June 13, 2026

कामिका एकादशी व्रत कथा

कामिका एकादशी व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रतापूर्वक पूछा—“हे जनार्दन! श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है? कृपा करके उसका माहात्म्य बताइए।”

जो मनुष्य श्रावण में भगवान का पूजन करते हैं, उनसे देवता, गंधर्व और सूर्य आदि सब पूजित हो जाते हैं। कामिका व्रत से जीव कुयोनि को प्राप्त नहीं होता। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन भक्तिपूर्वक तुलसी दल भगवान विष्णु को अर्पण करते हैं, वे इस संसार के समस्त पापों से दूर रहते हैं। विष्णु भगवान रत्न, मोती, मणि तथा आभूषण आदि से इतने प्रसन्न नहीं होते जितने तुलसी दल से।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कामिका एकादशी की रात्रि को दीपदान तथा जागरण के फल का माहात्म्य चित्रगुप्त भी नहीं कह सकते। जो इस एकादशी की रात्रि को भगवान के मंदिर में दीपक जलाते हैं उनके पितर स्वर्गलोक में अमृतपान करते हैं तथा जो घी या तेल का दीपक जलाते हैं, वे सौ करोड़ दीपकों से प्रकाशित होकर सूर्य लोक को जाते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कामिका एकादशी कि कथा सुनने मात्र से से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। कामिका एकादशी के व्रत का माहात्म्य श्रद्धा से सुनने और पढ़ने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को जाता है।

इस एकादशी की दो कथाएं आती हैं-

पहली कथा-

प्राचीन काल में किसी गांव में एक क्रोधी क्षत्रिय निवास करता था. स्वभाव से क्रोधी होने के कारण वह हर किसी से झगडा कर लेते. एक दिन किसी बात पर उनका विवाद एक ब्राह्मण से हो गया. बात इतनी बड गयी कि क्रोध में आकर उस क्षत्रिय के हाथों ब्राहमण की हत्या हो गई.

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जब क्रोध शांत हुआ तो उसने अपने पाप को स्वीकारा और बहुत पछताया परन्तु अब तो ब्राहमण मर चुका था। उस क्षत्रिय ने ब्राहमण की क्रिया करने की इच्छा प्रकट की तो पंडितों ने मना कर दिया और उसे ब्रह्महत्या का दोषी माना गया। परिणामस्वरूप ब्राह्मणों ने भोजन करने से इंकार कर दिया।

तब वे एक मुनि के पास गए और उन्हें सारी बात बताकर इस पाप के नाश का रास्ता बताने का निवेदन किया। मुनि ने कहा कि तुम्हें अपने किए पर पश्चाताप है और तुम शुद्ध मन से मेरे पास आए हो तो मैं तुम्हें मार्ग अवश्य बताऊंगा।

मुनि ने उसे पूरे श्रद्धाभाव और विधि-विधान के साथ कामिका एकाद्शी व्रत करने की प्रेरणा दी। उसने वैसा ही किया जैसा मुनि ने उसे बताया था। जब रात्रि में भगवान की मूर्ति के पास जब वह शयन कर रहा था। तभी उसे स्वपन में प्रभु दर्शन देते हैं और उसके पापों को दूर करके उसे क्षमा दान देते हैं।

इस तरह से वह व्यक्ति ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होकर हरिलोक को गया।

दूसरी कथा
भगवान श्रीकृष्ण बोले— “हे राजन! श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी कामिका एकादशी कहलाती है। यह समस्त पापों का नाश करने वाली, पुण्य प्रदान करने वाली और मनोवांछित फल देने वाली है।”

प्राचीन काल में सत्ययुग में महिजित नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। वह धर्म और न्याय से प्रजा का पालन करता था, किंतु उसके जीवन में एक ही दुःख था—उसके कोई संतान नहीं थी। इस कारण वह मन ही मन अत्यंत व्यथित रहता था।
राजा ने एक दिन अपने मंत्रियों और पुरोहितों की सलाह से वन में निवास करने वाले महर्षि अंगिरा के आश्रम में जाकर अपनी व्यथा प्रकट की।

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महर्षि अंगिरा ने ध्यानपूर्वक उसके पूर्व जन्मों का अवलोकन किया और कहा—“हे राजन्! पूर्वजन्म में तुम एक निर्धन व्यापारी थे। एक बार तुमने प्यास से व्याकुल एक ब्राह्मण को जल देने से इनकार कर दिया था। उसी कर्म के कारण तुम्हें इस जन्म में संतान का अभाव प्राप्त हुआ है।”

फिर उन्होंने करुणा से कहा—“यदि तुम इस दोष से मुक्ति चाहते हो तो श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत करो।”

राजा ने महर्षि के वचनों को पूर्ण श्रद्धा से स्वीकार किया और विधिपूर्वक कामिका एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसके समस्त पाप नष्ट हो गए और उसे संतान की प्राप्ति हुई। उसके राज्य में पुनः सुख, शांति और समृद्धि का वातावरण फैल गया।

भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा— “हे धर्मराज! जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत करता है, उसके समस्त पाप भस्म हो जाते हैं और वह उत्तम गति को प्राप्त करता है।”

शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन भगवान विष्णु के समक्ष दीपदान, पूजन और रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। एकादशी के दिन किया गया दीपदान अनेक जन्मों के पुण्यों के समान फल देता है।

यह भी कहा गया है कि इस दिन भगवान के समक्ष जलाया गया दीप पितरों को तृप्त करता है और उन्हें स्वर्गलोक में संतोष प्रदान करता है। जो श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर अंततः भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है।

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