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जो चाहोगे वह पाओगे- सारी इच्छाएं पूरी कराने वाला मंत्र

जो चाहोगे वह पाओगे- सारी इच्छाएं पूरी कराने वाला मंत्र

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बात रूकनी नहीं चाहिए. प्रभु शरणम् एक धार्मिक-आधात्मिक अभियान है. इसे सभी तक पहुंचाने में सहयोग करें. चलिए पहले कथा सुनते हैं.

एक महात्माजी नदी के किनारे बैठकर सुबह-सुबह आवाज लगाया करते थे- जो चाहोगे वह पाओगे. यह उनका प्रतिदिन का कार्य था.

नदी पर स्नान के लिए आने वाले लोगों को लगता कि वृद्ध होने के कारण शायद महात्माजी पागल हो गए हैं. इसलिए बोलते रहते हैं.

सभी उनकी बात का खूब मजाक उड़ाते, कोई ध्यान न देता पर महात्माजी तो सारी बातें अनसुनी करके अपनी आवाज लगाते रहते.

एक दिन आदत के अनुसार महात्माजी सुबह-सुबह आवाज लगा रहे थे “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे”. वहां से गुजरते एक परदेसी ने उनकी आवाज सुनी तो ठिठका.

आवाज सुनकर वह महात्माजी के पास चला गया.

उस परसेदी ने पूछा- महाराज आपको मैंने ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ कहते सुना. क्या आप मुझे वह दिला सकते है जो मैँ जो चाहता हूँ?

महात्माजी तो तैयार ही थे- “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहते हो मैँ उसे जरूर दिला सकता हूं. यही तो मैं रोज कहता हूं. तुम्हें जो चाहिए सब प्राप्त करा दूंगा बस मेरी एक शर्त है.

युवक ने कहा- महात्माजी अगर आपकी किसी शर्त मानने से मेरी मनोकामना पूरी हो सकती है तो मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूं. बस आप मेरी इ्च्छा पूरी होने का रास्ता बताएं. क्या करना होगा मुझे?

महात्माजी ने कहा- तुम्हें मेरी बात बिना कोई प्रश्न किए माननी होगी. जो कहूंगा उसे पूरी तरह मानना होगा. यदि कोई प्रश्न किया तो फिर मेरा मंत्र निष्फल हो जाएगा. अब बोलो क्या संभव है तुम्हारे लिए, ऐसा कर पाना.

युवक को तो हर हाल में अपनी इच्छा पूरी करानी थी. वह क्यों मना करता.युवक जब पूरी तरह से संकल्पित होकर राजी हो गया तो महात्माजी ने पूछा-अब बताओ तुम्हें क्या चाहिए?

युवक बोला- मेरी एक ही ख्वाहिश है कि मैँ हीरों का प्रसिद्ध व्यापारी बनना चाहता हूं.

महात्माजी ने कहा- तुम अवश्य बन सकते हो. क्या तुम्हारे पास एक भी हीरा है? हीरे के कारोबार के बारे में कुछ भी जानते हो?

युवक ने ना में सिर हिलाया तो महात्माजी ने कहा- कोई बात नहीँ मैँ तुम्हें एक हीरा और एक मोती देता हूं. उससे तुम जितने भी हीरे और मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे.

युवक तो इतना प्रसन्न हुआ जैसे वह उछल ही पड़े. उसे लगा कि महात्माजी की झोली में कोई चमत्कारी रत्न पड़ा हो. ऐसे सिद्ध महात्माओं के पास होते हैं ऐसे कीमती रत्न. साधू के लिए उसका क्या मोल. अब मेरे काम आएगा.

वह इसी कल्पना में डूबा मन ही मन बड़ा व्यापारी जैसे महसूस कर रहा था कि महात्माजी ने अचानक उसके सारे सपनों पर पानी फेर दिया.

महात्माजी ने युवक की दायीं हथेली को पकड़ा और उस पर कुछ रखने का स्वांग करते हुए कहा- पुत्र, मैं तुम्हें दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं. लोग इसे ‘समय’ कहते हैं.

इसे कसके अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसका एक पल भी मत गंवाना. यदि तुमने इसे नहीं गंवाया तो तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो.युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि महात्माजी ने उसकी दूसरी हथेली में कुछ रखते हुए कहा- यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है. लोग इसे धैर्य कहते हैं.

