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कहीं आप भी तो नहीं करते वही काम जिससे राजा भोज जैसे विद्वान मूर्खराज कह दिए गए- प्रेरक कथा

कहीं आप भी तो नहीं करते वही काम जिससे राजा भोज जैसे विद्वान मूर्खराज कह दिए गए- प्रेरक कथा

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एक बार राजा भोज बिना सूचना दिए अपनी रानी के महल में अंतरंग कक्ष में प्रविष्ट हो गए. वहां पर रानी अपनी किसी प्रिय सखी से गोपनीय वार्तालाप में लगी थीं.

आगमन की सूचना दिए बिना राजा भोज का इस प्रकार महल के अंतरंग कक्ष में आना रानी को अच्छा न लगा. रानी ने राजा भोज को बिना किसी प्रकार का संबोधन और आदर सत्कार किए ही कहा- आइए मूर्खराज!

राजा बड़ा विस्मित और आश्चर्यचकित हुआ और बिना किसी प्रतिवाद के और ऐसा कहने का कारण जाने बिना ही लौट भी गए. राजा सोचने लगे कि आखिर इतनी गुणवती रानी ने मुझे मूर्खराज क्यों कहा? रानी का ऐसा कहना कोई न कोई गूढ़ अर्थ रखता है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजा ने अपने इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए अगले दिन की राजसभा में दरबारियों और मंत्रियों से जानने का निश्चय किया. अगले दिन की राजसभा में राजा भोज सबसे पहले राजसिंहासन पर जाकर आसीन हो गए.

धीरे धीरे करके उनके मंत्री एक-एक करके आने लगे तो जो दरबारी सभा में प्रथम उपस्थित हुआ उसने राजा को यथोचित प्रणाम किया और राजा ने प्रत्युत्तर में कहा- आओ मेरे मूर्ख मंत्री! अपना स्थान ग्रहण करो.

राजा के मुख से ऐसा अप्रिय सम्बोधन सुनकर मंत्री विस्मय में पड़ गया और बिना कुछ प्रतिवाद किए अपने आसन पर बैठ गया. उसके बाद दूसरा, फिर तीसरा व अन्य मंत्री आते रहे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उन सबको राजा ऐसे ही सम्बोधित करते रहे. मन्त्रीगण आपस में चर्चा करने लगे कि क्या बात है राजा सभी को एक ही तरह से सम्बोधित कर रहे हैं. इसके पीछे कोई न कोई राज अवश्य है.

अंत में उस सभा में संस्कृत के मूर्धन्य महाकवि कालिदास पधारे तो राजा ने उनसे भी यही कहा- आइये मूर्खराज. कवि शिरोमणि कालिदास ने अपनी बुद्धि चातुर्य का परिचय देते हुए राजा को तत्क्षण जवाब दिया.

खादनपि न गच्छामि हसन्नपि न जलम् पिबामि, गतमपि न शोचामि कृतम् न मन्ये!!
द्विभ्याम् न त्रितयो स्वयं न कथय्यामि कीर्ति किम् कारणम् भोज: भवामि मूर्ख !!हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हे राजा भोज मैं चलता हुआ खाता नही हूं, हंसता हुआ जल नहीं पीता. चलता हुआ शौच नहीं करता हूं अर्थात मैं पशुओं की तरह चलते-चलते मलत्याग नही करता. अच्छा काम करने में ज्यादा सोच विचार नही करता अर्थात शुभ कार्य को शीघ्रता से पूरा करता हूं.

दो व्यक्तियों के मध्य जब एकांत में कोई गुप्त मन्त्रणा हो रही होती है तो मैं बिना सूचना के तीसरे व्यक्ति के रूप में उपस्थित होकर बाधा नही बनता अर्थात दाल भात में मूसलचंद नही बनता और स्वयं की प्रशंसा भी नही करता हूँ.

मेरे अंदर ऐसा कोई भी लक्षण नहीं है जिसके कारण मुझे मूर्खों की श्रेणी में गिना जाए, फिर भी हे राजन! आपने मुझे मूर्खराज कहा. आपने ऐसा संबोधन क्यों किया, मेरी जिज्ञासा शांत करें.

राजा को अपने प्रश्न का जवाब इस श्लोक में मिल गया था और उन्होंने कालिदास को उचित पारितोषिक प्रदान किया और अपने समकक्ष सिंहासन पर बिठाया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजा बिना कोई सूचना दिए रानी और उनकी सखी के मध्य वार्तालाप में विघ्न डालने अंतरंग महल में चले गए थे इसीलिए रानी ने भोज को मूर्खराज कहकर सम्बोधित किया था.

विद्वतजन कहते हैं कि जब दो विद्वान् लोग आपस में बात कर रहे हों तो तीसरे व्यक्ति को बिना कारण उसमें हस्तक्षेप नही करना चाहिए. हस्तक्षेप से वह अपने अपमान को आमंत्रित करता है.

हम बच्चों से कहते हैं कि बड़ों के बीच बात में नहीं टोकते. उन्हें साधारण तरीके से समझाने के स्थान पर इस कथा के माध्यम से समझाएं तो शायद बात बच्चे के मन में बिठाने में कुछ सहायक हो.

संकलनः मनोज त्रिपाठी
संपादनः राजन प्रकाश

यह प्रेरक कथा मनोज त्रिपाठी जी ने बनारस से भेजी. मनोजजी आध्यात्मिक चर्चा में योगदान करते हैं और इनकी भेजी कथाएं कई बार पहले भी प्रभु शरणम् में प्रकाशित हो चुकी हैं.
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