बढते बच्चों के माता-पिता इसे पढ़ें, आपको शायद इसकी तलाश थी.
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सुंदर कथाओं से सींचते मन की नींव पर ही आप जिम्मेदार और सफल नागरिक रूपी महल खड़ा कर सकेंगे.
आज का विषय है आत्मविश्वासः चुनौतियों से भागें नहीं, लड़ने की कला विकसित करें.
सबसे पहले यह बता दूं कि यह पोस्ट आखिर क्यों आज लेकर आए हैं. इसमें आपको क्या सीखने को मिलेगा? हर व्यक्ति इस असमंजस से गुजरता है जब उसका बच्चा किसी न किसी कारण से हिम्मत हारता है और ऐसे में उसकी जिम्मेदारी हो जाती है उसे हौसला देने की.
तो यह पोस्ट आपको ऐसे धार्मिक संदर्भों और प्रेरक कथाओं के संदर्भों से कुछ बातें समझाएगी जो सरलता से बच्चों के मन में उतर जाएं. साथ ही आपमें भी कुछ जरूरी सुधार की आवश्यकता पर बल देगी. माता-पिता अपना सुख-दुख अपने बच्चों में ही देखते हैं लेकिन उन्हें यह ध्यान ही नहीं रहता कि उनकी कुछ आदतें बच्चों का अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा नुकसान कर रही हैं.
प्रभु शरणम् एक धार्मिक मिशन है लेकिन धर्म की स्थापना स्वस्थ मस्तिष्क से ही तो होगी. इसलिए हम नैतिक बल बढ़ाने वाली कथाएं नियमित रूप से देते रहते हैं. ये कथाएं आपके लिए और आपके बच्चों दोनों के लिए उपयोगी है. आप प्रभु शरणम् से जुड़े जरूर. लिंक ऊपर है. अब मुद्दे की बात पर लौटते हैं.
बच्चे अक्सर आपको यह कहते सुनते हैं कि हे भगवान सारी परेशानी मुझे ही देनी थी. हमें यह कहने और भगवान को कोसने की आदत लग जाती है.
इस बात को सुनते-सुनते बच्चों को भी इसकी लत पड़ जाती है. वे यही समझने लगते हैं कि सारी परेशानियां उनके ही साथ हैं. वे भी आपकी ही तरह भगवान को कोसकर सुस्त बैठ जाते हैं. क्या यह सही परवरिश है?
आपको बच्चों में आत्मविश्वास भरना होगा. उन्हें समझाना होगा कि इस संसार में हम आए हैं तो परेशानियां आनी ही हैं. कितनी परेशानियों के लिए भगवान को कोसेंगे, एक के बाद एक आती ही रहेगीं.
नाम उनका हुआ है जो परेशानियों की चुनौती को पारकर आगे बढ़े हैं न कि उनका जिनके लिए सब सरल और सहज था. क्या बेहतर नहीं है कि हम इसका सामना करते हुए इससे निकलने की राह खोजें.
पर क्या यह इतना सरल है?
नहीं सरल तो नहीं पर असंभव भी नहीं. बच्चों को तो वही समझा पाएगा जो पहले खुद समझ ले और विश्वास है कि इसे पढ़ने के बाद आपके मन पर प्रभाव तो जरूर पड़ेगा.
बच्चे का मन तो कच्ची मिट्टी जैसा है, उसे तो जैसे चाहें ढाल लेंगे. मुझे तो सबसे पहले आपके मन को बदलने का प्रयास करना है. आपका मन तो पक्का घड़ा है- रंग आसानी से चढ़ेगा नहीं.
आज दो प्रसंग सुनाउंगा. पहले तो आपमें वह विश्वास लाने वाला प्रसंग फिर बच्चों में. दोनों ही काम के हैं-ध्यान से सुनिए और समझिए.
भगवान श्रीराम से शुरू करता हूं. श्रीहरि ने राजकुल में अवतार लिया-राकुमार की तरह. किशोरवय हुए तो महर्षि विश्वामित्र आ गए और राजा से उनके दो राजकुमार मांग ले गए उन हजारों राक्षसों का वध करने के लिए जिनसे ऋषिगण नहीं जूझ पाए.
राजा दशरथ को तो पता नहीं था कि उनके पुत्र कौन हैं. मन पर पत्थर रखकर भेजना पड़ा क्योंकि ब्राह्मण द्वारा की गई याचना को क्षत्रिय द्वारा ठुकराना वर्जित था.
गुरू वशिष्ठ ने उत्तम मूहूर्त देखा राज्याभिषेक के लिए पर ऐन राजा बनने के पहले उन्हें वनवास मिल गया. कहां राजा बनना था कहां वन चले गए. वन में भाई ने आकर पैरों की खड़ाऊं मांग ली. नंगे पांव कांटे-कंकड़ सहे.
जैसे तहे रह ही रहे थे कि पत्नी का हरण हो गया. सहायता के लिए वानरों की सहायता लेनी पडी जिनके लिए प्रचलित था कि प्रातः मुख देख लो तो दिन में भोजन नहीं मिलता.
