सबसे बड़े नारायणद्रोही का पुत्र, सबसे बड़ा नारायणभक्त- प्रहलाद कथा
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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंपौराणिक काल की बात है एक बार सहस्रणीकजी के मन में यह जानने की इच्छा हुई कि हिरण्यकश्यपु जैसे विष्णुद्रोही के घर में प्रह्लाद जैसा विष्णु उपासक कैसे पैदा हुआ. उन्होंने श्री मार्कण्डेयजी से इस संदर्भ में अपनी इच्छा प्रकट की.
मार्कण्डेयजी ने कथा सुनानी शुरू की- सहस्रणीक, दिति और कश्यप का पुत्र हिरण्यकश्यप बहुत बलशाली दैत्य था. एक समय ऐसा भी था कि त्रिभुवन ही उसके अधीन कहा जाने लगा.
अपार शक्तियां पाकर उसमें बड़ा घमंड़ आ गया. वह और भी शक्तियां अर्जित करने की सोचने लगा.
उसने निर्णय लिया कि वह तप करेगा. उसने ऐसा घोर तप करना आरंभ किया कि धरती कांपने लगी. धरती ऐसे तपस्वी को संभालने में असमर्थ पा रही थी.
पृथ्वी विचलित हुई तो भूकंप आ गया. पशु-पक्षी, जीव-जंतु भयभीत हो उठे और पूरी प्रकृति में ही हड़कंप मच गया.
हिरण्यकश्यप को उसके दरबारियों, बंधुओं, मित्रों, भृत्य ने उसे सुझाया कि तीनों लोक आप के अधीन हैं.सारे देवताओं ओ आपने जीत रखा है. आपको किसी का न तो भय है न ही कोई अन्य समस्या. आपको अब और क्या चाहिए.
फिर आपके इस तप पर जाने से पूर्व आग लगने और भूकंप आने जैसे अपशकुन भी हो रहे हैं.हिरण्यकश्यपु के सेवकों ने कहा- इस तप का कोई अर्थ नहीं है स्वामी क्योंकि तप तो उनके लिए है जिनकी कोई आकांक्षा पूर्ण न हुई हो. आपके आगे तो सभी नतमस्तक हैं.
हिरण्यकश्यप में अहंकार बहुत था. उसने किसी की न मानी.
आपने बंधु बांधवों की बात ठुकरा कर दो-तीन मित्रों के साथ लेकर फिर से तप करने को चला गया. वह कैलाश के शिखर पर पहुंचा और तपस्या आरंभ कर दी.
तप के कुछ ही बरस बीते होंगे कि स्वयं ब्रह्माजी भी अत्यंत चिंतित हो उठे. उन्होंने सोचा कि यह दैत्य यदि इसी तरह दुष्कर तपस्या करता रहा तो सभी देवता इसके अधीन हो जाएंगे. फिर यह दुर्बुद्धि उन सबकी शक्तियों का नाजायज प्रयोग करेगा.
अपनी बनाई सृष्टि की व्यवस्था पर ब्रह्माजी को संकट घिरता दिख रहा था.
उन्हें चिंता हुई कि कैसे हिरण्यकश्यपु को इस कठिन तप से अलग किया जाए. वह इसी चिंता में व्याकुल थे तभी उन्हीं देवर्षि नारद दिखे.नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा- आप व्यर्थ ही व्यथित हैं. जो भगवान विष्णु पर आश्रित है उसको किसी प्रकार की चिंता नहीं करनी चाहिए. भगवान विष्णु मुझे कोई न कोई प्रेरणा देंगे और मैं इस नारायण द्रोही दैत्य की तपस्या भंग करुंगा.
मार्कंण्डेयजी बोले- नारदजी ने ब्रह्माजी को भरोसा दिलाकार उनकी चिंता कम की और फिर अपने साथ पर्वत मुनि को लेकर वहां से आगे चल दिए.
भगवान की प्रेरणा से नारद जी को एक युक्ति सूझी.
नारदजी और पर्वत मुनि दोनों ही रूप बदलने की विद्या के सिद्धहस्त हैं. दोनों ने पक्षी का रूप लिया और कैलाश शिखर के उस क्षेत्र में पहुंचे जहां हिरण्यकश्यप अपने दो तीन दैत्य मित्रों की सुरक्षा में तप कर रहा था.
जहां दैत्यराज तप कर रहा था कैलाश के उस भाग में बहुत वृक्ष थे. पक्षी रूप धरकर दोनों मुनि वृक्ष की दो आमने-सामने की डाल पर बैठ गए.
