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जलंधर का वध करने आए श्रीहरि क्यों उसके वश में हो गए और महालक्ष्मी संग करने लगे उसके लोक में वास- कार्तिक माहात्म्य, तेरहवां अध्याय

जलंधर का वध करने आए श्रीहरि क्यों उसके वश में हो गए और महालक्ष्मी संग करने लगे उसके लोक में वास- कार्तिक माहात्म्य, तेरहवां अध्याय

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नारदजी बोले- दैत्यों के तीक्ष्ण प्रहारों से व्याकुल देवता इधर-उधर भागने लगे. तब इंद्र आदि को इस प्रकार भयभीत देखकर गरूड पर सवार भगवान युद्ध में आगे बढ़े. उन्होंने अपने शारंग धनुष का जोरदार टंकार किया. त्रिलोक गूंज उठा.

पलमात्र में भगवान ने अनिगनद दैत्यों के सिर काट गिराए. यह देख जलंधर क्रोध से कांपने लगा. भगवान और जलंधर में धोर संग्राम शुरू हुआ. बाणों से आकाश भर गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भगवान के हर प्रहार का वह भऱपूर उत्तर देता. भगवान की गदा की मार झेल गया. उनके धनुष की डोर काट दी और त्रिशूल का प्रहार किया जिसे भगवान ने शिवजी की कृपा से नष्ट किया. जलंधर ने लपककर भगवान की छाती में जोरदार मुक्का मारा.

दोनों के बीच बाहुयुद्ध आरंभ हुआ. भगवान काफी देर तक उसके साथ युद्ध करते रहे. भगवान जलंधर के पराक्रम पर मुग्ध हो रहे थे. उन्हें उसके साथ मल्लयुद्ध में आनंद आने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उन्होंने कहा- हे रणकौशल दैत्य, तू धन्य है. मेरे इतने प्रहारों को झेलने के बाद भी मुझसे मल्लयुद्ध का साहस कर रहा है. मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं. तू जो चाहे वरदान मांग ले. आज मैं तुम्हें अदेय भी देने को इच्छुक हूं.

भगवान की बात सुनकर जलंधर ने कहा- हे हरि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यह वरदान दीजिए कि आप मेरी बहन लक्ष्मी तथा सारे कुटुंबजनों के साथ मेरे घर पर निवास करेंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उसके ऐसे वचन सुनकर श्रीहरि को खेद तो हुआ किंतु उसी क्षण देवेश ने तथास्तु कह दिया. अब श्रीविष्णु अन्य देवताओं के साथ जलंधरपुरी में निवास करने लगे. जलंधर अपनी बहन के साथ विष्णुजी एवं अन्य देवों को पाकर बड़ा खुश हुआ.

देवताओं के सभी रत्न आदि उनके स्थान पर स्थापित करके जलंधर पृथ्वी पर आ गया. निशुंभ को पाताल में स्थापित कर दिया. फिर देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, सर्प, राक्षस मनुष्य सभी का अधिपति होकर त्रिभुवन पर शासन करने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उसने धर्मानुसार प्रजा का पालन किया. उसके राज्य में सभी प्रसन्न भी थे. फिर धर्मपालक जलंधर अधर्म की राह पर क्यों चला गया. तेरहवां अध्याय पूर्ण, कथा जारी रहेगी.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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