माता के वरदान की रक्षा को श्रीराम से भिड गए हनुमान- श्रीराम ने दिए अनेक वरदान
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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंनारद मुनि का स्वभाव ऐसा है कि वह झगड़ा सुलझाने से ज्यादा झगड़ा लगाने वाले हैं. काशीनरेश अयोध्या में भगवान श्रीराम के दर्शनों के लिए पहुंचे.
नारदजी भी प्रभुदर्शन को आए थे. नारद ने काशीराज को समझा दिया कि आप दरबार में सबको प्रणाम करना लेकिन वहां बैठे विश्वामित्र को प्रणाम न करना.
काशी नरेश ने कारण पूछा तो नारदजी ने कहा कि प्रभु की ऐसी ही मंशा समझ लो. बाकी का मर्म आपको बाद में बताउंगा.
काशीराज ने नारद के कहे मुताबिर सबको प्रणाम किया लेकिन विश्वामित्र को प्रणाम नहीं किया. विश्वामित्र क्रोधित हो गए.
उन्होंने श्रीराम से कहा कि अब मैं अयोध्या में नहीं रह सकता क्योंकि यहां मेरा घोर अपमान हुआ है.
प्रभु ने कहा- आपका अपमान तो मेरा अपमान है. ऐसा पाप करने वाले को मैं आप जो कहें दंड दूंगा.
विश्वामित्र ने कहा कि काशीराज ने अपमान किया इसलिए उन्हें श्रीराम प्राणदंड दें. प्रभु ने कहा कि चौबीस पहर बीतने से पहले काशीराज जीवित नहीं रहेगा.
नारदजी के सिखावे में तो काशी नरेश के प्राण संकट में पड़ गए.वह नारदजी के पास पहुंचे और कहा कि मेरे प्राण की रक्षा करें अन्यथा इसकी जिम्मेदारी उनकी होगी.
नारदजी ने कहा- घबराने की बात नहीं, आप मेरे साथ हनुमानजी की माता अंजना देवी के शरण में चलो.
नारद काशीराज को लेकर अंजना माता के पास गए. उनसे कहा आप इसे शरण में ले लें. संकटमोचक हनुमानजी की माता के शरणागत को कोई मार नहीं सकता. अंजना सारी बात जानती न थीं लेकिन नारद की सिफारिश पर उन्होंने शरण दे दी.
उधर श्रीराम ने अपने तरकश से तीर निकाला और उसे आदेश दिया कि ऋषि का अपमान करने वाले का वध कर दो.
अंजना ने शरणागत की रक्षा के लिए पुत्र हनुमान को पुकारा. हनुमानजी भी पूरा मामला नहीं जानते थे. उन्होंने भी माता के शरणागत की रक्षा का वचन दे दिया.
हनुमानजी ने काशी नरेश को रामनाम का अखंड जप करने को कहा. जब प्रभु का तीर उन्हें मारने पहुंचा तो वह राम नाम जप रहे थे. तीर बिना उनका वध किए वापस हो गया.श्रीराम इससे और क्रोधित हो गए. हनुमानजी ने समझा कि स्थिति गंभीर होती जा रही है. उन्होंने काशीनरेश को एक अचूक उपाय बताया.
हनुमानजी ने कहा हर सुबह सीता माता, श्रीराम की पूजा के लिए पुष्प चुनने जाती हैं. उस समय तुम उनके पांव पकड़ लेना और तब तक न छोड़ना जब तक अभयदान न मिल जाए.
काशी नरेश ने वैसा ही किया. चूंकि वह हनुमानजी के साथ आया था इसलिए माता ने नरेश को अभयदान देकर हनुमानजी को उनकी रक्षा आ आदेश दिया.
प्रभु ने दूसरा अभिमंत्रित तीर छोड़ा. वह काशीराज को मारने पहुंचा. हनुमानजी ने कहा कि इसकी हत्या से पहले तुम्हें मेरी हत्या करनी होगी क्योंकि मुझे इसकी सुरक्षा का आदेश मिला है.
तीर वापस हो गया. श्रीराम का क्रोध और बढ़ गया. उनके शत्रु की रक्षा हनुमान कर रहे हैं, यह बात भगवान को अच्छी नहीं लगी.प्रभु ने दूत भेजकर हनुमानजी को आदेश दिया कि वह उनके शत्रु की रक्षा न करें. हनुमानजी ने कहा कि मैं दो-दो माताओं के शरणागत की रक्षा का आदेश पूरा कर रहा हूं. अब तो प्रभु को अपना वचन पूरा करने के लिए मेरे प्राण लेने होंगे.
भगवान श्रीराम के क्रोध की कोई सीमा न रही. उन्होंने दूत से कहलवाया कि अपना वचन पूरा करने के लिए वह हनुमानजी से युद्ध करने आ रहे हैं, तैयार रहें.
हनुमानजी दुविधा में आ गए. वह प्रभु के पास आए और प्रणामकर उनसे युद्ध में विजय का आशीर्वाद मांगा. प्रभु ने मुस्काते हुए आशीर्वाद दे दिया.
अब जिसे विजय का आशीर्वाद दिया उससे युद्ध भी करना था. प्रभु ने ब्रह्मास्त्र निकाला और उसका संधान करने लगे.
उसी समय श्रीराम के कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के साथ विश्वामित्र पहुंचे और प्रभु से अनुरोध किया वह ऐसा न करें.
विश्वामित्र ने कहा- मैंने काशीराज को क्षमा कर दिया है. इसलिए आप उसका वध न करें.हनुमानजी तुरंत अपने प्रभु श्रीराम की सेवा में उपस्थित हुए. उन्होंने प्रभु की विविध विधि से वंदना की.
हनुमानजी ने प्रभु को सारी बात बताते हुए प्रभु के वचन की अनदेखी की विवशता बताई. भगवान उनकी वचनशीलता से बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें हृद्य से लगा लिया.
भगवान श्रीराम ने हनुमानजी को आशीर्वाद दिया- आपके कई रूप आज मैंने देखे. आपने पंचमुखी रूप में भक्तों के सिर पर मंडराते काल के संकट को टालने वाले संकटमोचक होंगे. आपकी आराधना से भक्तों में बल, कीर्ति, आरोग्य और निर्भीकता का संचार होगा.
आपके भक्तों को अपार धन-सम्पत्ति, ऐश्वर्य, यश, दीर्धायु व उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होगा और भय, चिंता आदि परेशानायां दूर होंगी. आपके पंचमुख स्वरूप की आराधना से त्रितापों आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक से मुक्ति मिलेगी.
।।सियापति रामचंद्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय।।
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