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दशरथ और शनि में संघर्ष, राजा के पराक्रम से प्रसन्न शनि ने की अयोध्या पर कृपा. राजा दशरथ द्वारा शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनिस्तोत्र रचने की कथा

दशरथ और शनि में संघर्ष, राजा के पराक्रम से प्रसन्न शनि ने की अयोध्या पर कृपा. राजा दशरथ द्वारा शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनिस्तोत्र रचने की कथा

shani-3एकबार नारदजी ने राजा दशरथ को बताया कि रोहिणी पर शनि दृष्टि के कारण सूखा पड़ा है. प्रजा त्रस्त है इसलिए आप आनंद छोडकर प्रजा के संकट का समाधान करें.

दशरथ राज्य भ्रमण को निकले. एक सरोवर के पास पहुंचे. एक पेड़ पर उन्होंने दो तोतों को बात करते सुना. तोता अपने साथी से कह रहा था-

हम सात पुश्तों से यहां रह रहे हैं लेकिन अब अयोध्या छोड़ने में भला है. भीषण सूखा पड़ने वाला है लेकिन राजा दशरथ अपनी रानियों के साथ ऐशो-आराम में मगन है.

पहले नारद और फिर शुक से ऐसी बात सुनकर दशरथ चिंतित हुए. वह सीधे इंद्र के दरबार में पहुंचे और उन्हें युद्ध के लिए ललकारा. देवों ने दशरथ को शांत कराया.

दशरथ ने कहा- सारे मेघ इंद्र के अधीन हैं लेकिन वे अयोध्या पर नहीं बरस रहे. सूखे से प्रजा त्रस्त है. इंद्र ने दशरथ को बताया कि ऐसा रोहिणी नक्षत्र पर शनि की दृष्टि के कारण हो रहा है.

इंद्र बोले- आप देवों के मित्र हैं. मैं आपका अहित क्यों चाहूंगा. आप शनि को कहें कि रोहिणी पर से अपनी दृष्टि हटा ले, तभी बारिश होगी.

दशरथ रथ पर सवार होकर शनि के पास पहुंचे. शनि ने क्रोधभरी दृष्टि से दशरथ को देखा तो उनके रथ के पहिए टूट गए. वह घोड़े समेत धरती पर गिरने लगे.

गरुड़पुत्र जटायु ने अपने पंख फैलाकर दशरथ को सहारा दे दिया. इस तरह उनकी प्राण रक्षा हुई. इस तरह दशरथ और जटायु में मित्रता हुई. दशरथ ने फिर से रथ बनाया और शनि को चुनौती देने पहुंचे

शनि को बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनकी क्रोधदृष्टि को झेलकर कोई इंसान फिर से उन्हें चुनौती देने कैसे आ गया है. शनि समझ गए कि यह कोई पुण्यात्मा और तेजस्वी मानव है. इस पर क्रोध नहीं करना चाहिए.

शनिदेव ने राजा दशरथ को शनिकोप का प्रभाव सुनाया कि कैसे उनकी कोपदृष्टि के कारण गणेशजी को मस्तकविहीन होना पड़ा. फिर शनिदेव ने दशरथ से कहा कि वह रोहिणी पर से आंशिक दृष्टि हटा लेंगे.

राजा दशरथ ने शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनि स्तोत्र की रचना की और प्रजा को उसका पाठ करके शनिदेव को प्रसन्न करने को कहा. इस तरह शनि की कुदृष्टि हटी.

राजा दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ शनिदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए करना चाहिए. गणेशजी के शीशविहीन होने को लेकर पुराणों में कई मान्यताएं हैं. एक मान्यता शनिदृष्टि वाली भी है.

सत्य क्या है यह तो गजानन ही जानें. हम तो बस आपके सामने वे प्रसंग रख देते हैं ताकि आप उनका रस ले सकें. आज हम शनिदृष्टि के कारण गणेशजी के शीसविहीन होने का प्रसंग भी देंगे.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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