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अखंड सौभाग्य प्रदाता व दरिद्रता मिटाने वाली सोमवती अमावस्या- कथा व विधि

अखंड सौभाग्य प्रदाता व दरिद्रता मिटाने वाली सोमवती अमावस्या- कथा व विधि

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भीष्म ने तो इसे व्रतराज तक कहा है. आपको इस पोस्ट में सोमवती व्रत की कथा, पूजन विधि और उसके साथ ही दरिद्रता, जीवन के छोटे-छोटे कष्टों को दूर करने के लिए सोमवती अमावस्या को किए जाने वाले उपायों के बारे में बताएंगे. पहले कथा सुनते हैं-

सोमवती अमावस्या व्रत कथाः

जब युद्ध के मैदान में सारे कौरव वंश का सर्वनाश हो गया, भीष्म पितामह शर-शैय्या पर पड़े हुए थे. उस समय युधिष्ठर भीष्म पितामह से पश्चाताप करने लगे.

धर्मराज कहने लगे- हे पितामह! दुर्योधन की बुरी सलाह पर एवं हठ से भीम और अर्जुन के कोप से सारे कुरू वंश का नाश हो गया है. वंश का नाश देखकर मेरे हृदय में दिन रात संताप रहता है. अब आप ही बताइए कि मैं क्या करूं, कहां जाऊं जिससे हमें शीघ्र ही चिरंजीवी संतति प्राप्त हो.

पितामह कहने लगे- हे! धर्मराज मैं तुम्हें व्रतों में शिरोमणि व्रत बतलाता हूं जिसके करने एवं स्नान करने मात्र से चिरंजीवी संतान एवं मोक्ष की प्राप्ति होगी. सोमवती अमावस्या का व्रत तुम उत्तरा से अवश्य कराओ जिससे उसका पुत्र तीनों लोकों में यश फैलाने वाला होगा.

धर्मराज ने कहा- पितामह इस व्रतराज के बारे में विस्तार से बताइए. इसका नाम सोमवती क्यों है और इसे सबसे पहले किसने किया था?

भीष्म बोले- कांची नाम की महापुरी है, वहां महापराक्रमी रत्नसेन नाम का राजा राज्य करता था. उसके राज्य में देवस्वामी नामक ब्राह्मण निवास करता था. देवस्वामी के सात पुत्र एवं गुणवती नाम की कन्या थी. एक दिन ब्राह्मण भिक्षुक भिक्षा मांगने आया.

देवस्वामी की सातों बहुओं ने अलग-अलग भिक्षा दी और सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद पाया. अंत में गुणवती ने भिक्षा दी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भिक्षुक ब्राह्मण ने उसे धर्मवती होने का आशीर्वाद दिया और कहा- यह कन्या विवाह के समय सप्तपदी के बीच ही विधवा हो जायेगी इसलिए इसे धर्माचरण ही करना चाहिए.

गुणवती की माँ धनवती ने गिड़गिड़ाते दीन स्वर में कहा- हे ब्राह्मण! हमारी पुत्री के वैधव्य मिटाने का उपाय कहिए. उनकी विनती से साधु दयालु हो गए.

उन्होंने ध्यान लगाया और अपनी अंतर्दृष्टि से पता करके बताया- पड़ोस के गांव में सोना नाम की एक धोबन अपने बेटे और बहू के साथ रहती है. सोना बहुत ही आचार-विचार और संस्कार संपन्न पतिपरायण स्त्री है.

यदि यह कन्या अपनी सेवा से सोना को प्रसन्न कर ले और सोना धोबिन इसके विवाह में आए और अपनी मांग का सिन्दूर इसे लगा दे तो उसके बाद इस कन्या का विवाह करो तो इसका वैधव्य दोष मिट सकता है.

साधू ने यह भी बताया कि सोना कहीं आती जाती नहीं है. उसे प्रसन्न करने का तुम्हें बहुत प्रयास करना होगा.

ब्राह्मणी ने जब सुना कि धोबिन की सेवा से बेटी का वैध्वय दोष मिट जाएगा तो उसे तुरंत अपने पुत्र के साथ सोना की खोज में भेज दिया.

देवस्वामी के सबसे छोटे पुत्र शिवस्वामी अपनी बहिन को साथ लेकर सिंघल द्वीप को गया.

वे दोनों समुद्र के तट पर पहुँचकर समुद्र पार करने का उपाय सोचने लगे लेकिन उन्हें कोई उपाय नहीं सूझ रहा था.

