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नवरात्र कथा: मां जगदंबा ने रची ऐसी माया तांत्रिक भैरव भी समझ न पाया: भाग 2

नवरात्र कथा: मां जगदंबा ने रची ऐसी माया तांत्रिक भैरव भी समझ न पाया: भाग 2

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंपहले भाग में आपने पढा कि देवी भक्तों को परेशान करने वाला भैरव नाथ किस तरह महामाया की माया में पड़ कर बुरी नीयत से उनके पीछे पड़ा मां हुईं अंतर्धान तो उसने किया पीछा …..अब आगे दूसरा भाग

भगवती कटरा के हंसाली गांव से चलीं तो कुछ दूर जा कर भगवती के वाहन शेर को प्यास लगी, भगवती को भी नहाने की इच्छा हुई. पर आसपास कहीं पानी ही न था. उन्होंने अपने धनुष से बाण चलाकर, पृथ्वी को भेद दिया और पानी का सोता फूट पड़ा.

शेर ने पानी पिया और मां ने अपने बाल धो कर स्नान किया. बाद में यह जगह बाण गंगा और बाल गंगा के नाम से मशहूर हो गई.

यह जगह पहाड़ी की शुरुआत है इसलिये नीची है, जब भगवती का शेर पानी पी रहा था, तो पीछे से आते हुए भैरवनाथ ने उसे उंचाई और दूर से ही देख लिया, पर जब तक भैरवनाथ उस स्थान पर पहुंचता, मां बहुत शीघ्रता के साथ वहाँ से चल पड़ीं.

मां जगदंबा ने जब यह देखा कि भैरव समीप आ चुका है तो वे जल्दी से पर्वत पर चढ गयी. जल्दबाजी में उनकी पादुका यानी खड़ाऊं वहीं नीचे ही रह गयी. इस स्थान को बाद में चरण पादुका कहा गया. पहाड़ पर चढने के बाद मां उस ऊंचाई पर पहुंची जिसे आदिकुमारी कहा गया. यहां मां कुछ समय के लिये ठहरीं.भैरव नाथ सिद्ध तांत्रिक था. जब उसे मां का कोई सुराग न लगा तो कुछ भटकने के बाद अपनी तंत्र विद्या से जान लिया कि मां आदि कुमारी वाली जगह पर हैं. वह वहां भी जाने की तैयारी करने लगा. मां तो अंतरयामी हैं वह सब जान गयीं.

अब मां वहां से उस जगह चलीं जहां उनकी माया से बंधे भैरव का अंत होना था. वे आदिकुमारी से त्रिकूट पर्वत वाली उस गुफा में जा बैठीं जिसकी बनावट ऐसी है कि गुफा के भीतर पहुंचने वाला बाहर निकलने के लिए उसी तरह छटपटाने लगता है, जैसे गर्भ से बाहर निकलने के लिए बच्चा छटपटाता है.

मां गुफा में नौ महीने तक तप करती रहीं इस बीच भैरव भी उनकी खोज में वहाँ आ पहुँचा. रास्ते में भैरव को एक साधु मिले उन्होंने कहा भैरव, ‘जिसे तू साधारण नारी समझता है, वह तो महाशक्ति हैं.’ भैरव ने साधु की बात अनसुनी कर दी और गुफा की ओर बढ चला.माता ने भैरव से कहा, मैंने तुझे तमाम अवसर दिये और कई संकेत भी अब आखीरी मौक दे कर यहां से जा रही हूं पर तू अब भी अपनी से बाज न आया और यहां से न टला तो मैं तेरा वध कर दूंगी. यह कह कर मां दुर्गा गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं. वह गुफा आज गर्भ जून के नाम से जानी जाती है.

भैरव ने देवी की लौटने की चेतावनी अनसुनी कर दी. मां लौटीं और गुफा के भीतर चली गईं. इस बार गुफा के मुहाने पर वीर लंगूर पहरा दे रहे थे. भैरव ने वीर लंगूर को ललकारा. वीर लंगूर बहुत बहादुरी से लड़े पर चाली, सिद्ध तांत्रिक भैरव नाथ की ताकतें मायावी थीं. वीर लंगूर थक कर निढाल होने लगे.

ऐसे में मां बाहर निकली. मां दुर्गा ने इस बार चंडी का रूप धारण किया. उन्होंने भैरव से कहा, बहुत हुआ अब तू मेरी मायावश यहां से वहां भटक रहा था. मैं चाहती तो तेरा वध पहले भी कर सकती थी पर तू शिव भक्त और विद्वान है इस लिये मौके दे रही थी. अब बहुत हुआ. और चंडी माता ने भैरव का सिर उड़ा दिया.भैरव का धड़ तो वहीं गिरा पर कटा हुआ सर दूर घाटी में जा गिरा. सिद्ध तांत्रिक के उस कटे हुए सर ने माँ से कहा, मैं पहले दिन से जानता था की माँ आप कौन हैं, इसलिये यह सब जानबूझ कर किया.

यह सब इसलिये कि माँ अंबे के हाथों से मृत्यु होने पर मुझे मोक्ष मिल जाए. मैं इसमें सफल रहा पर दुःख बस इतना है कि माँ के भक्त मुझे हमेशा मेरे शैतानी रूप के ही लिए याद करेंगे, मेरी जानकारी और ज्ञान के लिये नहीं.

भैरव की बात पर पर माँ ने उन्हें वचन दिया, जो भक्त मेरे दर्शन को आयेंगे, उनका दर्शन तभी पूरा माना जाएगा जब वे भैरवनाथ का भी दर्शन करेंगे. यह कह कर मां फिर गुफा के भीतर चली गयीं. आज भी भक्त माँ के दर्शनों के बाद भैरवनाथ के दर्शनों को जाते हैं.

गुफा के भीतर माँ पिंडियों के रूप ले कर तपस्या में लग गयीं. इधर माँ के भंडारे में से अचानक गायब हो जाने बाद पंडित श्रीधर मां के इंतज़ार में बहुत बेचैन थे. सोचते थे कि इस जनम में फिर दर्शन होंगे कि नहीं. एक रात श्रीधर को मां का सपना आया, उन्हें मां ने बताया कि वह कहां पर हैं.

सपने में देखे हुए रास्ते पर देवी भक्त श्रीधर ने मां के द्वारा बतायी जगह को खोजना शुरू किया, और आखिर पिंडियों तक पहुँच गए. श्रीधर पंडित ने गुफा में ही रह कर आराधना पूजा करने का व्रत ले लिया. जलद ही मां के इस रूप को वैष्णो माता के नाम से प्रसिद्धि मिल गयी और श्रीधर पंडित के बाद उनके वंशज यहाँ पूजा आराधना करने लगे.

स्रोत: विभिन्न धर्म ग्रंथ, किंवदंतियां और लोक कथाएं

संकलनः सीमा श्रीवास्तव

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