नवरात्र कथा: मां जगदंबा ने रची ऐसी माया तांत्रिक भैरव भी समझ न पाया
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंदेवी भक्तों को परेशान करने वाले ताकतवर तांत्रिक का उपद्रव जब बहुत बढा तो भक्तों की गुहार पर मां महामाया ने सभी देवी और विष्णु भक्तों को इस मुसीबत से मुक्ति दिलाने के लिये जो माया रची उसके कहानी बड़ी दिलचस्प है.
मां जगदंबा राजकुमारी चन्द्रभागा की भक्ति पर बहुत प्रसन्न थी. चंद्रभागा ने भगवती माता दुर्गा से प्रार्थना की कि कुछ दिन वे चन्द्रभागा यानी चिनाव नदी के तट पर रहें और धरती के लोगों का दुःख दूर करें. माता ने अपनी भक्तिन की बात मान ली.
वे जम्मू के मंत्रीपुर अब के जिला वजीराबाद के पास चिनाव तट पर रहने लगीं तो दर्शन करने वाले भक्तों का तांता लग गया. दर्शन मात्र से कल्याण होने से माता की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैलने लगी. वहीं थोड़ी दूरी पर गोरख टीला, जिला झेलम में गुरु गोरखनाथ के शिष्य भैरव नाथ भी रहता था.भैरव नाथ सिद्ध योगी और पहुंचा हुआ पर अड़ियल और गुस्सैल तांत्रिक था. सबसे बड़ी बात यह कि भैरव नाथ देवी के भक्तों यानी शाक्त लोगों का जानी दुश्मन था. वह विष्णु को पूजने वाले वैष्णव लोगों को भी बहुत कष्ट पहुंचाता था.
भैरव नाथ के 360 चेले थे. वे जहां कहीं भी विष्णु अथवा देवी-उपासक मिलते, उपद्रव मचाने, उनको तरह तरह के कष्ट पहुंचाने से नहीं चूकते थे. लोगों के बीच मांस मदिरा का व प्रचार करते. उनके इस अत्याचार से वे सभी परेशान और दु:खी थे. सब ने इस कष्ट से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना मां दुर्गा से की.
मां की प्रसिद्धि सुनकर भैरव नाथा को चिंता और चिढन हुई तो वह जगदंबा की परीक्षा लेने अपने 360 चेलों समेत चिनाव तट पर पहुंचा. मां ने उसे सही रास्ते पर आने, मांस मदिरा छोड़ देने का उपदेश दिया. पर भैरव को तो महामाया ने ही मोहित कर रखा था, यह कोई बात उसके पल्ले न पड़ी.माता की परीक्षा लेने के लिये भैरव नाथ ने उनसे कहा, सुना है सबकी इच्छा पूरी करती हो, मेरी भी इच्छा पूरी करो तो जानूं. देवी ने पूछा तुम्हारी क्या इच्छा है. यह सुन कर भैरव ने जिस नजरों से माता की और देखा उससे वह उसका कामुक मनोभाव ताड़ गयीं.
माता अभी भैरव नाथ को मुक्ति नहीं देने वाली थीं, न अपनी माया को उजागर करने वाली थीं, भैरव को महामाया के अभी और खेल देखने बाकी थे सो भैरव जब उनकी तरफ झपटा वे वहां से अंतर्धान हो जम्मू के पास ही के एक गांव में पहुंच गयीं.
गाँव में कुछ लड़कियां खेल रही थीं. माता भी कन्या बन उनके खेल में शामिल हो गईं. कुछ देर तक खेलने के बाद माता ने अपनी दिव्य शक्ति से सब लड़कियों को स्वादिष्ट भोजन खिलाया और फिर एक लड़की से पानी लाने को कहा. लड़की ने कहा मेरे पास न तो कोई बरतन है, न यहां कहीं पानी है.
माता ने उसे सोने का एक कटोरा दिया और गड्ढे की ओर दिखा कर कहा, ‘इस कटोरे में उस गड्ढे से पानी भर ला.’ माता ने बस नजर डाली, सूखा गड्ढा जल से भर गया. इस चमत्कार की बात फैली तो उस जगह का नाम ‘कौल कन्धोली’ पड़ गया. माई देवा नामक बूढी पुजारिन के वहां मां यहीं रहने लगीं.
