महादेव की कृपा से चोर के घर चोरी करने वाले को कैसे मिला स्वर्ग

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंप्राचीन काल में कांचीपुरी बहुत मशहूर और संपन्न शहर था. इस नगरी में एक चोर रहता था जिसका नाम था वज्र. वज्र अपने काम में बहुत माहिर था. बड़ी बड़ी चोरियां तो वह करता ही, छोटी मोटी पर भी हाथ साफ करने में उसे कोई झिझक न थी.
वज्र शायद ही कभी छुट्टी करता, रोज चोरी कर के जो भी कम या अधिक माल मत्ता मिलता वह राज रक्षकों की आँख बचा कर,आधी रात के बाद जंगल में जा जमीन खोद कर गाड आता.
कांचीपुरी के पास का ही रहने वाला था वीरदत्त. किरात जाति का यह लकड़हारा जंगल से लकड़ी ला, बाजार में बेच कर गुजारा करता था. उस दिन जंगल में ऐसा फंसा कि रात हो गयी. वह रात गुजारने के लिये एक घने पेड़ पर चढ कर बैठ गया.
रात में उसने वज्र को चोरी का माल जमीन खोद कर छुपाते हुये देख लिया. सुबह हुई और उसने जमीन में गड़े धन में से थोड़ा धन निकाल लिया और फिर गढ्ढा पहले जैसे ही भर कर अपने घर चला गया.लकड़हारे को इस तरह के बिना मेहनत के धन का ऐसा चस्का लगा कि हर दूसरे तीसरे जंगल जा कर चोर के छिपाये धन में से उसका दसवां हिस्सा निकाल लेता.
चालाक लकड़हारा जानता था कि चोर चोरी के माल का पूरा हिसाब तो रखता नहीं होगा और इतना भर चुराने से उसको पता नहीं लगेगा. पर लकड़हारे वीरदत्त की पत्नी को शक हो ही गया. पूछ्ताछ की तो किरात लकड़हारे ने सब बता दिया.
लकड़हारे की बीबी बोली, जो धन अपनी मेहनत से मिलता है वही टिकता है और अच्छा होता है, किसी भी दूसरी तरह से आया धन नष्ट हो जाता है और अच्छा भी नहीं होता. हमें इस धन से जनता की भलाई के काम करने चाहिये.
वीरदत्त को पत्नी की बात जंच गयी. कांचीपुरी और उसके आसपास तो बहुत से बढिया बावड़ियां, तालाब और कुंए थे इसलिये वीरदत्त ने दूर की एक जगह चुन कर बहुत बड़ा तालाब खुदवाया.तालाब खूब बड़ा था, गर्मी में भी उसमें पानी बन रहता. पर उसकी सीढियां बनवाते तक पैसा चुक गया. वीरदत्त ने फिर वज्र का पीछा किया और पहले ही की तरह धन निकाल लाया. अब तो सीढियां ही नहीं चबूतरे भी बनवा दिये.
चोर के धन से चुरा चुरा कर वीरदत्त ने भगवान विष्णु और शिव शंकर के भव्य मंदिर भी बनवाये. आसपास के जंगल कटवा कर जमीन तैयार करायी और ब्राह्मणों को बांट दिया.
एक बार ब्राह्मणों को बुला कर खूब पूजा पाठ करवाया और उन्हें कपड़े गहने तक दान में दिये. कुछ के घर ठीक कराये तो कुछ के लिये नयी व्यवस्था कर दी. ब्राह्मण प्रसन्न हुये, किरात लकड़हारे वीरदत्त का नाम उन्होंने द्विजवर्मा रख दिया.
द्विजवर्मा की मृत्यु हुई तो उसे लेने यम के दूत तो पहुंचे ही भगवान शंकर और प्रभु विष्णु के दूत भी पहुंच गये. तीनों में बहस हो गयी. द्विजवर्मा को कौन ले जाये. इसी दौरान नारद जी वहां आ गये.
नारदजी ने कहा, झगड़ो मत, मेरी बात सुनो. द्विजवर्मा ने चोरी के धन से धर्म कर्म किया. जब तक बुरे रास्ते से आये पैसे का प्रायश्चित्त न हो जाये तब तक इसे न स्वर्ग मिलेगा न नर्क.नारद जी ने का आगे कहा, द्विजवर्मा को इसके पछतावे लिये बारह वर्ष तक प्रेत बन कर घूमना पड़ेगा. उधर नारद ने द्विजवर्मा की पत्नी से कहा कि तुमने उसे भले काम में लगाया, इसलिये तुम तो ब्रह्मलोक में जाओगी.
किरात लकड़हारे वीरदत्त यानी द्विजवर्मा की पत्नी अपने पति के दुःख से दुःखी थी, वह बोली मैं तो वही गत चाहती हूं जो मेरे पति की हो. जब तक मेरे पति के देह नहीं मिलती, कहीं नहीं जाउंगी. यह जवाब सुन कर नारद खुश हो गये.
नारद जी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर द्विजवर्मा की पत्नी को इस लायक बना दिया कि वह भगवान शंकर की विधिवत आराधना कर सके और कहा किसी तीर्थ में जाकर अपने पति की सद्गति और मुक्ति के लिए महादेव की पूजा और जप करो.
द्विजवर्मा की पत्नी ने बड़ी लगन से भगवान शिव की आराधना की. इससे उसे पुण्य लाभ तो हुआ ही द्विजवर्मा के चोरी का सारा पाप भी धुल गया, दोनो पति पत्नी को उत्तम लोक मिला.
द्विजवर्मा को तो स्वर्ग में गाण्पत्य पद प्राप्त हुआ ही वज्र चोर तथा कांची पुरी के जिस भी धनी का धन उसके द्वारा की गयी चोरी के जरिये इस धर्म कर्म में लगा था वे सब भी सपरिवार स्वर्ग चले गये. (स्रोत : ब्रह्मांड पुराण)
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