वानरों की सहायता से सागर तट पहुंचे तो वहां समुद्र अकड़ने लगा. भगवान याचना कर रहे हैं वह अकड ही नहीं छोड़ रहा.
रावण को मारकर पत्नी प्राप्त की, राजा बने. सुख के दिन शुरू ही हुए थे कि कुछ ही दिनों में समाज ने घेर लिया. ऊंगलियां उठीं तो पत्नी का त्याग करना पड़ा. पत्नी वियोग में ही रहे. पुत्र वन में जन्मे. परमात्मा भी पृथ्वी पर आते हैं तो कैसे-कैसे कष्ट सहते हैं.
श्रीकृष्ण की कथा तो और दारूण है. राजा के पुत्र का जन्म जेल में, चोरी से एक ग्वाले के घर आश्रय लिया. वहां राक्षसों से लडते प्राण बचाते रहे. जिसे देखो चोरी का आरोप लगा देता. मां कभी ओखली से बांध देती तो कभी कुछ.
कंसवध करके पिता को छुडाया और सुख के दिन शुरू ही हुए थे कि रणछोड़ बनना पड़ा. क्षत्रिय के लिए रण से भागना मृत्यु के समान ही था.
अलग द्वारिका बसाई. फिर मणि चोरी का आरोप लग गया. कुरू राजसभा में दुर्योधन को समझाने आए तो उसने उन्हें बंदी बनाने का प्रयास किया. जगदीश्वर को बांधने का दुःसाहस.
सबसे बड़े संहार महाभारत के युद्ध में शामिल होना पड़ा वह भी एक साधारण सारथी के रूप में. युद्ध में सारथी का रैंक तो बहुत नीचे होता है. गांधारी का शाप झेला और एक बहेलिए के हाथों मारे गए जब थके हुए विश्राम कर रहे थे. अब मुद्दे की बात.
क्या आपने अपने जीवन में श्रीराम और श्रीकृष्ण के समान कष्ट झेले हैं क्या! ईमानदारी से सोचना.
मित्रों यह मृत्युलोक है. यहां हम आते ही कष्ट भोगने को हैं. जो कष्ट हम भोग रहे हैं वे कर्मों के दंड हैं. जैसे पुराना कर्ज जल्दी चुकता न किया तो उसका ब्याज बढ़ता जाएगा उसी तरह जल्दी से भोग लें सारे कष्ट तभी सुख के दिन मिलेंगे. पहले पुराना हिसाब तो चुका लें.
क्या अब भी आपको लगता है कि आपका ही गम सबसे बड़ा है. इस लोक में तो नियमों से छूट प्रभु के लिए भी नहीं है तो हम और आप क्या चीज हैं. यही सोचिए और परेशानियों का सामना करिए. पर बच्चों को इतनी गहरी बात नहीं समझाई जा सकती है. यह खुराक तो आपके लिए थी.
बच्चों को समझाने के लिए आपको एक कथा सुनाता हूं. उससे पहले एक जरूरी बात. मैं दिन में ऐसी कई कथाएं प्रभु शरणम् एप्पस में डालता हूं- यहां तो बस एक कथा आती है दिन में. तो क्या ज्यादा सरल नहीं होगा कि आप एप्प ही डाउनलोड कर लें.
लिंक फिर से दे रहा हूं उसे क्लिक करके डाउनलोड कर लें. अब कथा की ओर बढ़ते हैं.
डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक व्यक्ति अपनी परेशानियों से जूझ रहा था. उसे लगता कि वही संसार का सबसे दुखी व्यक्ति है.
उसे प्रभु से इस बात की बड़ी शिकायत थी कि प्रभु ने संसार के सारे दुख उसके हिस्से दे दिए और फिर कान में तेल डालकर सो गए हैं.
सोते-जागते प्रभु से प्रार्थना करता और फिर कभी भगवान को तो कभी खुद को कोसता रहता. भगवान हैं कि न तो विनती से सुन रहे थे और न उलाहने से, बेचारा करे भी तो क्या करे?
एक दिन उसने सोने से पहले प्रार्थना की- प्रभु आपके सामने कहता-कहता थक गया. अब और मिन्नतों की इच्छा होती नहीं. एक अंतिम बार कह रहा हूं, कृपा करके ध्यान दीजिए.
यदि आप मेरे दुख मिटा नहीं सकते तो कम से यह तो कर सकते हैं कि किसी ऐसे व्यक्ति के दुखों से मेरा दुख बदल दीजिए जो मेरे से कम दुखी हो. हमेशा के लिए नहीं तो कम से कुछ ही महीनों के लिए कर दीजिए. मुझे भी कुछ राहत मिले.
भगवान ने उस दिन उसकी आखिर सुन ही ली. उस रात उसे सपने में भगवान दिखे.
भगवान बोले- मैं तुम्हारी प्रार्थना रोज सुन रहा था पर उनके ऊपर ध्यान ज्यादा दे रहा था जो ज्यादा कष्ट में हैं. खैर, तुम अपने कष्टों को विस्तार से कागज पर लिखो, एक गठरी बनाओ और शहर के मुख्य चौराहे पर टांग आओ.व्यक्ति हडबड़ाकर जागा. पहले तो उसे यकीन ही न हुआ कि सच में भगवान ने ऐसी प्रेरणा दी है. फिर सोचा कि आजमाने में क्या हर्ज है. क्या पता इससे कोई हल ही निकल आए.
उसने भगवान के आदेश के मुताबिक अपनी सारी परेशानियां अलग-अलग कागजों पर लिखीं. इतनी लिख डालीं कि सच में कागज का ढेर खड़ा हो गया और उसे गठरी में ही बांधना पड़ा.
उसने परेशानियों की गठरी उठाई और चौराहे पर पहुंचा. वहां पहुंचकर वह अचंभे में पड़ गया.
उसने देखा कि चौराहे पर तो पहले से ही लोगों लंबी कतार है जो उसी की तरह अपने-अपने दुखों की बड़ी-बड़ी गठरी लिए आ पहुंचे हैं. आखिर चक्कर क्या है?
अभी वह इन विचारों में ही खोया था कि तभी आकाशवाणी हुई. उसमें सभी को अपनी गठरी को चौराहे पर लगी अलग-अलग खूंटी में टांग देने का आदेश हुआ.
वहां बेहिसाब खूंटिंया पहले से ही बनी थी. सभी ने अपनी-अपनी गठरी टांगी और फिर ईश्वर के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे.
कुछ ही देर में फिर से आकाशवाणी हुई. कहा गया कि सभी लोग अंदाजे से कोई ऐसी गठरी उठा लें जो उन्हें अपनी परेशानियों की गठरी से हल्की समझ में आती हो. अब उन्हें वही दुख भोगने होंगे जो उनकी चुनी नई गठरी में दर्ज होंगे.
आकाशवाणी सुनते ही सभी हल्की गठरी को लपकने के लिए दौड़े. सबके साथ वह व्यक्ति भी नई गठरी चुनने भागा.
खूंटियों में टंगी गठरियों को घूंरता हुआ वह काफी देर तक अंदाजा लगाता रहा. उसे डर था कि कहीं वह कोई ऐसी गठरी न उठा ले जिसमें पहले से भी ज्यादा दुख हों. इस तरह तो लेने के देने पड़ जाएं.
गलती से भी उसने यदि किसी ऐसे व्यक्ति की गठरी उठा ली जो उससे भी ज्यादा दुखी हो तो फिर उसका जीवन तो और तहस-नहस हो जाएगा.अब उसके मन में तरह-तरह के विचार आने लगे. वह सोचने लगा कि कम से कम वह अपने दुखों से परिचित है. उन्हें झेलने का आदी हो गया है. उनके लिए कुछ रास्ते निकालने की शुरुआत भी की है शायद उसका परिणाम आए तो एकाध दुख घट ही जाएं.
कहीं ऐसा न हो कि नई गठरी में चुने दुख ज्यादा पीड़ादायक हो जाएं.
ऐसे विचारों में खोया वह एक के बाद एक गठरी के सामने से गुजरता लेकिन तय नहीं कर पाया कि कौन सी गठरी चुनी जाए. उसे यह भी भय होता कि कहीं कोई उसकी गठरी न उठा ले.
इसी उधेड़बुन में फंसे उसने आखिरकार अपनी गठरी ही उठा ली और चल पड़ा. उसने तय किया कि इन चुनौतियों का मुकाबले अब पहले से ज्यादा मजबूती से करेगा.
धीरे-धीरे उसे अपना दुख कम होता हुआ प्रतीत हो रहा था. उसके जैसा ही भाव वहां मौजूद हर व्यक्ति में आ रहे थे.
सच में सबको अपना दुख ज्यादा बड़ा और ज्यादा पीड़ादायक लगता है. लगता है कि वही संसार का सबसे दुखी प्राणी है.
किसी के महल के आगे से गुजरते हुए यदि यह ख्याल बार-बार आए कि जब किस्मत बंट रही थी तो वह इस आदमी से पीछे क्यों रहा. अगर वह आगे रहता तो उसे भी ऐसा ऐश्वर्य मिल जाता.
तत्काल अस्पतालों के बारे में सोचिए जहां लाखों लोग जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहे हैं. अपाहिज हो चुके हैं. सोचिए कि कम से कम आप किस्मत की लाइन में इनसे आगे तो थे. स्वस्थ हैं, अपना काम स्वयं कर सकते हैं.
बेहतर है कि हम यह सोचें- दुनिया में कितना गम है, मेरा ग़म कितना कम है.
क्या आपको यह कथा पसंद आई?
ऐसी अनगिनत कथाओं का एक संसार है जहां आप धार्मिक-आध्यात्मिक कथाएं, जीवन को बदलने वाली प्रेरक कथाएं, रामायण-गीता, ज्योतिष और सभी प्रमुख मंत्रों को पढ़ सकते हैं उन मंत्रों के क्या लाभ हैं, उसके बारे में जान सकते हैं.
इस लाइन के नीचे प्रभु शरणम् एप्प का लिंक है. ये एक धार्मिक प्रयास है. एक बार तो इसे देखना ही चाहिए.
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