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जो लेते हैं गीता के इस अध्याय का सहारा महादेव स्वयं आकर देने लगते हैं अपने हाथों का सहारा

जो लेते हैं गीता के इस अध्याय का सहारा महादेव स्वयं आकर देने लगते हैं अपने हाथों का सहारा

Shiva kajri teej

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माता पार्वती के अनुरोध पर भगवान शिव ने गीता के अध्यायों के पाठ का माहात्म्य सुनाना शुरू किया था. काशीपुरी में धीरबुद्धि नाम से विख्यात एक ब्राह्मण था, जो मुझमें प्रिय नन्दी के समान भक्ति रखता था.

वह हिंसा, कठोरता और दुःसाहस से दूर रहने वाला था. जितेन्द्रिय होने के कारण वह निवृत्तिमार्ग में स्थित रहता था और समस्त वेदों का पाठ किया था.
मुझे वह ऐसा प्रिय था कि अन्तरात्मा से पाठ करने के बाद जब वह चलने को होता तो मैं उसे अपने हाथों का सहारा दिया करता था. जब वह मेरा ध्यान करता मैं तत्काल उसके समक्ष आ जाता था.

घीरबुद्धि के प्रति मेरा यह प्रेम देख मेरे पार्षद भृंगिरिटि ने पूछा- भगवन! इस प्रकार भला, किसने आपका दर्शन किया होगा? इस महात्मा ने कौन-सा तप, होम अथवा जप किया है कि स्वयं महादेव उसे ही पग-पग पर हाथ का सहारा देते रहते हैं?

भृंगिरिटि का यह प्रश्न सुनकर मैंने उससे कहा- एक समय कैलास पर्वत के पीछे पुन्नाग वन के भीतर चन्द्रमा की अमृतमयी किरणों से धुली हुई भूमि में एक वेदी का आश्रय लेकर मैं बैठा हुआ था. मेरे बैठने के क्षण भर बाद ही सहसा बड़े जोर की आँधी उठी.वृक्षों की शाखाएँ आपस में टकराने लगीं. पर्वत की अविचल छाया भी हिलने लगी.

फिर ऐसी भयंकर आवाज हुई जिससे पर्वत की कन्दराएँ गूंज उठीं. आकाश से एक विशाल पक्षी उतरा. उसकी कान्ति काले मेघ के समान थी. अन्धकार के समूह अथवा पंख कटे हुए काले पर्वत-सा जान पड़ता था. पक्षी ने मुझे प्रणाम कर एक सुन्दर कमलपुष्प मेरे चरणों में रखकर स्तुति करने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उस पक्षी ने उत्तम स्तोत्रों से मेरी स्तुति की जिससे मैं प्रसन्न हो गया. मैंने उससे पूछा- “विहंगम! तुम कौन हो और कहाँ से आये हो? तुम्हारी आकृति तो हंस जैसी है, मगर रंग कौए का मिला है. तुम जिस प्रयोजन को लेकर यहाँ आये हो, उसे बताओ।”

पक्षी बोला- देवेश! मुझे ब्रह्माजी का हंस जानिए. जिस कर्म से मेरे शरीर में इस समय कालिमा आ गयी है, उसे सुनिये. प्रभो! यद्यपि आप सर्वज्ञ हैं, अतः आप से कोई भी बात छिपी नहीं है तथापि यदि आप पूछते हैं तो बतलाता हूँ.

सौराष्ट्र (सूरत) नगर के पास एक सुन्दर सरोवर है, जिसमें कमल लहलहाते रहते हैं. उसी में से श्वेत मृणालों के ग्रास लेकर मैं तीव्र गति से आकाश में उड़ रहा था. उड़ते-उड़ते सहसा वहाँ से पृथ्वी पर गिर पड़ा.

जब होश में आया और अपने गिरने का कोई कारण न देख सका तो मन ही मन सोचने लगाः आज मेरा पतन कैसे हो गया? पके हुए कपूर के समान मेरे श्वेत शरीर में यह कालिमा कैसे आ गयी?

मैं अभी विचार ही कर रहा था कि उस पोखरे के कमलों में से मुझे ऐसी वाणी सुनाई दी- ‘हंस! उठो, मैं तुम्हारे गिरने और काले होने का कारण बताती हूं. मैं उठकर सरोवर के बीच गया और वहाँ पाँच कमलों से युक्त एक सुन्दर कमलिनी को देखा. उसको प्रणाम करके मैंने अपने पतन का कारण पूछा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कमलिनी बोली- कलहंस! तुम आकाशमार्ग से मुझे लाँघकर गये हो, उसी पातक के परिणामवश तुम्हें पृथ्वी पर गिरना पड़ा है तथा उसी के कारण तुम्हारे शरीर में कालिमा दिखाई देती है.

तुम्हें गिरा देख मेरे हृदय में दया भर आयी और जब मैं इस मध्यम कमल के द्वारा बोलने लगी हूँ, उस समय मेरे मुख से निकली हुई सुगन्ध को सूँघकर साठ हजार भँवरे स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये हैं. पक्षिराज! जिस कारण मुझमें इतना वैभव–ऐसा प्रभाव आया है, उसे बतलाती हूँ, सुनो.

