श्रीहरि ने देवों को दिया जलंधर से मुक्ति का वचन, महालक्ष्मी ने श्रीहरि से ले लिया जलंधर का वध न करने का वचनः कार्तिक माहात्म्य बारहवां अध्याय

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नारदजी ने कहा- जलंधर को अपनी तलाश में आते देखकर इंद्र आदि देवता भयभीत होकर भाग निकले. भागकर वे बैकुंठ पहुंचे और भगवान नारायण को अपना सारा दुख कहा. फिर उनसे रक्षा की प्रार्थना की.
देवताओं के करूण वचन सुनकर करूणा सागर भगवान श्रीहरि ने देवताओं से कहा- आप लोग अपना दुख त्याग दें. मैं जलंधर के अत्याचारों से आपकी मुक्ति के लिए शीघ्र ही प्रयास करूंगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.देवताओं के मन को अपनी करूणामयी वाणी से शांत कराने के बाद भगवान गरूड़ पर सवार हुए और जलंधर का सामना करने युद्ध क्षेत्र की ओर चलने को तैयार हुए. उन्हें युद्ध के लिए तैयार देखकर लक्ष्मीजी को कुछ पीडा हुई.
लक्ष्मीजी बोलीं- हे नाथ मैं भी समुद्र से उत्पन्न हुई हूं, जलंधर भी समुद्र से निकला है. जैसे मैं सागरतनया हूं वैसे ही जलंधर सागरतनय है. इस नाते वह मेरा भाई हुआ. मेरा भाई आपके हाथों युद्ध में मारा जाए तो मैं अपने जनक को क्या उत्तर दूंगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इस पर भगवान विष्णु बोले- हे महालक्ष्मी मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा जिससे आपको असहज होना पड़े. मैं अपने हाथों उसका वध नहीं करूंगा किंतु उसके अत्याचारों से पीड़ित देवों को सहायता का वचन दिया है इसलिए युद्धक्षेत्र में तो जाना ही होगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ऐसा कहकर शंख, चक्र और गदा से सुशोभित श्रीहरि गरूड़ पर सवार होकर युद्धभूमि की ओर चल पड़े. श्रीहरि को देखकर देवसेना में उत्साह आया. गरूड़ ने अपने पंखों को इतने वेग से हिलाया कि तूफान चलने लगा. इससे असुर विचलित हुए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अपनी सेना को परेशान देख जलंधर को श्रीहरि पर बड़ा क्रोध आया. उसने उन पर प्रहार किया. दोनों में भीषण संग्राम आरंभ हो गया. दोनों के मध्य घोर संग्राम का वर्णन अगले अध्याय में.
बारहवां अध्याय पूर्ण. कथा जारी रहेगी…
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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