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असंतोष के भाव से भरे हैं तो पढें यह कथा- आपके काम की है.

असंतोष के भाव से भरे हैं तो पढें यह कथा- आपके काम की है.

prabhusharnam laxmi Vishnu

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बुद्ध किसी को निराश नहीं करते थे. वह सबकी परेशानियों को सुनते और उचित समाधान का प्रयास भी करते थे.

एक दिन एक व्यक्ति महात्मा बुद्ध के पास आया और उनसे अपनी परेशानी सुनकर उसका निदान करने का अनुरोध किया. बुद्ध चलते-चलते उसकी बात सुनने को तैयार हुए.

उस व्यक्ति ने कहना शुरू किया- प्रभु मैं एक विचित्र तरह के वैचारिक द्वंद्व से गुजर रहा हूं. मैं लोगों को तो खूब प्यार-स्नेह करता हूं पर मुझे बदले में कुछ नहीं मिलता.

जब मैं किसी के प्रति स्नेह रखता हूं, स्नेह प्रदर्शित करता हूं तो मैं भी यह अपेक्षा तो करूंगा ही कि मुझे भी बदले में स्नेह या संतुष्टि मिले लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं मिलता. प्रभु मेरा जीवन स्नेह से वंचित है.

बुद्ध के साथ-साथ चलते हुए वह व्यक्ति कहता रहा और बुद्ध ध्यान से सुनते और स्वभाव अनुसार मुस्कुराते भी रहे. उस व्यक्ति ने अपनी परेशानी कहनी जारी रखी.वह आगे बोला- मैं स्वयं को अकेला महसूस करता हूं. कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे व्यवहार में ही कोई कमी है. कृपया बताएं कि मुझ में कहां गलती और कमी है. मैं प्रेम-स्नेह से वंचित क्यों हूं?

बुद्ध ने तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया, वह चुप रहे! सब लोग चलते रहे. व्यक्ति को अपने प्रश्न के उत्तर की बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा थी.

चलते-चलते बुद्ध के एक शिष्य को प्यास लगी. कुआं पास ही था. रस्सी और बाल्टी भी पड़ी हुई थी.

शिष्य ने बाल्टी कुएं में डाली और खींचने लगा. कुंआ गहरा था. पानी खींचते-खींचते उसके हाथ थक गए पर वह पानी नहीं भर पाया क्योंकि बाल्टी जब भी ऊपर आती खाली ही रहती.

सभी यह देखकर हंसने लगे हालांकि कुछ यह भी सोच रहे थे कि इसमें कोई चमत्कार तो नहीं?

थोड़ी देर में सबको कारण समझ में आ गया. दरअसल बाल्टी में छेद था इसलिए बाल्टी ऊपर पहुंचने से पहले खाली हो जाती थी.

बुद्ध ने उस व्यक्ति की तरफ देखा और कहा- हमारा मन भी इसी बाल्टी की ही तरह है जिसमें असंख्य छेद हैं. आखिर पानी इसमें टिकेगा भी तो कैसे? मन में यदि सुराख रहेगा तो उसमें प्रेम भरेगा कैसे! क्या वह रुक पाएगा?

बुद्ध ने उस व्यक्ति से कहा- वत्स! तुम लोगों को प्रेम-स्नेह देते हो यह बहुत अच्छा गुण है. बदले में तुम्हें प्रेम मिलता भी है, पर वह टिकता नहीं है. वास्तव में तुम उसे अनुभव नहीं कर पाते क्योंकि मन में विकार रूपी छेद हैं. जब तक विकार रूपी उन छेदों को भर नहीं लोगे यह असंतोष रहेगा ही.

प्रेम के बदले में प्रेम की इच्छा रखना अनुचित नहीं है किंतु तुम्हारा प्रेम निःस्वार्थ नहीं होता. तुम किसी के प्रति प्रेम, आदर, स्नेह या सम्मान प्रदर्शित करने से पहले ही यह तय कर लेते हो कि बदले में तुम्हें इतना ही प्रेम चाहिए. इस कारण उपजता है असंतोष का भाव.क्या सुंदर बात है. जीवन को तराजू के पलड़ों की तरह नहीं लेना चाहिए. जिसमें हर उपकार के बदले प्रतिउपकार की अपेक्षा माप-तौल कर रखी जाए. शास्त्रों में जो कहा गया है सरल शब्दों में उसका सार है- नेकी कर दरिया में डाल.

कोई नेकी किसी पर की है तो उसके पुरस्कार की अपेक्षा जो रखता है वह संसार का सबसे दुखी प्राणी है. हर व्यक्ति इस भावना से ग्रस्त है कि वह संसार में सबका भला करता है लेकिन बदले में लोग उसका भला नहीं करते.

यह ऐसा खोट है जिसे मनुष्य स्वीकारने को तैयार नहीं होता और इसके परिणामस्वरूप अवसादग्रस्त रहता है.

आप जिस वस्तु के लिए सबसे अधिक तड़प रहे हैं कुछ समय के लिए उसके प्रति विरक्ति का भाव अभ्यास से लाकर देखिए. जब भी उसका ख्याल आए तो संकल्प लें संसार में मुझे सबकुछ चाहिए सिवाए उस चीज के.

शुरू-शुरू में कष्ट होगा लेकिन अगर करने में समर्थ रहे तो देखिए आप एक झटके में सारी परेशानियों से ऊबरे हुए हैं. स्वयं को बहुत हल्का महसूस करेंगे. यह प्रयोग संसार भर के मनोवैज्ञानिकों ने अनगिनत लोगों पर आजमाया है और परिणाम उत्साहवर्धक रहे हैं.

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ऐसी अनगिनत कथाओं का सुंदर संसार है प्रभु शरणम् जहां आप धार्मिक-आध्यात्मिक कथाएं, जीवन को बदलने वाली प्रेरक कथाएं, रामायण-गीता, ज्योतिष और सभी प्रमुख मंत्रों को पढ़ सकते हैं. उन मंत्रों के क्या लाभ हैं, उसके बारे में जान सकते हैं.

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