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खांडववन न जलता तो कभी होते ही नहीं यज्ञ, अपने लाभ के लिए अग्नि ने जलाया था वन

खांडववन न जलता तो कभी होते ही नहीं यज्ञ, अपने लाभ के लिए अग्नि ने जलाया था वन

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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.एक दिन अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण ने जलविहार पर जाने का मन बनाया. दोनों यमुना के किनारे जल विहार करने लगे. काफी देर तक यमुना में जलविहार का आनंद लेने के बाद वे एक स्थान पर बैठे ही थे कि तभी वहां एक ब्राह्मण आया.

ब्राह्मण के मुखमंडल पर दिव्य तेज तो था लेकिन उसका शरीर जर्जर हो गया था. उसके शरीर की आभा और शरीर के बल दोनों में कोई सामंजस्य ही न था इस कारण वह विचित्र दिखता था.

उस ब्राह्मण ने दोनों से कहा- मैं एक ब्रह्मभोजी ब्राह्मण हूं. मैं लंबे समय से भूखा हूं. आप दोनों राजपुरुष हैं इसलिए मैं आपसे भोजन की भिक्षा मांगने आया हूं. मेरी भूख मिटाकर मुझे तृप्त करें.

श्रीकृष्ण और अर्जुन ने ब्राह्मण से पूछा- हम आपकी तृप्ति अवश्य कराएंगे. आपकी काफी दिनों से तृप्ति नहीं हुई है अतः आप अपनी इच्छा बताएं. किस प्रकार के अन्न से तृप्ति होगी हम उसका ही प्रबंध करेंगे.

तब ब्राह्मण ने अपना राज प्रकट किया- मैं साधारण ब्राह्मण नहीं हूं. मैं अग्रि हूं. आप मुझे वही अन्न प्रदान कीजिए जो मेरी क्षुधा को शांत करने योग्य है. मेरी क्षुधा खाण्डव वन को खाकर शांत होगी लेकिन मैं सात बार उसे जलाने का असफल प्रयास कर चुका हूं.

इस वन में तक्षक नाग और उसका परिवार रहता है. इसलिए इन्द्र हमेशा उस वन की रक्षा करते हैं. जब-जब मैं इस वन को जलाने की कोशिश करता हूं तब-तब इन्द्र मेरी इच्छा पूरी नहीं होने देते.

आप लोगों की सहायता से इसे जलाकर क्षुधा शांत कर सकता हूं. संसार में आपके अतिरिक्त कोई और इसमें सहायता नहीं कर सकता. मैं इसी भोजन की याचना करता हूं.

हे वासुदेव कृष्ण आपसे क्या छुपा है. आप तो भली-भांति जानते हैं कि मैं खांडव वन को ही जलाकर क्यों अपनी क्षुधा शांत करना चाहता हूं. इसमें यदि मेरा हित है तो पांडवों का भी हित सिद्ध होने वाला है.

ब्रह्माजी ने मुझे बताया है कि इसमें हमारा परस्पर परोपकार होने वाला है और भविष्य की एक बहुत बड़ी घटना की पृष्ठभूमि लिखी जानी है. अतः आप कृपा करें.

खांडववन को जलाकर पांडवों को क्या लाभ हुआ यह तो हम सभी जानते हैं पर इसमें अग्नि का भी लाभ था? ब्रह्माजी ने ऐसा क्यों कहा था?

पांडवों का तो खांडव आगमन अभी-अभी हुआ था परंतु अग्नि सात बार पहले उसे जलाने का असफल प्रयास क्यों कर चुके थे आइए आपको सुनाता हूं महाभारत की वह अनसुनी रोचक कथा.उस कथा को समझने के लिए पांडवों की समस्या को भी संक्षेप में समझते चलते हैं तब स्थितियां ज्यादा स्पष्ट होंगी.

द्रोणाचार्य से शिक्षा लेकर कौरव-पांडव दोनों हस्तिनापुर आए तो प्रजा के मन में यह अभिलाषा जागने लगी कि युधिष्ठिर को युवराज नियुक्त कर दिया जाए.

धृतराष्ट्र को अपने विश्वसनीय दूतों से इसकी भनक लग गई थी. वह दुर्योधन को ही सिंहासन पर बिठाना चाहते थे लेकिन प्रजा का विद्रोह भी नहीं सह सकते थे.

भीष्म इसमें बहुत बड़े बाधक बनते क्योंकि उनका समर्पण सिंहासन के प्रति था. वह प्रजा की अभिलाषा देखकर युधिष्ठिर को इसे सौंप सकते थे.

इसलिए धृतराष्ट्र ने एक चाल चली. हस्तिनापुर युधिष्ठिर को राज्य के सबसे व्यर्थ समझे जाने वाले प्रदेश खांडवप्रस्थ का राजा बना दिया. खांडवप्रस्थ तो वन के अतिरिक्त कुछ था ही नहीं.

