June 13, 2026

परमा (पुरुषोत्तमी) एकादशी व्रत कथा

परमा (पुरुषोत्तमी) एकादशी व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—
“हे जनार्दन! अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? कृपा करके उसकी विधि और महात्म्य बताइए।”

भगवान श्रीकृष्ण बोले—
“हे राजन्! अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा, पुरुषोत्तमी या कमला एकादशी कहा जाता है। यह अत्यंत दुर्लभ, पुण्यप्रद और समस्त पापों का नाश करने वाली है।”
कथा
प्राचीन काल में काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नामक एक धर्मात्मा ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास करता था। दोनों अत्यंत निर्धन थे, परंतु अतिथि सेवा और धर्म के पालन में सदैव तत्पर रहते थे। स्वयं भूखे रहकर भी वे अतिथियों को भोजन कराते थे।
एक दिन ब्राह्मण ने कहा—
“प्रिये! अब जीवन कठिन हो गया है। मुझे परदेश जाकर धन अर्जित करना चाहिए।”
पत्नी ने विनम्रता से उत्तर दिया—
“हे स्वामी! मनुष्य को अपने कर्मों का फल भाग्य अनुसार ही मिलता है। जो ईश्वर ने निर्धारित किया है, वही होगा। आप यहीं रहें।”
पत्नी के वचनों से प्रभावित होकर ब्राह्मण ने यात्रा का विचार त्याग दिया।
कुछ समय बाद वहाँ कौण्डिन्य ऋषि पधारे। दंपती ने उनका श्रद्धापूर्वक स्वागत किया। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि ने कहा—
“यदि तुम दोनों इस दरिद्रता से मुक्ति चाहते हो, तो अधिक मास के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इस दिन स्नान कर भगवान विष्णु के समक्ष संकल्प लेकर पूजन करना चाहिए, ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देना चाहिए, और स्वयं नियमपूर्वक व्रत का पालन करना चाहिए। यह व्रत केवल दरिद्रता ही नहीं, सभी पापों का नाश करता है। इसके प्रभाव से कुबेर ने धनाध्यक्ष का पद प्राप्त किया था और सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र को भी सुख-समृद्धि मिली थी।”
व्रत का फल
ऋषि के वचनों पर विश्वास कर सुमेधा और उसकी पत्नी ने श्रद्धापूर्वक यह व्रत किया। परिणामस्वरूप उनकी दरिद्रता समाप्त हो गई, जीवन में सुख-समृद्धि आई और अंततः वे भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त हुए।
श्रीकृष्ण ने कहा— “हे राजन्! जो व्यक्ति विधिपूर्वक इस परमा एकादशी का व्रत करता है, उसके समस्त पाप, दुख और दरिद्रता नष्ट हो जाते हैं। वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।”

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