आपतकाल में प्राणरक्षा के लिए निर्बल और बलवान की मैत्री को अस्थाई ही मानना चाहिएः मैत्री के संबंध में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को दिया नीति ज्ञान

अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा- पितामह क्या कभी शत्रु के साथ मैत्री हो सकती है? उस मैत्री का क्या भविष्य होता है? पितामह ने कहा- शत्रु के साथ सावधानीपूर्ण और क्षणिक मैत्री की जा सकती है जैसे चूहे ने बिलाव से किया था.
पितामह ने कथा सुनानी आरंभ की. एक वन में बरगद का विशाल वृक्ष था. उसमें बहुत से सांप और पक्षी रहते थे. बरगद की डाली पर लोमश नामका बिलाव रहता था जो पक्षियों को खा जाता था.
उसी वन में एक बहेलिया भी रहता था जो पशु-पक्षियों को जाल में फंसा लेता था. एक दिन बिलाव बहेलिए के जाल में फंस गया. बिलाव के फंसने से सभी पशु-पक्षी बड़े खुश हुए और वे सबसे ताकतवर शत्रु के संकट में आने से निर्भय होकर घूमने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वे बिलाव पर हंस भी रहे थे. जाल के पास ही खेल रहे एक चूहे को उल्लू और नेवले भी दिखे. चूहे के लिए वे दोनों भी ताकतवर शत्रु थे. उसे अपने प्राण बचाने की चिंता हुई.
चूहे ने सोचा कि जैसे संकट में पड़े विद्वान नीतिशास्त्रों के प्रयोग से छूटते हैं वैसे मुझे भी प्राण रक्षा का उपाय करना चाहिए. नीति के ज्ञाता चूहे ने बिलाव के साथ मैत्री प्रस्ताव का निर्णय किया.
उसने विचार किया कि बिलाव बेशक उसका भी शत्रु है किंतु विपत्ति में पड़े एक बलशाली शत्रु की मित्रता अन्य शत्रुओं के लिए भय पैदा करने वाली होगी. वह जाल में घुस गया और बिलाव को सांत्वना देने लगा.
भैया बिलाव मैं तुम्हारी दशा देखकर दुखी हूं. तुम्हारी प्राण रक्षा करना चाहता हूं. यदि तुम मेरे साथ हिंसा नहीं करने का वचन दो तो मैं जाल को काटकर तुम्हें मुक्त कर सकता हूं. इस प्रकार हमारी मैत्री स्थाई हो जाएगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बिलाव खुश होकर बोला- मुझे मुक्ति प्रदान करो. मुक्त होकर मैं तुमसे मैत्रीधर्म का पालन करूंगा. अभी मैं तुम्हारा भक्त, शिष्य और शरणागत हूं. मुझपर दया करो. मैं इस उपकार का बदला चुकाउंगा.
दोनों को एक दूसरे से लाभ था इसलिए दोनों ने परस्पर हितों के लिए मैत्री कर ली. चूहा धीरे-धीरे जाल को काटने लगा. चूहे बिलाव की इस संधि से उल्लू और नेवला घबराकर चले गए. तभी बहेलिया आता दिखाई पड़ा.
इससे पहले के कि बहेलिया जाल तक पहुंचे चूहे ने अंतिम बंधन काटा और बिलाव को मुक्त करा दिया. बिलाव पेड़ पर जा बैठा और चूहा अपने बिल में छुप गया. बहेलिया निराश होकर चला गया.
बिलाव ने चूहे से कहा- मित्र तुमने विपत्ति काल में मेरी सहायता की, मुझे जीवनदान दिया. तुम मेरे घर में आओ. मेरा पूरा परिवार तुम्हारा आदर-सत्कार और सेवा करना चाहता है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.नीति के ज्ञाता चूहे ने कहा- तुम्हारी बात मैंने ध्यान से सुनी. नीति कहती है कि इस जगत में मित्र और शत्रु की पहचान अत्यंत सूक्ष्म है. अवसर आने पर मित्र शत्रु और शत्रु मित्र बन जाते हैं.
जब कोई प्राणी काम और क्रोध के अधीन हो तो यह समझना असंभव है कि वे मित्र हैं या शत्रु. मैत्री कोई स्थिर वस्तु नहीं क्योंकि स्वार्थ बड़ा बलवान है. जो विश्वासपात्र न हो उस पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए.
माता-पिता, पुत्र, बंधु-बांधव सबके स्नेह में कहीं न कहीं स्वार्थ होता ही है. पतित पुत्र को माता-पिता त्याग देते हैं. कारण समाप्त होने पर प्रीति भी खत्म हो जाती है. तुम आचरण से ही मेरे शत्रु हो. हमारी मित्रता में दोनों का स्वार्थ था.
संकटमुक्त होते ही तुम्हारी स्वाभाविक प्रवृति जाग गई है इसलिए मैं नहीं मिल सकता. मैंने शुक्राचार्य की नीति अपनाई कि जब स्वयं और शत्रु पर समान संकट आए तो निर्बल को बलवान शत्रु से मैत्री करके सावधानीपूर्वक काम निकाल लेना चाहिए.
काम निकलते ही वह मैत्री व्यर्थ हो जाती है इसलिए उसे समाप्त कर देना चाहिए. इतना कहकर चूहा बिल में घुस गया. (महाभारत की कथा)
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
हम ऐसी कथाएँ देते रहते हैं. Facebook Page Like करने से ये कहानियां आप तक हमेशा पहुंचती रहेंगी और आपका आशीर्वाद भी हमें प्राप्त होगा: Please Like Prabhu Sharnam Facebook Page
धार्मिक चर्चा करने व भाग लेने के लिए कृपया प्रभु शरणम् Facebook Group Join करिए: Please Join Prabhu Sharnam Facebook Group