‘कौल-कन्धोली’ में भगवती के होने की भनक पाकर भैरव नाथ अपने चेलों के साथ यहां को चल पडा. रास्ते में वह ‘हंसाली’ नामक गांव में रुका. उसको पता था कि इसी गांव में मां जगदंबा के परम भक्त श्रीधर रहते हैं. उसे तो श्रीधर को परेशान करना ही था.श्रीधर बेहद गरीब ब्राह्मण थे. छोटी सी कुटिया में रहते थे और उनके कोई संतान न थी. वे धन नहीं पर संतान पाने के लिये मां जगदंबे की पूजा में लगातार लगे रहते थे. सीधे साधे श्रीधर के घर भैरव अपने 360 चेलों के साथ मुसीबत बन पहुंचा.
यह सब मां की माया थी जिसमें भैरव फंसता जा रहा था. भैरव ने गरीब पंडित श्रीधर को खुद सहित 360 चेलों को भोज देने के लिये मजबूर करने और अपने तंत्र मंत्र से डराने लगा. श्रीधर बेहद दु:खी और चिन्तित हुआ. गरीब श्रीधर को खुद का भोजन मुहाल था, इतना बड़ा भोज भंड़ारा कहां से देता. भैरव से भयभीत हो कर श्रीधर ने भगवती का ध्यान किया.
रात में मां सपने में आयीं और कहा, श्रीधर चिंता मत करो, भंडारे के लिये हां कह दो. समूचे गाव वालों को भी न्योत दो, मैं ही तुम्हारा सब प्रबंध कर दूंगी. सुबह श्रीधर ने भैरव नाथ को भंडारा देने को कह दिया. चमत्कार हो गया सोने-चांदी के बर्तनों में तमाम तरह तरह के पकवान वहां आ गये और उसके साथ आई एक सुंदर सी कन्या.
श्रीधर की झोपड़ी के बाहर ही भूमिका नामक स्थान पर भैरव सहित 360 लोग एक तरफ तो इतने ही गांव वाले दूसरी तरफ बैठ जीमने बैठे. माता एक सुंदर सी किशोरी के रूप में खुद ही भोजन परोसने में श्रीधर का साथ दे रही थीं.
अचानक भैरवनाथ को शंका हुई कि इतने बढिया पकवान वह भी सोने चाँदी की थाली में और भरपूर मात्रा में. इस छूटे से गांव के गरीब ब्राह्मण के घर बस रात भर की तैयारी में. ज़रूर दाल में कुछ काला है. देवी भक्त श्रीधर तो मेरे से परेशान हुआ ही नहीं. सो उसने एक चाल चली.भैरवनाथ भोजन से उठ गया बोला, हम तांत्रिक हैं. हमें हमारा भोजन कराओ हम यह वैष्णव भोजन नहीं करते. शराब पिलाओ मांस खिलाओ. भगवती ने जवाब दिया कि यह राक्षसों का भोजन है, हम सात्विक हिंदू हैं.
हम पशु बलि पर विश्वास नहीं रखते न हिंसा प्रधान पूजा पर. ब्राह्मणों के लिये तो यह बिल्कुल उचित नहीं, हम आप को ऐसा भोजन नहीं दे सकते न मदिरा पिला सकते हैं. सात्विक भोजन करना चाहो तो वह तैयार है.
जिस समय माता यह कह रही थीं गांव वाले भी उनका साथ दे रहे थे भैरव नाथ इतने लोगों द्वारा अपना विरोध देख कर चिढ गया. वह भोजन परोसने वाली सुंदर किशोरी पर पहले से ही नजर रखे था. उसने सोचा कि यदि वह इसके साथ कुछ करेगा तो देवी भक्त श्रीधर परेशान और गांव वाले भी अपमानित होंगे.
उसने आगे बढ कर उस किशोरी का हाथ पकड़ अपनी और खींचना चाहा. यह देखकर किशोरी के रूप में आयी माता वहां से यकायक अन्तर्धान हो गईं. भैरवनाथ हाथ मलता रह गया. पर इस बार वह अपमानित और क्रोधित हो कर भगवती का पीछा करता हुआ उनके पीछे लग गया.
मां दुर्गा का पीछा करता हुआ भैरव कहां कहां गया, महामाया की माया ने उसे समझाया, चेताया और न मानने पर किस तरह मुक्ति का मार्ग दिखलाया. क्या श्रीधर फिर मां से मिल पाया. जगदंबा का माता वैष्णो देवी बनने की पूरी कथा अगले भाग में.
संकलनः सीमा श्रीवास्तव
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