कि पार्वतीजी स्वयं युद्धभूमि में आ गईं और उसके प्राण न लेने का अनुरोध किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
श्रीकृष्ण ने उनका सम्मान करते हुए बाणासुर को मारने का विचार त्याग दिया. श्रीकृष्ण बोले- माते, आपके इस भक्त ने मेरे पौत्र अनिरुद्ध को बंदी बना रखा है. इसलिए इसे दंड दिया जाना तो अनिर्वाय है.
पार्वतीजी ने कहा- मेरी ही प्रेरणा से उषा को अनिरूद्ध से प्रेम हुआ है. दोनों ने गंधर्व विवाह किया है. बाणासुर मेरा पुत्रवत है. उषा मेरी पौत्री हुई. इनके सांसारिक रीति से विवाह की आज्ञा मैं स्वयं दे रही हूं.
इसके बाद उन्होंने बाणासुर को अनिरुद्ध को मुक्त करने की आज्ञा दी. बाणासुर ने उनकी इच्छा का पालन करते हुए अनिरूद्ध को तत्काल मुक्त कर दिया और ख़ुशी ख़ुशी अपनी पुत्री का अनिरुद्ध से विवाह की सहमति दे दी.
अनिरूद्ध और उषा का विवाह धूमधाम से हुआ. उस विवाह में रुक्मिणी के भाई रूक्मी भी आए. भगवान श्रीकृष्ण ने रूक्मिणीजी से विवाह उनका हरण करके ही किया था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
रूक्मिणीजी ने श्रीकृष्ण को मन से पति स्वीकार लिया था. उन्होंने अपनी मंशा श्रीकृष्ण से प्रकट भी की थी. श्रीकृष्ण ने उन्हें पत्नी बनाने का वचन भी दिया था. किंतु रुक्मिणी के भाई रूक्मी की शिशुपाल से मित्रता थी.
इसलिए वह अपने मित्र के हत्यारे से अपनी बहन का विवाह नहीं करना चाहता था. उसने श्रीकृष्ण को स्वयंवर में निमंत्रण ही नहीं दिया. तो बलरामजी के साथ श्रीकृष्ण आए और रूक्मिणी का हरण कर लिया.
रूक्मी ने श्रीकृष्ण को अपने मित्र राजाओं की सहायता से घेर लिया और युद्ध किया. भगवान और बलरामजी ने सबको पराजित कर बंदी बना लिया. श्रीकृष्ण ने रूक्मि को पकड़ लिया और उसका वध ही करने वाले थे कि बलरामजी ने क्षमादान दिला दिया.
रूक्मी वीर था लेकिन प्राणदान धोर अपमान की बात थी. श्रीकृष्ण तो बहनोई हो गए इसलिए उसने उन्हें माफ कर दिया लेकिन श्रीकृष्ण से प्राणदान दिलाने के लिए मनुहार करते समय बलरामजी ने जो शब्द कहे थे वे रूक्मी को हमेशा स्मरण रहे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
रूक्मी जब भी बलरामजी के सामने पड़ता खुद को नीचा महसूस करता था. अनिरूद्ध के विवाह में सभी वीर राजागण आमंत्रित थे. रूक्मी के साथ बहुत से अन्य राजा भी आए जो श्रीकृष्ण से द्वेष रखते थे लेकिन उनके भय से कुछ बोल नहीं पाते थे.
रूक्मी के मन में बलरामजी के प्रति अपमान और प्रतिशोध की बात कलिंग नरेश को पता थी. उसने इसे उचित अवसर के रूप में देखा और रुक्मी को उसकाया कि तुम्हें बलराम के साथ आज अपमान का बदला लेने का मौका मिल सकता है.
रूक्मी यह सुनकर खुश हो गया और उसने कलिंग नरेश से इसका तरीका पूछा. कलिंगराज ने कहा- विवाह में चौपड़ खेलने की परंपरा है. बलराम वर के दादा हैं. यदि तुम उन्हें चौपड़ खेलने का निमंत्रण दो तो वह ठुकरा नहीं सकते.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
बलराम ग्वाल है. उसे राजाओं के संस्कार और उनके मनोरंजन के माध्यमों के बारे में क्या पता. उसने कभी चौपड़ देखा भी न होगा. इसलिए तुम उसे चौपड़ में पराजित करो और अपने अपमान का बदला लो.
रूक्मी को यह बात जंच गई. उसे लगा कि यह सही अवसर है किंतु बलराम का अपमान करने की मंशा से चले रूक्मी के प्राण उसी मंडप में चले गए. ऐसा क्यों हुआ. पढ़िए अगले पोस्ट में कुछ ही देर में.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली