ऋषि के शाप से विद्वान के घर जन्मा महामूर्ख, जगदंबा की कृपा से महामूर्ख हुआ परमज्ञानी

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंबृहस्पति, सुहोत्र, याज्ञवल्क्य, पैल, गोभिल जैसे विख्यात ऋषि तमसा नदी के तट पर पुत्रयेष्टि यज्ञ चल रहा था. कौशल देश के नामी ब्राह्मण देवदत्त संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ करवा रहे थे.
देवदत्त के विवाह के लंबे समय बाद भी कोई संतान न हुई. देवदत्त ने सोचा कि विद्वान आचार्यों द्वारा यज्ञ संपन्न कराया जाए ताकि जो पुत्र प्राप्त हो वह तेजस्वी हो.
तेजस्वी पुत्र के लोभ में देवदत्त पूरे यज्ञ पर नजर रखे था. गोभिल ऋषि सामवेद के रथन्तर मंत्र का उच्चारण कर रहे थे. उच्चारण के बीच उनके स्वर कुछ ऊपर नीचे हो गए.
देवदत्त ने देखा तो लगा कि कहीं इस चूक के कारण उनका पुत्र कम प्रतिभाशाली न हो जाए. इसलिए झल्लाकर गोभिल से बोला- मुनिवर! यह यज्ञ उत्तम पुत्र-प्राप्ति के लिए कर रहा हूं. आपने स्वर ही गड़बड़ा दिया.
देवदत्त का टोकना गोभिल ऋषि को बुरा लगा. वह बोले- दुष्ट! सब के शरीर में सांस आती जाती है. इससे सुर भी इधर उधर हो सकते हैं. इसमें किसी क्या दोष? बिना सोचे-विचारे तुमने मेरा अपमान किया.मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि इस यज्ञ के परिणामस्वरूप तुम्हारे घर पैदा होने वाला पुत्र महामूर्ख और हठी होगा. गोभिल का शाप सुनकर देवदत्त थर-थर कांपते हुए क्षमा मांगने लगा.
देवदत्त ने कहा- अपराध क्षमा करें. संतान न होने के दुःख में मैं इतना हताश हूं कि भूल गया था कि यज्ञ के लिए आए ऋषिगण साक्षात् देवस्वरूप होते हैं. दया कीजिए इस शाप से मेरा उद्धार कीजिये.
देवदत्त गोभिल ऋषि के चरणों में गिरकर रोने बिलखने लगा तो ऋषि का क्रोध शांत हो गया और वह बोले- मुख से निकले वचन वापस नहीं आते. शाप तो मैं दे ही चुका हूं. वह तो अवश्य सिद्ध होगा.
पर अब मैं यह आशीर्वाद भी देता हूँ कि तुम्हारा पुत्र महामूर्ख होकर फिर विद्वान हो जाएगा. उसमें और भी खूबियां होंगी जिससे वह संसार भर में प्रसिद्ध होगा. उसे स्मरण किया जाएगा.
यह आशीर्वाद पाकर देवदत्त खुश हो गया. यज्ञ के बाद सही समय पर देवदत्त की पत्नी रोहिणी ने सुंदर बालक को जन्म दिया. देवदत्त ने उस बालक का नाम उतथ्य रखा.
थोड़ा बड़ा हुआ उतथ्य तो गुरु के पास भेजा गया. गुरु उतथ्य को खूब पढ़ाते पर उतथ्य एक भी शब्द सही से न बोल पाता. बारह बरस बीत गए पर उतथ्य पहले दिन की ही तरह मूर्ख ही रहा.कोसल नगरी के आसपास के इलाकों में लोग कहते कि परम विद्वान देवदत्त को बेटा हुआ तो महामूर्ख. हर ओर से उड़ती हंसी से उतथ्य का मन समाज से खट्टा हो गया. वह बैरागी हो गया.