जब कभी तुम्हारे हीरे यानी समय के बढ़िया इस्तेमाल के बाद भी परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना. याद रखना जिसके पास यह मोती है वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है.

युवक मन ही मन बुरी तरह झुंझला गया. उसको पहले तो महात्मा के आचरण पर क्रोध आया था लेकिन उसने गंभीरता से सोचा तो उनकी बातें सही लगीं.

उसने महात्माजी को वचन दिया कि अब से वह अपना समय बर्बाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा. वह विदा लेने के लिए उठा.

महात्माजी ने कहा- मैं तुम्हें चार वर्ष का समय देता हूं. चार साल बाद आकर मुझे बताना कि मेरे दिए हीरे-मोती से तुमने क्या कमाया.

जो युवक कुछ पलों पूर्व झुंझला रहा था अब उसमें आत्मविश्वास झलक रहा था. उसे लगा कि एक फकीर महात्मा को उस पर इतना विश्वास है फिर उसे स्वयं पर क्यों नहीं हो रहा.

उसने महात्माजी के चरण छूकर आशीर्वाद लिए और हीरों का व्यापारी बनने के निश्चय के साथ वहां से चला.

शहर गया और उसने हीरे के व्यापारी के यहां काम करना शुरू किया. अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर व्यापार की बारीकियां सीखने लगा. चार साल के अंत तक वह सिर्फ कारीगर नहीं रह गया बल्कि छोटे-मोटे सौदे करने लगा.उसे महात्माजी के दिए हीरे-मोती का परिणाम मिलता नजर आने लगा था. वह मेहनत से काक करता हुआ व्यापार के गुर सीख गया था और अब धीरे-धीरे उसकी पहचान भी बनने लगी थी.

चार साल बीतने पर वादे के अनुसार वह महात्माजी से मिलने के लिए आया.

वह अपने स्थान पर नहीं थे. उसने उनके शिष्यों से पूछा तो पता चला कि महात्माजी का देहांत हो चुका है. शिष्यों ने बताया कि महात्माजी ने मरते समय तुम्हारे लिए घड़े में कोई संपत्ति छोड़ रखी है. वह लेकर जाओ.

उसने वह घड़ा खोला.

घड़े में कागज के एक टुकड़े पर लिखा था. तुम कारोबार सीख चुके हो. धन की कमी नहीं है. अब एक चीज तुम्हारे पास से लुप्त होने वाली है संतोष. इसलिए मैं तुम्हें तीसरा रत्न संतोष देता हूं.

इसे अपने साथ गांठ बांधकर रख लो. बहुत बड़े व्यापारी बनोगे.

महात्माजी के तीन रत्नों की सहायता से वह युवक एक दिन खुद भी हीरे का बहुत बड़ा व्यापारी बन गया.जो लोग सफल होते हैं, उनके बारे में पता करके देखिए. हमें उनकी चमकती हुई सफलता तो स्पष्ट नजर आ जाती है लेकिन उस सफलता के पीछे उन्होंने कितने धक्के खाए होंगे, कितनी एड़ियां घीसी होंगी यह नहीं देख पाते.

वे सही समय पर सही कार्य में लगे थे और शुरुआती नाकामियों के बाद भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया था. समय और धैर्य का अच्छा संयोग सफलता के रास्ते खोलता है.

संतोष सोने में सुगंध का कार्य करता है और उस ऊंचाई तक ले जाता है जिसकी कल्पना भी हमने नहीं की होगी.

यदि आपका लक्ष्य बड़ा है यानी आपको बहुत दूर तक जाना है. दूर जाने में हर स्थान पर सवारी ही मिल जाए यह जरूरी नहीं. संभव है आधे से ज्यादा सफर पैदल ही ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर तय करना पड़े.

जो अपनी एडि़यों में विवाइयों से घबराते नहीं वही तो सबसे बड़े सफर पर निकलते का जज्बा रखते हैं. समय बर्बाद न करें, धैर्य से काम लें और संतोष रखें तो धन-दौलत और शोहरत सब मिल जाती है.

लेखन व संपादनः राजन प्रकाश

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