थक-हार कर दोनों भाई-बहिन भूखे-प्यासे एक वट-वृक्ष की छाया में उदास होकर बैठे गए.

उस वृक्ष के तने की एक खोह में गिद्ध के बच्चे रहते थे. वे दिनभर इन दोनों को परेशान होते हुए देख रह थे.

शाम को बच्चों की माँ उनके लिए कुछ आहार लेकर आई और उन्हें खिलाने लगी लेकिन गिद्ध के बच्चों ने कुछ नहीं खाया.

गिद्ध के बच्चों ने अपनी माँ से कहा-इस वृक्ष के नीचे आज सुबह से ही दो भूखे-प्यासे प्राणी बैठे हैं. जब तक वे नहीं खाएंगे, हम लोग भी नहीं खाएंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बच्चों की बात सुनकर उनकी माँ गिद्धनी को दया आई गई. उसने दोनों भाई-बहन को देखा और उनके पास जाकर कहा-आपकी इच्छा मैंने जान ली है. आप लोग भोजन करें. कल प्रातः मैं आप लोगों को समुद्र पार सोमा के घर पहुँचा दूँगी.

गिद्धनी की बात सुनकर उन दोनों भाई-बहिन की चिंता कम हुई, दोनों को अत्यंत प्रसन्नता हुई. उन्होंने गिद्धनी को प्रणाम कर भोजन किया.

प्रातः होते-होते गिद्धनी ने उन्हें सिंहल द्वीप में सोमा के गांव पहुंचा दिया.

भाई बहन खोजते-खोजते सोना के घर पहुंचे. उन्होंने पड़ोस में ही एक झोपड़ी बना ली और वहीं रहने लगे.

गुणवती तडके ही उठकर सोना धोबिन के घर जाकर सफाई और अन्य सारे काम करके अपने घर वापस आ जाती. इस तरह एक वर्ष बीत गया.

एक दिन सोना धोबिन ने अपनी बहु की प्रशंसा करते हुए कहा- आजकल तुम तडके ही उठकर सारे काम कर लेती है और पता भी नहीं चलता. बहु आश्चर्य में थी.

बहु ने कहा- मांजी मैंने तो सोचा कि आप ही सुबह उठकर सारे काम ख़ुद ही ख़त्म कर लेती हैं. मैं तो देर से उठती हूं.

दोनों सास-बहु उलझन में थीं कि आखिर कौन रोज इनके घर का सारा काम निपटा जाता है.

रात को सास-बहु दोनों निगरानी में बैठे. धोबिन ने देखा कि एक एक कन्या मुंह अंधेरे घर में आती है और सारे काम चुपचाप निपटाने के बाद चली जाती है. दोनों ने सोचा शायद कोई शापित दिव्य स्त्री हो.

हिम्मत करके एक दिन वह कन्या काम करके जाने को हुई तो सोना ने रोक लिया.

सोना ने पूछा- आप कौन है और इस तरह छुपकर मेरे घर की चाकरी क्यों करती हैं?

कन्या ने साधु द्वारा कही गई सारी बात बता दी. सोना ने कहा- मेरी सेवा करके आप मुझपर पाप क्यों चढ़ाती हैं. आप ऐसा करना बंद कर दें.

गुणवती ने उसके पैर पकड़ लिए और उसका उद्धार करने के लिए गिड़गिड़ाने लगी.

उसके भाई ने भी तरह-तरह से विनती की और कहा- एक अविवाहित कन्या का दर्द आप समझिए. मेरे माता-पिता और हम भाइयों की पीड़ा समझकर इसे अपना आशीर्वाद दें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सोना धोबिन ने फिर सोचा और उसे बहुत दया आई. वह पतिपरायण तेजस्वी स्त्री थी. उसने कन्या की सहायता के लिए हामी भर दी.

सोना ने कन्या और उसके भाई को कहा कि जाकर विवाह के आयोजन की तैयारी करो. अमावस्या के दिन उन्होंने विवाह का मूहूर्त रखा. सोना के पति अस्वस्थ थे.

जब ब्राह्मण के घर विवाह की तैयारी पूरी हो गई तो सोना जाने को तैयार हुई. उसने बहू से कहा कि जब तक मैं लौटकर नहीं आती, घर में रहो. यदि कोई अपशकुन भी हो जाए तो मेरी प्रतीक्षा करना.

सोना धोबिन ने जैसे ही अपने मांग का सिन्दूर कन्या की मांग में लगाया, उसके पति का देहांत हो गया. सोना को इस बात का पता चल गया लेकिन उसने शादी निर्विघ्न संपन्न कराके ही विदाई ली.