इस तरह भाग्य पांडवों को उस वीरान जंगल में ले आया जिसपर तक्षक नाग और असुरों का आधिपत्य था.

पांडवों को उस जंगल को साफकर नया नगर बनाना था पर अग्नि क्यों उस वन को जलाकर खाने के लिए बैचैन थे. वास्तव में उस वन को जलाकर ही अग्नि को एक लंबी बीमारी की पीडा से मुक्ति मिल सकती थी. अग्नि के रोग का खांडववन से क्या संबंध, इसे जानते हैं.

श्वेतकि नामक एक धर्मनिष्ठ राजा थे. उन्होंने बहुत से बड़े-बड़े यज्ञ किए. उनके राज्य में सदैव यज्ञ होते ही रहते थे. राजा ने लगातार इतने यज्ञ करवाए कि राज्य के सभी ब्राह्मण थक गए.

उन्होंने राजा के सामने विनती कि वे अब और यज्ञ कराने में सक्षम नहीं हैं. उन्हें विश्राम की आवश्यकता है.

पर राजा श्वेतकि की इच्छा पूरी नहीं हुई थी. बलप्रयोग कर ब्राह्मणों से यज्ञ तो कराया नहीं जा सकता था इसलिए राजा को एक ऐसे पुरोहित की आवश्यकता थी जो यज्ञ की आहुतियां डालते और मंत्रोच्चार करते कभी थके ही नहीं.राजा ने इसके लिए भगवान शंकर की तपस्या शुरू की.

भगवान शंकर प्रसन्न हुए और राजा श्वेतकि से इच्छा पूछी तो राजा ने अपनी विवशता बताकर एक योग्य पुरोहित देने की प्रार्थना की.

शिवजी ने कहा- मेरे ही अंश स्वरूप ऋषि दुर्वासा के पास जाकर उनको सेवा से प्रसन्न करो. उनसे उत्तम पुरोहित तुम्हें नहीं मिलेगा.

राजा श्वेतकि, शिवजी के आदेश पर दुर्वासाजी के पास पहुंचे. उन्होंने दुर्वासाजी को सेवा से प्रसन्नकर एक ऐसे महान यज्ञ का अनुष्ठान करवाने की विनती की जो इससे पहले कभी न हुआ हो.

दुर्वासाजी ने राजा श्वेतकि के लिए ऐसा महान यज्ञ का अनुष्ठान कराया.

उस यज्ञ के अग्निकुंड में बारह वर्ष तक अग्रिदेव को लगातार घी की अखण्ड आहूतियां दी गईं. आहुतियां लगातार दी गईं. अग्निदेव को कोई विराम ही न दिया गया.

इसका परिणाम यह हुआ कि अग्निदेव की पाचन शक्ति कमजोर हो गई. उनका रंग फीका पड़ गया और प्रकाश मन्द हो गया. वे अब किसी यज्ञ आदि के आह्वान पर प्रकट ही न होते थे. इससे बड़ा संकट पैदा हो गए.

यज्ञ अनुष्ठान में विघ्न पड़ने लगे. अग्निदेव को बाध्य होकर जहां प्रकट होना पड़ता वहां वह ज्यादा हविष्य ग्रहण ही न कर पाते.

अपच के कारण अग्निदेव बहुत परेशान हो गए. वे इसका निदान पूछने ब्रह्माजी के पास गए.ब्रह्माजी अग्निदेव की पीड़ा से स्वयं भी दुखित हुए.

ब्रह्माजी ने कहा- हे अग्नि तुम खांडव वन को जलाकर उसके जीवों का भक्षण कर लो तो इससे तुम्हारी अरूचि खत्म हो जाएगी.

इसलिए ब्रह्माजी के आदेश पर अग्रिदेव ने खांडव वन को सात बार वन जलाने की कोशिश की लेकिन इन्द्र ने उन्हें सफल ही नहीं होने दिया.

इंद्र ऐसा इसलिए नहीं करने देना चाहते थे क्योंकि उस वन में इंद्र के मित्र तक्षक के कुल का वास था.

इसलिए जैसे ही अग्नि उसे जलाने का प्रयास करते इंद्र के भेजे भयंकर मेघ मूसलाधार बारिश करने लगते और अग्निदेव को हारकर जाना पड़ता. अग्निदेव ने जाकर सारी बात ब्रह्माजी को बताई.

ब्रह्माजी ने अग्नि को सुझाव दिया कि तुम श्रीकृष्ण और अर्जुन की सहायता लो. उन्हें किसी प्रकार से इसके लिए तैयार कर लो. इसमें परस्पर लाभ है. उनकी सहायता से तुम्हारा यह प्रयास इस बार अवश्य सफल होगा.

ब्रह्माजी के इसी आदेश पर अग्नि ब्राह्मणरूप में आए और क्षुधाशांत करने की विनती की.

