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भागवत कथाः श्रीकृष्ण ने कालियामान मर्दन करके किया यमुनाजी का उद्धार

भागवत कथाः श्रीकृष्ण ने कालियामान मर्दन करके किया यमुनाजी का उद्धार

krishan kaliya
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भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावन में लीलाएं करते पतितों का उद्धार और ग्वाल बालों का मनोरंजन करते रहे. एक दिन सखा संग यमुना के तट पर गए. उस दिन किसी कारणवश बलरामजी साथ नहीं थे.

धूप के कारण सभी गर्मी से बेहाल थे. प्यास से कण्ठ सुखने लगा. सामने युमनाजी बह रही थीं. ग्वाल बालों और पशुओं ने यमुनाजी का जल पी लिया. प्यास इतनी तेज थी कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि नंदबाबा ने इसका जल पीने से मना किया है.

वास्तव में युमनाजी में कालिया नामक एक विषधर रहता था जिसने सारा जल विषैला कर दिया था. इस कारण गौएं और ग्वाले प्राणहीन होकर यमुना तट पर पड़े थे. भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी दृष्टि से पुनःजीवित कर दिया.

सबको चेतना लौटी थी तो भूल का अहसास हुआ. भगवान युमनाजी के तट पर लीलाएं कर रहे थे लेकिन कभी उनका जल नहीं पीते थे, यमुनाजी के लिए तो यह पीड़ा असह्य थी. वह उद्धार की प्रतीक्षा कर रही थीं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.प्रभु ने सोचा चलो आज यह कार्य भी कर देते हैं. उनहोंने यमुनाजी में उतरने की ठानी. कालिया यमुना में एक कुण्ड कालियदह में रहता था. उसके विष का ऐसा प्रभाव था कि उसके कारण जल खौलता रहता था.

उस कुंड के समीप नदी के ऊपर से उड़ने वाले पक्षी तक झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे. उसके विषैले जल की का स्पर्श करके चलने वाली वायु जिन वृक्ष लताओं को छूती वे भी जल जाती थीं.

भगवान ने अपनी कमर कसी और एक बहुत ऊंचे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गए और फिर वहां से ताल ठोंककर विषैले जल में कूद पड़े. यमुनाजी तो प्रभु के स्पर्श से पुलकित और निर्मल हो गईं.

उनका जल सांप के विश के कारण पहले से ही खौल रहा था. उसकी तरंगें लाल-पीली और अत्यन्त भयंकर उठ रही थीं. श्रीकृष्ण के कूद पडऩे से वह और भी उछाल मारने लगीं. कालियदह का जल इधर-उधर उछलकर चार सौ हाथ तक फैल गया.

तट पर खड़े ग्वालबाल चिल्लाने लगे. उन्हें भयंकर विष से भरे जल में कूदे अपने कान्हा की चिंता हो रही थी. ग्वालबालों की दशा ऐसी हो गई जैसे दोबारा उनके प्राण छीन लिए गए हों.

श्रीकृष्ण कालियदह में कूदकर मतवाले गजराज के समान जल उछालने लगे. कालिया नाग ने वह आवाज सुनी और देखा कि कोई उसको चुनौती दे रहा है तो वह क्रोध से जलने लगा. वह क्रोध में भरा श्रीकृष्ण के सामने आ गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.चुनौती देने वाले के रूप में एक बालक को देखा तो उसे क्रोध और आश्चर्य दोनों हुआ. उसने श्री कृ्ष्ण को मर्मस्थानों में डंसकर अपने शरीर के बन्धन से उन्हें जकड़ लिया. भगवान् श्रीकृष्ण नागपाश में बंधकर बेहोश हो गए.

यह देखकर साथी ग्वालबाल बहुत दुखई हुए और दु:ख, पश्चाताप और भय से हताश होकर पृथ्वी पर गिर पड़े. गाय, बैल, बछिया और बछड़े बड़े दु:ख से डकराने लगे. श्रीकृष्ण की ओर ही उनकी टकटकी बंध रही थी.

