वाल्मीकि ने नहीं तो किसने लिखी पहली राम कथा? जानिये यह अद्भुत रहस्य
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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंभगवान श्रीराम के जीवन गाथा पर आधारित रामकथा सुनाने वाली बहुतेरी कथायें लिखी गयीं. यहां तक कि कबंध नाम के एक राक्षस ने भी कबंध रामायण लिखी. पर सबसे पहले यदि किसी ने कोई रामकथा लिखी तो वह थे श्रीराम भक्त हनुमान.
भगवान श्रीराम रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या लौटकर राजगद्दी संभाली तो जनता की उम्मीदें बहुत बढ गयीं थीं. श्रीराम ने भी जनता की आशाएं पूरे करने के लिये सुशासन के प्रबंध करने में बहुत व्यस्त हो गए.
राज काज में भगवान की व्यस्तता देख श्री हनुमानजी भी शिव धाम कैलाश पर्वत पर तपस्या करने चले गये. हनुमानजी ने वहां भगवान शिव की तपस्या आरंभ की. तपस्या से जो भी समय बचता अपने प्रभु और बीते दिनों को याद करते.
इस दौरान हनुमानजी जो कुछ सोचते उसे हर दिन आस पास के पत्थरों पर अपने नाखूनों से दर्ज करते जाते. भगवान राम के जीवन के कई प्रसंग जो उन्होंने खुद भगवान राम और सीता माता के श्रीमुख से सुने थे वे सब भी वहां दर्ज थे,यह विवरण किसी और के लिये दुर्लभ थे.इस तरह उन्होंने प्रभु श्रीराम का जीवन चरित, उनकी लीला. और महिमा का उल्लेख करते हुए उन्हें पत्थरों पर ही उकेर कर एक महान और विस्तृत ग्रंथ की रचना कर दी. हनुमान जी ने अपनी इस रचना को न तो किसी को दिखाया था न ही उसे कोई नाम दिया था.
कुछ समय बाद महर्षि वाल्मीकि शिव धाम कैलाश पर्वत पहुंचे. वाल्मीकि ने रामकथा पर आधारित ‘वाल्मीकि रामायण’ लिखी थी. उनकी इच्छा अपनी लिखी रामायण को भगवान शंकर को दिखाकर उन्हीं को समर्पित करने की थी. वहां उन्होंने हनुमानजी को देखा और कुशल क्षेम पूछी.
हनुमान जी की रचना तो वहीं पत्थरों पर ही खुदी थी सो वह वाल्मीकि जी की नजर में आ गयी. वालमीकि जी ने उसे देखा और पढा. रामभक्त हनुमान की लिखी इस रामकथा को उन्होंने नाम दिया, हनुमद रामयण. ‘हनुमद रामायण’ के दर्शन कर वाल्मीकिजी निराशा में डूब गये.
वाल्मीकिजी को निराश देखकर हनुमानजी ने उनसे उनकी निराशा का कारण पूछा. वाल्मीकि बोले, मैंने बड़े ही कठिन साधना के बाद एक रामायण लिखी है जिसे दिखाने भगवान शंकर के पासा आया हूं. पर इस बात में कोई शक नहीं कि पत्थरों पर यह रामायण आपने पहले ही लिख दी है.हनुमान जी बोले, महर्षि आप चिंता न करें इसको मैंने अभी भगवान शंकर को प्रस्तुत नहीं किया है. इसे आप के अलावा किसी और ने भी नहीं देखा है. आप ही अपनी रामायण पहले प्रस्तुत करें. इस तरह से आप की रामयण पहली मानी जायेगी. मैंने तो प्रभु की याद में जो विचार आये वह लिख दिया है मेरी प्रसिद्धि पाने या इस प्रकार की कोई इच्छा नहीं है.
वाल्मीकि जी बोले, हनुमत, बात पहले लिखने की नहीं है, आपकी रामायण देखकर लगता है कि इसके आगे मेरी रामायण को कोई नहीं पूछेगा, वह चाहे कविता,साहित्य रचने का मामला हो या कथा विस्तार, आस्था अथवा भरोसेमंद होने का. सच यही है कि आपने जो लिखा है उसके सामने मेरी रामायण तो कुछ भी नहीं है.
हनुमान जी ने वाल्मीकिजी की चिंता दूर करने के लिये उन्हें बहुत समझाया पर वाल्मीकि जी को लगता था इस हनुमद रामायण के चलते उनका पूरा जीवन और जीवन भर की जोड़ी कमाई ही चली गयी. उनकी निराशा दूर न हुई. तब श्री हनुमानजी ने जिन पत्थरों पर हनुमद रामायण उकेरा गया था उन सबको एक जगह इकट्ठा कर लिया.
हनुमान जी ने हनुमद रामायण को एक कंधे पर उठाया और दूसरे कंधे पर महर्षि वाल्मीकि को बिठाया. वे कैलाश से उड़े तो सीधे समुद्र के पास जा कर उतरे. वाल्मीक जी को उतारा और अपनी रचना अपने भगवान प्रभु श्रीराम को समर्पित करते हुए गहरे समुद्र में ले जा कर डाल दिया.
तट पर खड़े वालमीकि हनुमानजी द्वारा अपनी रामायण को गहरे समुद्र में प्रवाहित करना देख अचरज से भर गये.महर्षि वाल्मीकि बोले, हे रामभक्त श्रीहनुमान, आप धन्य हैं! आप जैसे ज्ञानी और दयावान की महिमा का गुणगान करने के लिए मुझे एक जन्म और लेना होगा. मैं वचन देता हूं कि कलियुग में मैं एक और रामायण लिखने के लिए जन्म लूंगा,
सैकड़ों बरस बाद महाकवि कालिदास के समय में एक बड़ा सा ऐसा पत्थर समुद्र के किनारे पाया गया जिस पर कुछ लिखा जान पड़ता था. इस पत्थर को एक सार्वजनिक जगह पर टांग दिया गया. घोषणा करा दी गयी कि जो भी विद्वान या विद्यार्थी उसे पढ कर उसका अर्थ निकल सकेगा उसे ईनाम दिया जाएगा.
तमाम विद्यार्थी और तरह तरह के विद्वान उस पत्थर पर लिखे को न पढ पाये. आखिरकार महाकवि कालिदास ने उस गूढ़लिपि को पढ़कर उसका अर्थ निकाल लिया और बताया कि यह पत्थर का टुकड़ा हनुमानजी द्वारा लिखे हनुमद रामायण का ही एक हिस्सा है जो कि बड़ी सी चट्टान से टूट कर पानी के बहाव में यहं तक आ गया है.
धर्मधुरंधर मानते हैं कि रामचरितमानस लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास दूसरा जन्म लिये हुए महर्षि वाल्मीकि थे. तभी तो उन्होंने अपनी ‘रामचरित मानस’ लिखने के पहले हनुमान चालीसा लिखा और श्रीरामचंद्र से भी पहले हनुमानजी का गुणगान किया. यह भी बताया कि वे हनुमानजी की प्रेरणा से ही रामचरित मानस लिख रहे हैं.
आज वाल्मीकि रामायण, श्रीराम चरित मानस, तो क्या अद्भुत और आनंद रामायण जैसी तकरीबन तीनसौ राम कथायें हमारे पास हैं जबकि सबसे विश्वसनीय रामायण आज हमारे बीच नहीं. कहा जाता है कि वह महासमुद्र की अतल गहराइयों में है.
बोलो सियापति रामचन्द्र की जय , पवनसुत हनुमान की जय.
स्रोत : लोकगाथा
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