एक दिन वह सब कुछ छोड़-छाड़ कर वन में चला गया. उतथ्य ने गंगातट पर कुटिया बनाई और ब्रह्मचर्य का पालन करते साधना करने लगा. उसने यह नियम बना लिया कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा.
इस तरह चौदह वर्ष बीत गए. देवदत्त ने भी उसे नहीं बुलाया क्योंकि उतथ्य के मूर्ख होने के कारण उनका उपहास ही होता था. इन चौदह वर्षों में उतथ्य ने न तो कोई मंत्र जपा न कोई उपासना की न विद्या सीखी.
करता भी कैसे उसे कुछ ज्ञान ही नहीं था पर इतने दिनों में यह बात चारों ओर फैल गई कि गंगातट पर रहने वाले साधु हमेशा सत्य बोलते हैं. उनके मुख से निकली वाणी कभी झूठी नहीं होती. इस प्रसिद्धि के चलते उतथ्य को लोग सत्यव्रत कहने लगे.
एक बार उतथ्य अपनी कुटिया के पास आसन लगाए मजे में बैठे थे तभी एक घायल जंगली सूअर भागता हुआ आया. सुअर को कई तीर लगे थे. उसने बड़ी आशा से सत्यव्रत की ओर देखा.
घायल सुअर बेतहाशा भागता हुआ उतथ्य की ओर आ रहा था. उसे देख सत्यव्रत के मुंह से अचानक निकला ‘ऐ-ऐ’. भय और दया के भाव से अनचाहे ही उतथ्य ने इस अक्षर को कई बार बोला.यह देवी के सारस्वत बीज मंत्र ‘ऐं’ के काफी करीब है जिसको उसने न तो कभी सुना था और न ही कभी बोला था. अनजाने ही उसके मुह से ‘ऐं’ की बजाय केवल ऐ ही निकला.
उसकी सत्यनिष्ठा से देवी तो पहले से ही प्रसन्न थीं. वह तो उसे दर्शन देकर उसका जीवन सुधारने का मार्ग देख रही थीं. भगवती जगदम्बा ने उतथ्य के हृदय में दुर्लभ विद्या का संचार कर दिया.
जगदम्बा की कृपा से मूर्ख उतथ्य पल भर में ही सभी विद्याओं का ज्ञाता हो गया. घायल सुअर भागकर सत्यव्रत की कुटिया में छिप गया. उसे खोजता एक शिकारी आ खड़ा हुआ.
शिकारी ने उतथ्य को आसन पर बैठा देख प्रणाम किया और पूछा- आपने किसी घायल शूकर को देखा है? उतथ्य धर्मसंकट में फँस गया. सत्य बोले तो जीव हत्या, झूठ बोले तो उसका सत्यव्रत टूट जाएगा.
उतथ्य चुप रहा. शिकारी बोला मेरा परिवार दो दिन से भूखा है, आज यही एक शिकार मिला था. यह न मिला तो मेरे बच्चे तो भूख से मर जायेंगे. उतथ्य अब ज्ञानवान हो गया था.उतथ्य ने कहा- हे व्याध! मैंने जिन आँखों से तुम्हरे शिकार को देखा है, वे आंखें बोल नहीं सकतीं और जो जीभ बोल सकती है, उसने सुअर को देखा नहीं. इसलिए मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर किस प्रकार दूं?
उतथ्य की ज्ञान भरी बात अज्ञानी शिकारी के सिर के ऊपर से निकल गयी. वह निराश होकर वहाँ से लौट गया. सत्यव्रत ने सारस्वत मंत्र का जपकर मां शारदा को प्रसन्न किया और वाल्मीकि के समान विद्वान बने.
उनका यश चारों तरफ फैला तो पिता देवदत्त मनाकर वापस घर ले आए. माता भगवती के आशीर्वाद से मूर्ख उतथ्य को ज्ञान, मान, सम्मान और वैभव की जो प्राप्ति हुई उसे आज भी याद किया जाता है. (देवी भागवत पुराण)
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