वह यह सोचकर ही बिना जल पीए चली थी कि कहीं रास्ते में पीपल का पेड़ मिलेगा तो उसे भंवरी देकर और उसकी परिक्रमा करके ही जल ग्रहण करेगी.

उस दिन सोमवती अमावस्या थी. ब्राह्मण के घर से मिले पूए-पकवान की जगह उसने ईंट के टुकडों से 108 बार भंवरी देकर 108 बार पीपल के पेड़ की परिक्रमा की और फिर जल ग्रहण किया.

ऐसा करते ही उसके पति के मुर्दा शरीर में कम्पन होने लगा. उसकी बहु अपने ससुर को फिर से जिंदा देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और सास की महिमा सबको बताई.

पीपल के पेड़ में सभी देवों का वास होता है. अत: सोमवती अमावस्या के दिन से शुरू करके जो व्यक्ति हर अमावस्या के दिन भंवरी देता है, उसके सुख और सौभाग्य में वृध्दि होती है.

मान्यता है कि जो स्त्री प्रत्येक अमावस्या को ऐसा नहीं कर पाती, वह भी सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या के दिन 108 वस्तुओं की भंवरी देने के बाद गौरी-गणेश की पूजा करके सोना धोबिन की यह कथा सुनती और दूसरों को सुनाती है उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अक्षय पुण्यफलदायी है सोमवती अमावस्या. कैसे करें आज विशेष पूजा?
सोमवती अमावस्या को अत्यंत पुण्य तिथि माना जाता है. मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन जो मनुष्य व्यवसाय में परेशानियों से जूझ रहे हो पीपल वृक्ष के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाकर और ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र का जाप करें. उनकी व्यवसाय में आ रही समस्या रुकावट दूर हो जाएगी.

सोमवती अमावस्या के पर्व पर अपने पितरों के निमित्त पीपल का वृक्ष लगाने से जातक को सुख-सौभाग्य, संतान, पुत्र, धन की प्राप्ति होती है और उसके समस्त पारिवारिक कष्ट समाप्त हो जाते हैं.

ऐसी मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में श्राद्ध करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है. पवित्र नदियों, प्रयाग आदि तीर्थों में स्नान, ब्राह्मण
भोजन, गौदान, अन्नदान, वस्त्र, स्वर्ण आदि दान का बहुत महत्व माना गया है.

सोमवार भगवान शिव जी का दिन माना जाता है सोमवती अमावस्या तो पूर्णरूपेण शिव जी को समर्पित होती है इसलिए इस दिन भगवान शिव की कृपा पाने के लिए शिवजी का अभिषेक करना चाहिए, या बेलपत्र, कच्चा दूध,मेवे,फल,मीठा,जनेऊ आदि चढ़ाकर ॐ नम: शिवाय का जाप करना चाहिए.

मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन सुबह सुबह नित्यकर्मों से निवृत्त होकर किसी भी शिव मंदिर में जाकर सवा किलो साफ चावल अर्पित करते हुए भगवान शिव का पूजन करें। पूजन पश्चात यह चावल किसी ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को दान करें.

शास्त्रों के अनुसार सोमवती अमवस्या पर शिवलिंग पर चावल चढ़ा कर उसका दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है.

शास्त्रों में वर्णित है कि सोमवती अमावस्या के दिन उगते हुए भगवान सूर्य नारायण को गायत्री मंत्र उच्चारण करते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देने गरीबी और दरिद्रता कभी भी नही आ सकती. यह क्रिया आपको अमोघ फल प्रदान करती है.

सोमवती अमावस्या के दिन 108 बार तुलसी के पौधे की श्रीहरि-श्री हरि अथवा पीपल के पेड की ॐ नमो नारायण जाप करते हुए परिक्रमा करें. इससे जीवन में आ रहे सभी आर्थिक संकट निश्चय ही समाप्त हो जाते हैं.

जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, वह यदि गाय को दही और चावल खिलाएं तो उन्हें अवश्य ही मानसिक शांति प्राप्त होगी.

इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है.

सोमवती अमावस्या को जो व्यक्ति धोबी,धोबन को भोजन कराता है,सम्मान करता है, दान दक्षिणा देता है, उसके बच्चों को कापी किताबें, फल, मिठाई, खिलौने आदि देता है उसके सभी मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होते हैं.

इस दिन ब्राह्मण, भांजा और ननद को फल, मिठाई या शृंगार की सामग्री का दान करना बहुत ही उत्तम फल प्रदान करता है.⁠⁠⁠⁠

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