इस जन्म से पहले तीसरे जन्म में मैं इस पृथ्वी पर एक ब्राह्मण की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थी. उस समय मेरा नाम सरोजवदना था. मैं गुरुजनों की सेवा करती हुई सदा एकमात्र पतिव्रत के पालन में तत्पर रहती थी.

एक दिन की बात है, मैं एक मैना को पढ़ा रही थी. इससे पति सेवा में कुछ विलम्ब हो गया. इससे पतिदेव कुपित हो गये और उन्होंने शाप दिया-‘पापिनी! तू मैना हो जा.’ मरने के बाद यद्यपि मैं मैना ही हुई, तथापि पातिव्रत्य के प्रसाद से मुनियों के ही घर में मुझे आश्रय मिला.

किसी मुनि कन्या ने मेरा पालन-पोषण किया. मैं जिनके घर में थी, वे ब्राह्मण प्रतिदिन विभूति योग के नाम से प्रसिद्ध गीता के दसवें अध्याय का पाठ करते थे और मैं उस पापहारी अध्याय को सुना करती थी.

विहंगम! काल आने पर मैं मैना का शरीर छोड़ कर दशम अध्याय के माहात्म्य से स्वर्ग लोक में अप्सरा हुई. मेरा नाम पद्मावती हुआ और मैं पद्मा की प्यारी सखी हो गयी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक दिन मैं विमान से आकाश में विचर रही थी. उस समय सुन्दर कमलों से सुशोभित इस रमणीय सरोवर पर मेरी दृष्टि पड़ी और इसमें उतर कर ज्योंहि मैंने जलक्रीड़ा आरम्भ की, त्योंहि दुर्वासा मुनि आ धमके. उन्होंने वस्त्रहीन अवस्था में मुझे देख लिया.

उनके भय से मैंने स्वयं ही कमलिनी का रूप धारण कर लिया. मेरे दोनों पैर दो कमल हुए. दोनों हाथ भी दो कमल हो गये और शेष अंगों के साथ मेरा मुख भी कमल का हो गया. इस प्रकार मैं पाँच कमलों से युक्त हुई.

मुनिवर दुर्वासा ने मुझे देखा उनके नेत्र क्रोधाग्नि से जल रहे थे. वे बोले-‘पापिनी! तू इसी रूप में सौ वर्षों तक पड़ी रह. यह शाप देकर वे क्षण भर में अन्तर्धान हो गये कमलिनी होने पर भी विभूतियोग अध्याय के माहात्म्य से मेरी वाणी लुप्त नहीं हुई है.

मुझे लाँघने मात्र के अपराध से तुम पृथ्वी पर गिरे हो, पक्षीराज! यहाँ खड़े हुए तुम्हारे सामने ही आज मेरे शाप की निवृत्ति हो रही है क्योंकि आज सौ वर्ष पूरे हो गये. मेरे द्वारा गाये जाते हुए. उस उत्तम अध्याय को तुम भी सुन लो. उसके श्रवणमात्र से तुम भी आज मुक्त हो जाओगे.

यह कहकर पद्मिनी ने स्पष्ट तथा सुन्दर वाणी में दसवें अध्याय का पाठ किया और वह मुक्त हो गयी. उसे सुनने के बाद उसी के दिये हुए इस कमल को लाकर मैंने आपको अर्पण किया है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इतनी कथा सुनाकर उस पक्षी ने अपना शरीर त्याग दिया. यह एक अदभुत-सी घटना हुई. वही पक्षी अब दसवें अध्याय के प्रभाव से ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुआ है. जन्म से ही अभ्यास होने के कारण शैशवावस्था से ही इसके मुख से सदा गीता के दसवें अध्याय का उच्चारण हुआ करता है.

दसवें अध्याय के अर्थ-चिन्तन का यह परिणाम हुआ है कि यह सब भूतों में स्थित शंख-चक्रधारी भगवान विष्णु का सदा ही दर्शन करता रहता है.

इसकी स्नेहपूर्ण दृष्टि जब कभी किसी देहधारी के शरीर पर पड़ जाती है, तब वह चाहे शराबी और ब्रह्म हत्यारा ही क्यों न हो, मुक्त हो जाता है तथा पूर्वजन्म में अभ्यास किए हुए दसवें अध्याय के माहात्म्य से इसको दुर्लभ तत्त्वज्ञान प्राप्त हुआ तथा इसने जीवन्मुक्ति भी पा ली है।

अतः जब यह रास्ता चलने लगता है तो मैं इसे हाथ का सहारा दिये रहता हूँ. भृंगिरिटी! यह सब गीता के दसवें अध्याय की ही महामहिमा है.

पार्वती ! इस प्रकार मैंने भृंगिरिटि के सामने जो पापनाशक कथा कही थी, वही तुमसे भी कही है। नर हो या नारी अथवा कोई भी क्यों न हो इस दसवें अध्याय के श्रवण मात्र से उसे सब आश्रमों के पालन का फल प्राप्त होता है.

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