भागवत कथाः ययाति का देवयानी से विवाह
ययाति और देवयानी की कथाः ययाति-देवयानी विवाह प्रसंग
कच और देवयानी की प्रेम कहानी की पिछली कथा में हमने जाना कि प्रेम यदि चरम पर पहुँचकर यदि घृणा में बदल जाए तो उसकी आग ज्वालामुखी से निकले लावे जैसी ही होती है। एक दूसरे से भरपूर प्रेम करने वाले देवयानी और कच ने प्रेम के आवेश में ही एक दूसरे को शाप दे दिया। कच ने देवयानी को शाप दिया था कि उसका विवाह एक अत्यंत कामासक्त और भोगी व्यक्ति से होगा। ययाति उसके जीवन में उसी शाप का परिणाम था। अब यहां से कच नेपथ्य में चला जाएगा तथा ययाति और देवयानी की कथा शुरू होगी।
कच और देवयानी ने क्यों और क्या शाप दिया, कच-देवयानी की वह कथा नीचे लिंक से पढ़ सकते हैं।
कच और देवयानी की कथा: प्रेम, अपमान और प्रतिशोध की अमर गाथा
सनातन धर्म और पुराणों में कई ऐसी कथाएं हैं जो हमें जीवन के गहरे सत्य, कर्म के फल और मर्यादाओं का पाठ पढ़ाती हैं। श्रीमद्भागवत पुराण में राजा ययाति और देवयानी की कथा और उसमें महत्वपूर्ण मोड़ लाने वाली असुरराजकुमारी शर्मिष्ठा का प्रसंग बड़ा रोचक है। ययाति और देवयानी की यह कथा हमें बताती है कि अहंकार,श्राप और वासना मनुष्य के जीवन को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। आइए, इस पूरी कथा को विस्तार से जानते हैं।
देवयानी और शर्मिष्ठा के वस्त्रों की अदला-बदली से बदल गया इतिहास
एक बार दानवराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा और शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी अपनी सखियों के साथ वन में एक सुंदर सरोवर के पास घूमने गईं। सभी ने अपने वस्त्र उतारे और सरोवर में जल विहार करने लगीं। संयोगवश, भगवान शंकर उधर से निकले।
भगवान शंकर के आने की सूचना से सभी सखियों ने घबराकर जल्दी-जल्दी में अपने वस्त्र पहने। भूलवश या जल्दबाजी में शर्मिष्ठा ने देवयानी के वस्त्र पहन लिए। जब देवयानी ने शर्मिष्ठा को अपने कपड़े पहने देखा, तो वह आग-बबूला हो गई।
देवयानी दैत्यगुरु की बेटी थी और उसका सम्मान राजकुमारी से भी अधिक था। इस पर कच के साथ उसका संबंध विच्छेद हुआ था। तब से वह चिड़चिड़ी भी हो गई थी। गुस्से में उसने शर्मिष्ठा को बहुत खरी-खोटी सुना दी। सखियों के बीच उसका बड़ा अपमान किया।
अपमान का प्रतिशोध और देवयानी को कुएं में फेंकना

शर्मिष्ठा भी कोई ऐरी-गैरी असुरकुमारी नहीं थी। वह असुरराज की बेटी थी। देवयानी द्वारा इस तरह उसका अपमान करने से शर्मिष्ठा भी बहुत क्रोधित हो गई। दोनों के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हुई। बात बढ़ती-बढ़ती इस हद तक पहुँच गई कि शर्मिष्ठा ने सखियों की सहायता देवयानी की खूब पिटाई की।
वह इतने से ही नहीं मानी। गुस्से में उसने देवयानी के वस्त्र भी छीन लिए। देवयानी को पास ही के एक सूखे कुएं में फेंक दिया। इसके बाद शर्मिष्ठा अपनी सखियों के साथ वहां से चली गई।
देवयोग से, उसी समय चंद्रवंशी राजा पुरुरवा के वंशज राजा ययाति उधर से गुजर रहे थे। हुए उस स्थान पर आए। उन्होंने कुएं के अंदर से किसी के रोने और पुकारने की आवाज सुनी। जब ययाति ने कुएं में झांका तो एक सुंदर कन्या को दुखी पाया।
राजा ययाति ने तुरंत अपने वस्त्र कुएं में लटकाकर देवयानी को सुरक्षित बाहर निकाला।
ययाति और देवयानी की कथाः देवयानी ने दिया का विवाह प्रस्ताव

कुएं से बाहर आने के बाद देवयानी ने राजा ययाति से कहा-
“हे राजन! आपने मेरा हाथ पकड़कर मेरे प्राणों की रक्षा की है। अब इस संसार में किसी अन्य पुरुष को मेरा हाथ पकड़ने का अधिकार नहीं है। मैं आज से अपना जीवन आपको समर्पित करती हूं और आपसे विवाह करना चाहती हूं।”
राजा ययाति यह सुनकर हतप्रभ रह गए। उन्होंने देवयानी से उसका परिचय पूछा। तब देवयानी ने विस्तार से बताया कि वह असुरों के गुरु महर्षि शुक्राचार्य की पुत्री है।
देवयानी ने आगे अपनी व्यथा सुनाई कि किस प्रकार देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच उनके पिता के पास मृत संजीवनी विद्या सीखने आए थे और उसे कच से प्रेम हो गया था। किंतु कच को उससे प्रेम नहीं था। क्रोध में आकर देवयानी ने कच को श्राप दिया था और कच ने भी प्रतिशोध में उसे श्राप दिया था कि कोई भी ब्राह्मण पुत्र उससे विवाह नहीं करेगा।
देवयानी ने ययाति से कहा कि चूंकि वह एक क्षत्रिय राजा हैं और ब्राह्मण पुत्र उससे विवाह नहीं कर सकता, इसलिए वे उसके साथ विवाह कर लें। राजा ययाति देवयानी के प्रस्ताव से सहमत हो गए और विवाह के लिए राजी हो गए।
यहां के ययाति और देवयानी की कथा ने एक ऐसा रोचक मोड़ लिया जिसने आगे चलकर भारतवर्ष का इतिहास लिखा।
शुक्राचार्य का क्रोध और वृषपर्वा का समर्पण

राजा ययाति ने देवयानी को उचित वस्त्र और सम्मान दिया तथा अपने सेवकों के साथ उसे महर्षि शुक्राचार्य के पास भेज दिया। देवयानी ने अपने पिता के पास पहुंचते ही शर्मिष्ठा द्वारा किए गए अपमान और मारपीट की सारी बात रोते हुए कह सुनाई।
यह सुनकर शुक्राचार्य अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने असुर लोक छोड़कर तत्काल वहां से प्रस्थान करने का निर्णय ले लिया। शुक्राचार्य के जाने का अर्थ था असुरों की रक्षा और संजीवनी विद्या का संकट में पड़ जाना।
इधर, जब दानवराज वृषपर्वा को इस बात की भनक लगी कि शुक्राचार्य रुष्ट होकर जा रहे हैं, तो वे घबरा गए। वे जानते थे कि गुरु के बिना उनका राज्य और कुल नष्ट हो जाएगा। वृषपर्वा दौड़ते हुए शुक्राचार्य के पास पहुंचे और उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे।
शर्मिष्ठा की दासी के रूप में विदाई
शुक्राचार्य ने स्पष्ट कहा- “वृषपर्वा! मैं तुम पर अप्रसन्न नहीं हूं, किंतु तुम्हें मेरी पुत्री देवयानी को प्रसन्न करना होगा।”
तब वृषपर्वा ने देवयानी से प्रार्थना की कि वह उसे प्रसन्न करने के लिए जो भी चाहे मांग सकती है। शर्मिष्ठा उसकी अपराधी है, इसलिए वह जो भी दंड तय करेगी, उसे स्वीकार किया जाएगा।
देवयानी ने तुरंत अपनी प्रतिशोध की भावना के तहत सजा सुनाई-
“शर्मिष्ठा मेरे पति के महल में मेरी दासी बनकर रहेगी।”
शर्मिष्ठा दूरदर्शी और समझदार थी। वह जानती थी कि यदि उसने यह दंड स्वीकार नहीं किया, तो शुक्राचार्य के शाप के कारण पूरे असुर कुल का विनाश हो जाएगा। उसने अपने कुल की रक्षा के लिए देवयानी की यह शर्त स्वीकार कर ली और विवाह के पश्चात अपनी सखियों के साथ ययाति के महल में दासी के रूप में रहने को राजी हो गई।

