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कन्हैया करें नाच, तो मिली थोड़ी छाछ! ब्रह्माजी, शिवजी और इंद्रदेव को प्रभु ने नहीं दी व्रज की छाछ!

कन्हैया करें नाच, तो मिली थोड़ी छाछ! ब्रह्माजी, शिवजी और इंद्रदेव को प्रभु ने नहीं दी व्रज की छाछ!

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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।एक बार जब प्रभु श्रीकृष्ण लीला कर रहे तो ब्रम्हाजी, देवराज इंद्र, शिवजी, ये सब देवता ठाकुर जी के निकट आए. इन्होंने क्या देखा कि ठाकुर जी अपने पीछे कुछ छुपा रहे हैं.

देवताओं को बड़ा आश्चर्य हुआ. कौतूहल में भरे उन्होंने पूछ लिया कि प्रभु आप क्या छुपा रहे हो? अब भगवान चुपचाप खड़े हैं. मना कर नहीं सकते कि कुछ नही छुपा रहा क्योंकि सब सामने है.

प्रभु ने टालने को कह दिया- हाथ में बस एक पात्र थाम रखा है. उसमें कुछ है नहीं. बस यह बर्तन थोड़ा गंदा है इसलिए आप सभी देवों के सामने झिझक हो रही है इसलिए इसे पीछे छुपा रखा है.

देवताओं ने फिर पूछा- प्रभु आप क्या छुपा रहे हैं बता भी दें. अपनी इस लीला से हमें वंचित न रखें. कुछ अनमोल है तो हमें भी दें. हम आपके अतिथि हैं.

भगवान समझ गए कि छुपा नहीं पाएंगे. धीरे से बोले- देखिए देवगण आप किसी को बताना नहीं. ये जो पात्र है ना इसमें बड़ी मुश्किल से आज में कहीं से थोड़ी छाछ उडाकर ले आया हूँ.

देवता बोले कि छाछ ही तो है प्रभु इसे छुपा क्यों रहे हैं! क्या ये इतना कीमती है कि आप इसे हमारे संग बांटेंगे नहीं? भगवान बोले- अब इसकी कीमत मैं क्या बताऊं?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तो देवतागण बोले- हे प्रभु आप अनंतकोटि ब्रम्हाण्ड के नायक हैं. ऐसे प्रभु को यह छाछ छुपानी पड़ी है, इसका अर्थ तो यही है कि ये अनमोल है. एक घूंट हमें भी मिल जाए तो हमारा भी कल्याण हो जाए.

प्रभु अब हम आपके धाम में आए हैं. इतनी कृपा तो कर दें. सेवक न सही प्यासे अतिथि समझकर ही एक घूंट हमें भी पिला दें. हम भी इसका स्वाद लेकर धन्य हो जाएं.

भगवान बोले- देवता गण संसार की कोई भी वस्तु आपके लिए दुर्लभ नहीं. मैं स्वयं आपके लिए प्रस्तुत हूं. आपकी हर इच्छा मेरे लिए आदेश पर ये छाछ न दे पाउंगा.

स्वर्ग के अमृत पर आपका अधिकार है. आप उसे जितनी इच्छा पी सकते हैं पर ये छाछ ब्रजवासियों की मेरे लिए श्रद्धा, प्रेम है. ये छाछ तो मैं ही पिऊँगा. मेरे भक्तों ने इसे मेरे लिए बनाया है. उनका मन कैसे न रखूं.

अब तो देवताओं का कौतूहल बढ़ गया. कामधेनु और नंदा गाय भी सहर्ष उनके लिए समस्त पदार्थ प्रस्तुत कर देती हैं. यदि ये छाछ उनके दूध से बना हो तो भी उनके लिए सहज उपलब्ध होना चाहिए. लेकिन प्रभु कह रहे हैं कि यह ब्रज की गाय के दूध का है.

आखिर चक्कर क्या है! जैसे उधो तैसे माधव, न श्रीकृष्ण हठ छोड़ें न ही देवता. बात वहीं घूम रही है. देवों ने फिर से पूछा- प्रभु ऐसी कौन सी अनमोल बात है इस छाछ में जो हम नहीं पी सकते.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.आप कह रहे हैं कि हम अमृत जाकर पी लें लेकिन आप यह छाछ ही पीएंगे. तो क्या ये छाछ अमृत से भी बढ़कर है? अरे छाछ तो छाछ है इसमें क्या बड़ी बात है. शंका का जब तक निवारण नहीं होता हम तो नहीं जाने वाले.

ठाकुरजी भावविभोर हो गए हैं. अपनी आँखों में आँसू भरकर बोले- देवताओं आपको पता नहीं कि इस छाछ को प्राप्त करने के लिए मुझे गोपियों के सामने नृत्य करके उन्हें प्रसन्न करना पड़ता है. मैं नाचकर आया हूँ तब जाकर ये छाछ मिली है.

ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पर नाच नचावे. अब जिस छाछ के लिए मुझे इतना नृत्य करना पड़ा उस छाछ में कुछ तो बात होगी ही ना! बिना नाचे यह छाछ मिलती नहीं.

अब भोलेनाथ अगर आपने नृत्य किया तो सृष्टि पर संकट आ जाएगा. ब्रह्मदेव और देवराज आपका नृत्य शोभा नहीं देगा. फिर आप बताएं कि कन्हैया ने किया नाच तो मिली छछिछा भर छाछ, आपको ऐसे ही कैसे दे दूं.

देवतागण प्रभु की इस लीला पर मुग्ध हुए जा रहे हैं. उन्हें प्रणाम करके अपने धाम को लौट गए हैं.

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