जीवितपुत्रिका व्रत जीतिया की कथा, पूजा विधिः चिल्हो सियारो व जीमूतवाहन की कथा
जीवितपुत्रिका व्रत जीतिया की कथा, पूजा विधि, नियम और पारण समय
सनातन धर्म में संतानों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और मंगलमय जीवन के लिए जीवितपुत्रिका व्रत (जिसे जितिया या जिउतिया व्रत भी कहते हैं) का विशेष महत्व है. आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह निर्जला व्रत माताएं अपनी संतानों के कल्याण के लिए रखती हैं. आइए जानते हैं जीवितपुत्रिका व्रत जीतिया की कथा, पूजा विधि, नियम और पारण से जुड़ी संपूर्ण जानकारी.
जीवितपुत्रिका व्रत जीतिया की इस पोस्ट में आप जानेंगेः
- जीवितपुत्रिका व्रत जीतिया की पूजा की विधि और नियम
- जीवितपुत्रिका व्रत जीतिया के पारण और पानी पीने के नियम
- जीवितपुत्रिका व्रत जीतिया की राजा जीमूतवाहन की कहानी
- जीवितपुत्रिका व्रत जीतिया की चिल्हो सियारिन की प्रचलित कथा

जीवितपुत्रिका व्रत में किस भगवान की मुख्य रूप से पूजा होती है?
जितिया व्रत के दौरान मुख्य रूप से भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश के साथ-साथ इस व्रत के मुख्य नायक गन्धर्व राजकुमार जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। इसके अलावा, इस व्रत की कथा में चील (चिल्हो) और सियारिन (सियारो) की कथा का भी विशेष महत्व है।
जीवितपुत्रिका व्रत की पूजा विधि और नियम
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स्नान और संकल्प: व्रत के पहले दिन (नहाय-खाय के दिन) स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके व्रत का संकल्प लिया जाता है।
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पूजा सामग्री: पूजा के दौरान कुशा से बनी जीमूतवाहन की मूर्ति, गाय के गोबर से बनी चील और सियारिन की आकृति बनाई जाती है।
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भोग और आरती: प्रदोष काल में भगवान शिव, माता पार्वती और जीमूतवाहन को फल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद जीवितपुत्रिका व्रत जीतिया की कथा सुनें या पढ़ें।
पानी कब पिया जाता है और व्रत के नियम
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यह व्रत मुख्य रूप से निर्जला (बिना जल के) रखा जाता है। सप्तमी तिथि (नहाय-खाय) के दिन भोजन के बाद अष्टमी व्रत के समापन तक अन्न और जल का त्याग किया जाता है।
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व्रत के नियमों के अनुसार माताएं अपनी संतान की आयु और आरोग्यता के लिए यह कठिन उपवास रखती हैं। बीच में जल या अन्न ग्रहण करना वर्जित माना गया है।
व्रत का पारण (Paran Time)
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जीवितपुत्रिका व्रत का पारण दूसरे दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के पश्चात नवमी तिथि को किया जाता है।
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सूर्योदय के बाद और नियत समय पर स्नान करके ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करके व्रत खोला जाता है। पारण में पारंपरिक चीजें (जैसे मड़वा की रोटी, नोनी का साग आदि) खाने का विशेष विधान है।
जीवितपुत्रिका व्रत जीतिया की कथाः जीमूतवाहन की कहानी

गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था. वे बडे उदार और परोपकारी थे. जीमूतवाहन के पिता ने वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम में जाते समय इनको राजसिंहासन पर बैठाया किन्तु इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था. वह राज्य का भार अपने भाइयों पर छोडकर स्वयं वन में पिता की सेवा करने चले गए. वन में ही जीमूतवाहन की मलयवती नामक राजकन्या से भेंट हुई और दोनों में प्रेम हो गया.
एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी आगे चले गए, तब उन्हें एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखी.
पूछने पर वृद्धा ने रोते हुए बताया- मैं नागवंश की स्त्री हूं. मुझे एक ही पुत्र है. पक्षीराज गरुड के कोप से मुक्ति दिलाने के लिए नागों ने यह व्यवस्था की है वे गरूड को प्रतिदिन भक्षण हेतु एक युवा नाग सौंपते हैं.
आज मेरे पुत्र शंखचूड की बलि का दिन है. आज मेरे पुत्र के जीवन पर संकट है और थोड़ी देर बाद ही मैं पुत्रविहीन हो जाउंगी. एक स्त्री के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि उसके जीते जी उसका पुत्र न रहे.
जीमूतवाहन को यह सुनकर बड़ा दुख हुआ.
उन्होंने उस वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा- डरो मत. मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूंगा. आज उसके स्थान पर स्वयं मैं अपने आपको उसके लाल कपडे में ढंककर वध्य-शिला पर लेटूंगा ताकि गरूड मुझे खा जाए पर तुम्हारा पुत्र बच जाए.
इतना कहकर जीमूतवाहन ने शंखचूड के हाथ से लाल कपड़ा ले लिया और उसे लपेटकर गरुड को बलि देने के लिए चुनी गई वध्य-शिला पर लेट गए.
नियत समय पर गरुड़ बडे़ वेग से आए. लाल कपडे में ढंके जीमूतवाहन को पंजे में दबोचकर पहाड़ के शिखर पर जाकर बैठ गए. गरूड़ ने अपनी कठोर चोंच का प्रहार किया और जीमूतवाहन के शरीर से मांस का बड़ा हिस्सा नोच लिया. इसकी पीड़ा से जीमूतवाहन की आंखों से आंसू बह निकले और वह दर्द से कराहने लगे.
अपने पंजे में जकड़े प्राणी की आंखों में से आंसू और मुंह से कराह सुनकर गरुड़ बडे आश्चर्य में पड गए क्योंकि ऐसा पहले कभी न हुआ था. उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा.
जीमूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया कि कैसे एक स्त्री के पुत्र की रक्षा के लिए वह अपने प्राण देने आए हैं. आप मुझे खाकर भूख शांत करें.
गरुड़ उनकी बहादुरी और दूसरे की प्राणरक्षा के लिए स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से बहुत प्रभावित हुए. गरूड़ को अपने निष्ठुर आचरण पर पछतावा होने लगा. वह सोचने लगे कि एक यह मनुष्य है जो दूसरे के पुत्र की रक्षा के लिए स्वयं की बलि दे रहा है. एक मैं हूं जो देवों के संरक्षण में हूं किंतू दूसरों की संतान की बलि ले रहा हूं. उन्होंने जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया.
गरूड़ ने कहा- हे उत्तम मनुष्य मैं तुम्हारी भावना और त्याग से बहुत प्रसन्न हूं. मैंने तुम्हारे शरीर पर जो घाव किए हैं उसे ठीक कर देता हूं. तुम अपनी प्रसन्नता के लिए मुझसे कोई वरदान मांग लो.
राजा जीमूतवाहन ने कहा- हे पक्षीराज आप तो सर्वसमर्थ हैं. यदि आप प्रसन्न हैं और वरदान देना चाहते हैं तो आप सर्पों को अपना आहार बनाना छोड़ दें. आपने अब तक जितने भी प्राण लिए हैं उन्हें जीवन प्रदान करें.
गरुड़ ने सबको जीवनदान दे दिया तथा नागों की बलि न लेने का वरदान भी दिया. इस प्रकार जीमूतवाहन के साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई.
गरूड़ ने कहा- तुम्हारी जैसी इच्छा वैसा ही होगा. हे राजा! जो स्त्री तुम्हारे इस बलिदान की कथा सुनेगी और विधिपूर्वक व्रत का पालन करेगी उसकी संतान मृत्यु के मुख से भी निकल आएगी. तब से ही पुत्र की रक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा शुरू हो गई.
यह कथा कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर ने माता पार्वती को सुनाई थी. जीवित पुत्रिका के दिन भगवान श्रीगणेश, माता पार्वती और शिवजी की पूजा एवं ध्यान के बाद ऊपर बताई गई व्रत कथा भी सुननी चाहिए. इसकी पूजा शिवजी को प्रिय प्रदोषकाल में करनी चाहिए. व्रत का पारण दूसरे दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के पश्चात किया जाता है.
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जीवितपुत्रिका व्रत जितिया से जुड़ी चिल्हो और सियारिन की कथा। Chilho Siyarin Story

एक वन में सेमर के पेड़ पर एक चील रहती थी. पास की झाडी में एक सियारिन भी रहती थी. दोनों में खूब पटती थी. चिल्हो जो कुछ भी खाने को लेकर आती उसमें से सियारिन के लिए जरूर हिस्सा रखती.सियारिन भी चिल्हो का ऐसा ही ध्यान रखती. इस तरह दोनों के जीवन आनंद से कट रहे थे.
एक् बार वन के पास गांव में औरतें जिउतीया के पूजा की तैयारी कर रही थी. चिल्हो ने उसे बडे ध्यान से देखा और अपनी सखी सियारो को भी बताओ. फिर चिल्हो-सियारो ने तय किया कि वे भी यह व्रत करेंगी.
सियारो और चिल्हो ने जीवितपुत्रिका व्रत जितिया रखा. बडी निष्ठा और लगन से दोनों दिनभर भूखे-प्यासे मंगल कामना करत व्रत में रही मगर रात होते ही सियारिन को भूख प्यास सताने लगी.
जब बर्दाश्त न हुआ तो जंगल में जाके उसने मांस और हड्डी पेट भरकर खाया. चिल्हो ने हड्डी चबाने के कड़-कड़ की आवाज सुनी तो पूछा कि यह कैसी आवाज है.
सियारिन ने कह दिया- बहन भूख के मारे पेट गुड़गुड़ा रहा है यह उसी की आवाज है. मगर चिल्हो को पता चल गया.
उसने सियारिन को खूब लताडा कि जब व्रत नहीं हो सकता तो संकल्प क्यों लिया था! सियारीन लजा गई पर व्रत भंग हो चुका था. चिल्हो रात भर भूखे प्यासे रहकर व्रत पूरा की. अगले जन्म में दोनों मनुष्य रूप में राजकुमारी बनकर सगी बहनें हुईं.
सियारिन बड़ी बहन हुई और उसकी शादी एक राजकुमार से हुई. चिल्हो छोटी बहन हुई उसकी शादी उसी राज्य के मंत्रीपुत्र से हुई.
बाद में दोनों राजा और मंत्री बने. सियारिन रानी के जो भी बच्चे होते वे मर जाते जबकि चिल्हो के बच्चे स्वस्थ और हट्टे-कट्टे रहते. इससे उसे जलन होती.
उसने कभी उनका सर कटवाकर डब्बे में बंद करा दिया पर वह शीश मिठाई बन जाती और बच्चों का बाल तक बांका न होता. बार-बार उसने अपनी बहन के बच्चों और उसके पति को मारने का प्रयास भी किया पर सफल न हुई. आखिरकार दैवयोग से उसे भूल का आभास हुआ.
उसने क्षमा मांगी और बहन के बताने पर जीवित पुत्रिका व्रत विधि विधान से किया तो उसके पुत्र भी जीवित रहे.
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