कुछ तट पर खड़े रहे, कुछ ग्वालबाल गांव की ओर दौड़ पड़े. नंदबाबा को बुलाओ, बलराम को बुलाओ की पुकार मचने लगी. समाचार मिलते ही व्रजवासी भी यमुना तट पर दौड़ आए. कान्हा को कालिया नाग के चंगुल में देख उनके प्राण सूख गए.

नंदबाबा के साथ माता यशोदा भी आईँ. अपने पुत्र को साक्षात काल जैसे कालिया नाग के चंगुल में देखा तो उनसे रहा न गया. वह जोर-जोर से विलाप करती नदी में कूदने भागीं लेकिन गोपियों ने उन्हें बलपूर्वक पकड लिया.

भगवान ने देखा कि पूरा व्रजलोक विलाप कर रहा है तो उन्होंने अपना शरीर खूब फुलाना शुरू किया. उसके दबाव में कालिया ने उन्हें अपने पाश से मुक्त कर दिया. कालिया का शरीर दर्द से टूटने लगा.

उसके एक सौ एक सिर थे. उसने अपना फन काढ़ा और फुंफकार कर विष वर्षा करने लगा. वह श्रीकृष्ण पर पैंतरे बदल-बदलकर आघात करता. कन्हैया उछलकर निकल जाते. प्रभु के लिए ठिठोली थी लेकिन कालिया के लिए दर्द असह्य हो गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वह अब अग्नि बरसाने लगा. उधर यमुना तट पर गोकुलवासी समस्त देवताओं का आह्वान करने लगे. कालिया अपने जिस शरीर को नहीं झुकाता था. भगवान उस पर सवार हो गए और अपने पैरों की चोट से कुचलने लगे.

कालिया नाग की जीवनशक्ति क्षीण हो चली. वह मुंह और नथुनों से खून उगलने लगा. प्रभु के आघात से अन्त में चक्कर काटते-काटते वह बेसुध हो गया. अपने पति की यह दशा देखकर उसकी पत्नियां भगवान् की शरण में आयीं.

वह श्रीकृष्ण से अपने पति के प्राणों की याचना करने लगीं. वे बोलीं- प्रभु आप तो दयानिधान हैं. ये मूढ हैं, आपको पहचानते नहीं, इसलिए इन्हें क्षमा कर दीजिए. भगवन कृपा कीजिए. इनको जीवनदान दें प्रभु. हम नाग आपके सदा सेवक रहेंगे.

दुष्ट कालिया की पत्नियों की याचना से भगवान पिघल गए. उन्होंने कालिया को मृत्युदण्ड देने का विचार त्याग दिया. भगवान के प्रहारों से आहत कालिया का दंभ भी टूट चुका था.

प्रभु ने उस पर दृष्टि डाली तो धीरे-धीरे कालिया की इन्द्रियों और प्राणों में कुछ-कुछ चेतना आ गई. वह बड़ी कठिनता से श्वास लेने लगा. सचेत होने पर बड़ी दीनता से हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्ण से क्षमायाचना करने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उसने कहा- हे प्रभु हम जन्म और स्वभाव से ही तमोगुणी और बहुत दिनों के बाद भी बदला लेने वाले-बड़े क्रोधी जीव हैं. जीवों के लिए अपना स्वभाव छोड़ देना बहुत कठिन है. इसी कारण संसार के लोग नाना प्रकार के दुराग्रहों में फंस जाते हैं.

आप सर्वज्ञ और सम्पूर्ण संसार के स्वामी हैं. हम सर्पों और विषधरों को जो स्वभाव मिला है वह आपकी माया ही है. अब आप अपनी इच्छा से, जैसा उचित समझें, करें. आप कृपा करें या दण्ड दें, मेरे लिए तो दोनों में कल्याण है. सहर्ष स्वीकार है.

प्रभु ने उसे यमुना का त्याग करने का आदेश दिया और एक अन्यत्र सुरक्षित स्थान दे दिया. कालिया नाग कौन था. वह यमुना में क्यों रहता था. प्रभु ने उसे कौन सा स्थान दिया. यह सब प्रसंग आपको कल सुनाएंगे.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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