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भागवत कथाः ब्रह्मा ने चुरा लिया गोकुल के सारे ग्वाल और बछड़े, स्वयं नंदलाल बन गए गोकुल के सब ग्वाल-बाल

भागवत कथाः ब्रह्मा ने चुरा लिया गोकुल के सारे ग्वाल और बछड़े, स्वयं नंदलाल बन गए गोकुल के सब ग्वाल-बाल

krishna
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भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन में असुरों का उद्धार कर रहे थे. सभी देवगण प्रभु की लीला का रसपान कर रहे थे. भगवान की लीलाओं को देख ब्रह्माजी मुग्ध थे लेकिन तृप्ति न होती थी. उन्होंने भगवान की लीला की परीक्षा का रस लेने का मन बनाया.

एक दिन श्रीकृष्ण बाल-ग्वालों के साथ गाय चराते-चराते यमुना के बलुआही छोर यानी पुलिन पर पहुंचे. ब्रह्माजी ने अपनी माया से उसे अलौकिक सुंदर बना दिया. ग्वाल-बाल तो उस स्थान को देखकर उमंग से झूमने लगे.

इस रमणीय पुलिन पर भोजन का निर्णय हुआ क्योंकि दिन बहुत चढ़ गया था और सभी भूख से पीडि़त हो रहे थे. बछड़े पानी पीकर समीप ही धीरे-धीरे हरी-हरी घास चरने लगे. सभी बैठकर भोजन करने लगे.

ब्रह्माजी ने अपनी माया से बछड़ों को सुंदर और ज्यादा हरी-हरी घास दिखाई और उन्हें फुसलाकर दूर खींचने लगे. ग्वालबालों का ध्यान उस ओर गया. तो वे बछड़े गायब हो जाने के भय से भयभीत हो गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.श्रीकृष्ण ने कहा कि घबराने की बात नहीं. तुम लोग भोजन करो मैं क्षणभर में बछड़ों को हांककर वापस लिए आता हूं. उनको वहीं छोड़ स्वयं बछड़ों को लेने वन में चले गए. प्रभु के वन में जाते ही ब्रह्माजी ने अपनी लीला दिखा दी.

उन्होंने गौधन को अदृश्य कर ही दिया. ढूंढने पर भी जब गोधन नजर नहीं आया तो तो कृष्ण वापस लौट आए. उन्होंने देखा कि पुलिन पर बैठकर भोजन कर रहे उनके साथी ग्वाल-बाल भी वहां नहीं हैं.

उन्होंने चारों ओर ढूंढा, परन्तु जब न तो ग्वालबाल और न ही बछड़े, उन्हें कोई नहीं मिला. श्रीकृष्ण जान गए कि यह सब ब्रह्माजी की ही माया है. ब्रह्माजी ने उन्हें अचेत करके ब्रह्मलोक में छिपा दिया था.

अब गांव में जाएं तो सभी पूछेंगे कि कहां गए उनके बच्चे, कहां गया पशुधन! भगवान ने स्वयं बछड़ों तथा उन बाल-ग्वालों का रूप बना लिया और वृंदावन चले. स्वयं बलराम जी को भी इसका आभास तक नहीं हुआ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वृंदावन पहुंचे तो माताओं का आज अपने बालकों पर स्नेह पहले से ज्यादा उमड़ने लगा. गाएं अपने बछड़ों को एक पल भी अलग नहीं करना चाहतीं. छोटी-छोटी शरारतों पर बालकों के लिए लठ्ठ उठाने वाले पिता बच्चों की शरारतों पर रस लेते.

वृंदावन का तो हाल ही बदल चुका था. कण-कण में प्रेम रस घुला था. वृक्ष लताएं स्वयं झुकने लगतीं कि कोई बछड़ा उन्हें खा ले. इस तरह एक वर्ष का समय बीत गया. एक दिन श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ बछड़ों को चराते वन में गए.

उसी समय ब्रह्माजी बह्मलोक से वृंदावन में लौट आए. इस बीच ब्रह्मा की अवधि का केवल एक त्रुटि यानी सूई से कमल के पत्ते में छेद करने में लगने वाला समय व्यतीत हुआ था. किंतु पृथ्वी पर तो एक वर्ष में कुछ दिन ही शेष थे.

ब्रह्माजी ने देखा कि जिन बछड़ों तथा बाल-ग्वालों को उन्होंने हरके छुपा दिया वे सब तो जस के तस गोकुल में उपस्थित हैं. ब्रह्माजी चक्कर में पड़े कि कहीं ऐसा तो नहीं श्रीहरि ने अपनी माया से उन्हें वापस ले लिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उन्होने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो पता चला कि सभी बछड़ों तथा बाल-ग्वालों में तो स्वयं कृष्ण विराजमान हैं. यह देखकर ब्रह्माजी चकित रह गए. उन्हें अपने कार्य के लिए थोड़ी ग्लानि भी हुई.

ब्रह्माजी श्रीकृष्ण के पास गए और उनकी स्तुति करने लगे. तब भगवान श्रीकृष्ण ने भी उन्हें अभिवादन पूर्वक सम्मान दिया. ब्रह्माजी ने बछड़ों तथा बाल-ग्वालों को तुरंत वापस सौंप दिया. गोकुलवासियों को उनकी संतानें और गोधन प्राप्त हो गए थे.

प्रभु की माया से किसी को तनिक भी आभास नहीं हुआ. वास्तव में जब श्रीकृष्ण का अन्नप्राशन संस्कार हो रहा था तो सभी गोकुल के लोगों और गायों के मन में स्नेह उमड़ा. सब श्रीकृष्ण को पुत्र रूप में स्नेह देने की कामना करने लगे.

साक्षात ईश्वर के सामने कोई प्रार्थना हो तो वह उसकी अनदेखी कैसे कर सकते हैं. उन्होंने सबकी प्रार्थना स्वीकार की. इस तरह उन्होंने करीब एक वर्ष तक सबकी संतान के रूप में समय बिताया और उनकी अभिलाषा भी पूरी कर दी.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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