दोनों मुनियों ने कलविंक पक्षी की आवाज में बड़ी ही गंभीर वाणी में ऊं नमो नारायणाय मंत्र का तीन बार जप किया.दोनों ने इतने स्पष्ट स्वर में नारायण मंत्र का जप किया तो वह गूंजने लगी. यह सुनकर हिरण्यकश्यप बेचैन हो उठा.
नारायण द्रोही के कानों में नारायण मंत्र के स्वर पड़े तो उसकी एकाग्रता भंग हो गयी.
वह तो नारायण नाम के उच्चारण तक से चिढ़ता था और उच्चारण करने वाले के वध को तत्पर रहता था.
क्रोध में आग-बबूले हिरणाकश्यप ने सोचा मेरा कोई शत्रु यहां आ पहुंचा है, संभवतः स्वयं नारायण ही यहां हैं.
उसने तप छोड़ दिया. नारदजी और पर्वत मुनि को सफलता मिलती दिखी. दोनों ने फिर से नारायण मंत्र का उच्चारण किया.
अब तो उसके क्रोध की सीमा ही न रही. उसने दो पक्षियों को पास के वृक्ष पर बैठे देखा तो धनुष पर तीर चढ़ाकर निशाना लगाया.
दोनों ही मुनि पहले से ही सचेत थे. उसे धनुष उठाता देखा तो वे उडकर कहीं और चले. बदहवास हिरण्यकश्यप उनके पीछे मारने के लिए दौड़ा. दोनों ने अपने सिद्धिबल का प्रयोग किया और वहां से लुप्त हो गए.दैत्यराज का तप भंग हो चुका था. वह लौट आया. समझ चुका था कि किसी ने छल से उसका व्रत भंग करवा दिया है.
उसकी अब तक की सारी मेहनत पर पानी फिर गया है. वह तत्काल अपने नगर को चल दिया.
दैत्यराज हिरण्यकश्यपु अपने नगर पहुंचा. उसकी पत्नी कयाधु ऋतुमति थी. लंबे अंतराल बाद हिरण्यकश्यप और कयाधु का मिलन हुआ था. मिलन के क्षणों में कयाधु ने पति हिरण्यकश्यप से एक प्रश्न पूछ लिया.
कयाधु ने पूछा- आपने जाते समय कहा था कि आपका तप दस हजार वर्ष तक चलेगा. पर आपने बीच में ही तपस्या का त्याग कर दिया. व्रत के त्यागने का कारण मैं आपसे प्रेमपूर्वक पूछ रही हूं. कृपया सच सच बतलायें.
हिरण्यकश्यपु ने संगम में रत रहते हुए अनमने मन से कयाधु को उत्तर दिया- प्रिये मेरा तप अपने पूर्णता की ओर अग्रसर था लेकिन उन पक्षियों ने मेरा ध्यान बंटाने के लिए “ऊं नमो नारायण”, “ऊं नमो नारायण” का उच्चारण शुरू कर दिया.
दोनों पक्षी बार-बार नारायण मंत्र का जप करते थे. नारायण नाम के बार-बार श्रवण से मेरे तप में विघ्न पड़ने लगा.
मुझे नारायण से घृणा है और मेरे कानों में ऊं नमो नारायणाय पड़ रहे थे. इससे व्रत टूट गया.
मुझे आशंका हुई कि कहीं तुम्हारे साथ कुछ अशुभ न हुआ हो इसलिए यहां आ गया.मार्कंण्डेयजी ने कहा- हे सहस्रणीक. जब हिरण्यकश्यप पत्नी को यह विवरण सुना रहा था तब उसका प्रेम परिणिति के समीप था. दैवयोग से वह स्वयं ऊं नमो नारायण, ऊं नमो नारायण को जपते हुए ही स्खलित हुआ.
तो सहस्रणीक इस प्रसंग के बाद जब कयाधु गर्भवती हुई तो उससे जो बालक पैदा हुआ वह जन्मजात नारायण का अन्नय भक्त हुआ क्योंकि उसके बीज पड़ते समय उसके पिता ने अंजाने में ही नारायण नाम लिया था.
सह्स्त्रणीक यह नारायण की ही लीला थी कि संसार के सबसे बड़े नारायण द्रोही के घर में सबसे बड़े नारायण भक्त का जन्म हुआ. दैत्यराज होकर भी वह मलिन कर्मों से दूर निर्मल भाव से रहता हुआ महान विष्णु भक्त प्रह्लाद बना.
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