अर्जुन ने अग्निदेव से कहा- हे अग्निदेव जो स्वयं देवराज इंद्र द्वारा रक्षित है मैं उसे नष्ट करने में कैसे समर्थवान हो सकता हूं. अभी तो मैं रथी भी नहीं हूं.मैंने आपकी भूख मिटाने का वचन दे दिया है इसलिए वचनबद्ध हूं परंतु अभी मेरे पास रथ के अलावा वेगवहन करने वाला कोई धनुष, अक्षय बाणों से युक्त तरकश भी नहीं है. मुझे तो पहले इन आयुधों को प्राप्त करना होगा तब तक आप प्रतीक्षा करें.

अग्निदेव तो इतने बेचैन थे कि वह प्रतीक्षा कर ही नहीं सकते थे.

उन्होंने वरुण देव का आवाहन करके गांडीव धनुष, अक्षय तरकश, दिव्य घोड़ों से जुता हुआ एक रथ मांगा जिसे अर्जुन को समर्पित किया. अग्नि ने श्रीकृष्ण को एक चक्र भी समर्पित किया.

गांडीव धनुष अलौकिक था. वह किसी शस्त्र से नष्ट नही हो सकता था तथा अन्य लाख धनुषों की बराबरी कर सकता था. उसके साथ ही अग्निदेव ने एक अक्षय तरकश भी अर्जुन को प्रदान किया था जिसके बाण कभी समाप्त नहीं होते थे.

गति को तीव्रता प्रदान करने के लिए जो रथ अर्जुन को मिला उसमें आलौकिक घोड़े जुते हुए थे तथा उसके शिखर पर एक दिव्य वानर बैठा था. उस ध्वज में अन्य जानवर भी विद्यमान रहते थे जिनके गर्जन से दिल दहल जाता था.

अग्नि ने कृष्ण को एक दिव्य चक्र प्रदान किया, जिसका मध्य भाग वज्र के समान था. वह मानवीय तथा अमानवीय प्राणियों को नष्ट कर पुनः श्रीकृष्ण के पास लौट आता था.

अग्निदेव ने खांडव वन को सब ओर से प्रज्वलित कर दिया. जो भी प्राणी बाहर भागने की चेष्टा करता, अर्जुन तथा श्रीकृष्ण उसका पीछा करते. खांडव वन के प्राणी व्याकुल हो उठे. उनकी सहायता के लिए इन्द्र आए पर अर्जुन तथा कृष्ण के सम्मुख एक न चली.

तभी इन्द्र के लिए एक आकाशवाणी हुई- तुम्हारा मित्र तक्षक नाग कुरुक्षेत्र गया हुआ है, अतः खांडव वनदाह से बच गया है. अर्जुन तथा श्रीकृष्ण के कार्य में बाधा न डालो. यह सुनकर इन्द्र भी अपने लोक चले गए.खांडव वनदाह के समय तक्ष का पुत्र अश्वसेन छोटा था. उसकी माता को उसके वंश के समाप्त होने की चिंता हुई. उसने अपनी जान देकर किसी प्रकार अपने पुत्र अश्वसेन को बचा लिया. यह कथा भी बहुत करूण है.

अश्वसेन के अतिरिक्त खांडववन में मायासुर तथा चार शार्र्ग नामक पक्षी बच गए थे. इस वनदाह से अग्नि देव तृप्त हो गये तथा उनका रोग भी नष्ट हो गया.

मयासुर को अर्जुन ने पकड़ लिया. मयासुर ने अर्जुन से प्रार्थना की कि उसके प्राण न ले इसके बदले वह उनके बड़े काम आएगा.

मयासुर असुरों का विश्वकर्मा था. उसने अर्जुन और श्रीकृष्ण को वचन दिया कि वह पांडवों के लिए हस्तिनापुर से भी ज्यादा भव्य नगर बनाकर देगा. अर्जुन ने उसे छोड़ दिया. उसी मयासुर ने इंद्रप्रस्थ का मायामहल बनाया जिसमें दुर्योधन उलझ गया था.

खांडववन में अपनी माता को गंवाने वाला अश्वसेन ने अर्जुन के वध के लिए किस प्रकार कई जन्म लिए और कर्ण की सहायता को आया था नीतिवान कर्ण ने उसकी सहायता लेने से मना कर दिया था. यह कथा भी बड़ी रोचक है इसे फिर सुनाउंगा.

खांडवदाह के बाद इन्द्र मरुद्गण आदि देवताओं के साथ प्रकट हुए तथा अर्जुन से वर मांगने के लिए कहा. अर्जुन ने सब प्रकार के दिव्यास्त्रों की कामना प्रकट की. इन्द्र ने कहा कि समस्त दिव्यास्त्रों पर शिवजी का अधिकार है. उन्हें प्रसन्न कर लेने पर ही दिव्यास्त्र प्राप्त होंगे.
(महाभारत की कथा)

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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