आदित्य हृदय स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित | Aditya Hriday Stotram in Hindi, लाभ और नियम
आदित्य हृदय स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित: पाठ के लाभ, विधि और नियम
आदित्य हृदय स्तोत्रः ऋषि अगस्त्य ने दिया था श्रीराम को यह शक्तिशाली स्तोत्र
सनातन धर्म में भगवान सूर्य की उपासना आरोग्यता, तेज, सफलता और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। सूर्य की उपासना में आदित्य हृदय स्तोत्र का विशेष रूप से महत्त्व है।
राम-रावण युद्ध जब निर्णायक मोड़ पर था, तब मायावी शक्तियों का प्रयोग कर रावण वानर सेना को डराकर उसका मनोबल तोड़ने लगा। भगवान श्रीराम इससे चिंतित थे।
देवताओं के संग आकाश से युद्ध देख रहे अगस्त्य मुनि श्रीराम के पास आए। उन्होंने कहा कि आसुरी शक्तियां प्रकाश से क्षीण पड़ती हैं। प्रकाश और ऊर्जा के अक्षय स्रोत भगवान सूर्य की आराधना कीजिए ताकि वह अपने तेज से शत्रुओं के मन में भय पैदा करें।
भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए अगस्त्य मुनि ने प्रभु श्रीराम को अत्यंत गोपनीय और कल्याणकारी आदित्य हृदय स्तोत्र दिया जो शत्रुओं के हृदय में भय पैदा करता है।
आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से करते रहने से हृदय रोग में, मिर्गी, ब्लड प्रेशर और मानसिक रोगों में लाभ मिलता है। इसके पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता और आत्मविश्वास में जबरदस्त वृद्धि होती है।
आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ का आरंभ शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से करना शुभ माना गया है।
आदित्य हृदय स्तोत्र: विनियोग और न्यास

विनियोग
ॐ अस्य आदित्य हृदय स्तोत्रस्य अगस्त्य ऋषिः अनुष्टुपछन्दः, आदित्य हृदयभूतो भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ता शेषविघ्नतया ब्रह्मविद्या सिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास (प्रत्येक श्लोक के साथ बताए गए अंगों को स्पर्श करें)
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ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि (सिर को स्पर्श करें)।
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अनुष्टुपछन्दसे नमः, मुखे (मुख को स्पर्श करें)।
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आदित्य हृदयभूत ब्रह्म देवतायै नमः हृदि (हृदय को स्पर्श करें)।
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ॐ बीजाय नमः गुह्यो (नितंबों को स्पर्श करें)।
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रश्मिमते शक्तये नमः पादयो (पैरों को स्पर्श करें)।
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ॐ तत्सविर्तु आदित्य गायत्री कीलकाय नमः नाभौ (नाभि स्पर्श करें)।
करन्यास (प्रत्येक श्लोक के साथ बताए गए अंगों को स्पर्श करें)
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ॐ रश्मिमते अंगुष्ठाभ्यां नमः (तर्जनी से अंगूठे को स्पर्श करें)।
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ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः (अंगूठे से तर्जनी को स्पर्श करें)।
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ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः (अंगूठे से मध्यमा को स्पर्श करें)।
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ॐ विवस्वते अनामिकाभ्यां नमः (अंगूठे से अनामिका को स्पर्श करें)।
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ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः (अंगूठे से छोटी अंगुली को स्पर्श करें)।
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ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः (दोनों हथेलियों को स्पर्श करें)।
हृदयादि अंगन्यास (प्रत्येक श्लोक के साथ बताए गए अंगों को स्पर्श करें)
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ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः (हृदय को स्पर्श करें)।
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ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा (सिर को स्पर्श करें)।
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ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट् (मस्तक के मध्य की शिखा को स्पर्श करें)।
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ॐ विवस्वते कवचाय हुम् (बाएं हाथ से दाहिना कंधा और दाहिने हाथ से बायां कंधा स्पर्श करें)।
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ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट् (तर्जनी से दायीं आंख, अनामिका से बायीं आंख और मध्यमा से दोनों आंखों के मध्य त्रिनेत्रस्थल को स्पर्श करें)।
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ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट् (दोनों कंधों को झटका देकर सावधान की मुद्रा लें)।
इस प्रकार संपूर्ण इन्द्रियों का न्यास करके नीचे लिखे मंत्र से भगवान सूर्य का ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिए—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
आदित्य हृदय स्तोत्र (मूल पाठ और हिंदी अर्थ)
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम्।।1।।
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अर्थ: श्री रामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले।
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुम् अभ्यागतो रणम्।
उपगम्या ब्रवीद् राम अगस्त्यो भगवांस्तदा।।2।।
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे।।3।।
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अर्थ: सबके हृदय में रमण करने वाले महाबाहो राम! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे।
आदित्य हृदयं पुण्यं सर्वशत्रु विनाशनम्।
जयावहं जपं नित्यम् अक्षयं परमं शिवम्।।4।।
सर्वमंगल मांगल्यं सर्वपाप प्रणाशनम्।
चिन्ता शोक प्रशमनम आयुर्वधनम् उत्तमं।।5।।
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अर्थ: इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुर नमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्।।6।।
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अर्थ: भगवान सूर्य अपनी अनन्त किरणों से सुशोभित (रश्मिमान्) हैं। ये नित्य उदय होने वाले (समुद्यन्), देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान् नाम से प्रसिद्ध, प्रभा का विस्तार करने वाले (भास्कर) और संसार के स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका (रश्मिमते नमः, समुद्यते नमः, देवासुरनमस्कृताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः इन नाम मंत्रों के द्वारा) पूजन करो।
सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मि भावनः।
एष देवासुर गणान् लोकान् पाति गभस्तिभिः।।7।।
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अर्थ: सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित सम्पूर्ण लोकों का पालन करते हैं।
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः।।8।।