महर्षि शुक्राचार्य ने राजा ययाति से विशेष वचन लिया कि शर्मिष्ठा एक राजकुमारी और अतुलित सुंदरी है। यद्यपि वह दासी के रूप में रहेगी और दासी पर राजा का अधिकार होता है। किंतु राजा ययाति भूले से भी कभी शर्मिष्ठा के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाएंगे। राजा ययाति से यह वचन मिलने के बाद ही शुक्राचार्य ने देवयानी का विवाह कराया।
शर्मिष्ठा का महल और ययाति का मोहभंग
शर्मिष्ठा अन्य दासियों के साथ राजा ययाति के महल के समीप ही एक कुटी में रहने लगी। कुछ समय तक तो राजा ययाति ने अपने वचनों का पूरी निष्ठा से पालन किया और शुक्राचार्य को दिए गए वादे से बंधे रहे। किंतु नियति और पूर्वजन्मों के कर्मों का फेर किसी से नहीं छूटता। कच द्वारा दिए गए श्राप और देवयानी के जीवन का प्रभाव ययाति के जीवन पर पड़ने लगा।
एक दिन देवयोग से राजा ययाति और शर्मिष्ठा का एकांत में मिलन हुआ। शर्मिष्ठा के सौंदर्य और उसकी विनम्रता से राजा का मन विचलित हो गया। दोनों में प्रेम संबंध स्थापित हो गए। शुक्राचार्य को दिए गए अपने वचनों को भुलाकर ययाति छुप-छुपकर शर्मिष्ठा से मिलने लगे।

इन गुप्त संबंधों के परिणामस्वरुप शर्मिष्ठा के गर्भ से तीन तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। दूसरी ओर, देवयानी भी दो पुत्रों की माता बन चुकी थी। देवयानी इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि उसकी दासी शर्मिष्ठा और उसके पति ययाति के बीच क्या चल रहा है।
शुक्राचार्य का शाप और वृद्ध अवस्था
शीघ्र ही देवयानी को इस सत्य का पता चल गया कि शर्मिष्ठा और ययाति के बीच प्रेम संबंध हैं और उनके पुत्र भी हो चुके हैं। वह अत्यंत क्रोधित हुई और तुरंत अपने पिता शुक्राचार्य के पास दौड़कर गई तथा पूरी सच्चाई बताई।
अपनी पुत्री का ऐसा अपमान देखकर महर्षि शुक्राचार्य का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने राजा ययाति को बुलाया और कड़ा शाप दिया-
“हे ययाति! तुम मोह और व्यभिचार में अंधे हो गए हो। तुमने मेरे वचन का अपमान किया है, इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम तत्काल युवावस्था छोड़कर वृद्ध और शक्तिहीन हो जाओ!”
शुक्राचार्य के इस भयानक शाप से राजा ययाति उसी क्षण बूढ़े और असमर्थ हो गए। उनके जीवन में बुढ़ापा आ गया, जिससे वे भोग-विलासों के योग्य नहीं रहे। ययाति में अभी भोग-विलास और कामसुख की लालसा बहुत प्रबल थी।
वृद्ध और शक्तिहीन होने का शाप सुनकर वे अधीर हो उठे। उनके मन में प्राण त्यागने के विचार आने लगे। देवयानी ने भांप लिया कि यह सब कच के शाप का फेर है। फिर यदि पति जीवित न रहे और सौतन के पुत्र भी हैं तो फिर राज्य का क्या होगा? ययाति का उत्तराधिकारी कौन होगा?
वह फिर से भागी-भागी अपने पिता के पास पहुँची। अपने पति को यौवन वापस दिलाने की प्रार्थना की।
अपनी बेटी की प्रसन्नता और दौहित्रों के सुख के लिए आखिर शुक्राचार्य ने क्या रास्ता निकाला। यह कथा तो और भी रोचक है।
ययाति और देवयानी की कथा का अगला भाग नीचे लिंक से पढ़ें। शुक्राचार्य ने क्या रास्ता निकाला?
ययाति और देवयानी की कथा का अगला भाग पढ़ें नीचें लिंक से:
ययाति की कहानी: शुक्राचार्य ने दिया बुढ़ापा का शाप, राजा को मिला यौवनदान
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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