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अर्थ: ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरूण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज हैं।
पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः।।9।।
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः।।10।।
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्त सप्तिम् अरीचिमान्।
तिमिरोन्मथनः शम्भू स्त्ष्टा मार्तण्डकों अंशुमान्।।11।।
हिरण्यगर्भः शिशिर स्तपनोऽहरकरो रविः।
अग्नि गर्भो अदितेः पुत्रः शंखः शिशिर नाशनः।।12।।
व्योमनाथः तमोभेदी ऋम्यजुः सामपारगः।
घनवृष्टिः अपाम् मित्रो विन्ध्य वीथीप्लवंगमः।।13।।
आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
कविः विश्वोः महातेजा रक्तः सर्वत् उदभवः।।14।।
नक्षत्र ग्रह ताराणाम् अधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादश आत्मन् नमोऽस्तु ते।।15।।
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अर्थ: इन्हीं के नाम आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग (आकाश में विचरने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बीज), दिवाकर (रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व (दिशाओं में व्यापक अथवा हरे रंग के घोड़े वाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणों से सुशोभित), तिमिरोन्मथन (अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू (कल्याण के उदगमस्थान), त्वष्टा (भक्तों का दुःख दूर करने अथवा जगत का संहार करने वाले), अंशुमान (किरण धारण करने वाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभाव से ही सुख देने वाले), तपन (गर्मी पैदा करने वाले), अहरकर (दिनकर), रवि (सबकी स्तुति के पात्र), अग्निगर्भ (अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन (शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ (आकाश के स्वामी), तमोभेदी (अन्धकार को नष्ट करने वाले), ऋग, यजुः और सामवेद के पारगामी, घनवृष्टि (घनी वृष्टि के कारण), अपां मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विन्ध्यवीथीप्लवंगम (आकाश में तीव्रवेग से चलने वाले), आतपी (घाम उत्पन्न करने वाले), मण्डली (किरणसमूह को धारण करने वाले), मृत्यु (मौत के कारण), पिंगल (भूरे रंग वाले), सर्वतापन (सबको ताप देने वाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त (लाल रंगवाले), सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन (जगत की रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा (बारह स्वरूपों में अभिव्यक्त) हैं। इन सभी नामों से प्रसिद्ध सूर्यदेव! आपको नमस्कार है।
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।।16।।
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अर्थ: पूर्वगिरी (उदयाचल) तथा पश्चिमगिरि (अस्ताचल) के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः।।17।।
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अर्थ: आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता हैं। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है।
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
नमः पद्म प्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।।18।।
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः।।19।।
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अर्थ: परात्पर रूप में आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी हैं। सूर्य आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है।
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नाय अमितात्मने।
कृतघ्न घ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः।।20।।
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अर्थ: आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं, आपका स्वरूप अप्रमेय है। आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।
तप्त चामीकर आभाय हरये विश्वकर्मणे।
नमः तमः अभि निघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।।21।।
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अर्थ: आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरि (अज्ञान का हरण करने वाले) और विश्वकर्मा (संसार की सृष्टि करने वाले) हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है।
नाशयत्येष वै भूतं तत्सृजति च प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः।।22।।
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अर्थ: रघुनन्दन! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं।
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष चैव अग्निहोत्रं च फलं चैव अग्निहोत्रिणाम्।।23।।
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अर्थ: ये सब भूतों में अन्तर्यामीरूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं।
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः।।24।।
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अर्थ: (यज्ञ में भाग लेने वाले) देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं। सम्पूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं।
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चित न अवसीदति राघव।।25।।
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अर्थ: राघव! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता।
पूजयस्वः एनम् एकाग्रः देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि।।26।।
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अर्थ: इसलिए तुम एकाग्रचित्त होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्य हृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे।
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्।।27।।
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अर्थ: महाबाहो! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे।’ यह कहकर अगस्त्य जी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये।
एतत् श्रुत्वा महातेजा नष्टशोकः अभवत् तदा।।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतः आत्मवान्।।28।।
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीरवान्।।29।।
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्।।30।।
अथ रविम् अवदत् निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
निशिचरपतिः क्षयं विदित्वा सुरगण मध्येगतः वचः तु अवतरेति।।31।।
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अर्थ: उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान सूर्य की ओर देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। फिर परम पराक्रमी रघुनाथजी ने धनुष उठाकर रावण की ओर देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढ़े। उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया। उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखा और निशाचराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा— ‘रघुनन्दन! अब जल्दी करो’।
(इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पंचाधिकशततमः सर्गः)
एक स्त्री ने रोक दी थी सूर्य की गतिः करवाचौथ स्पेशल
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