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कैसे हुआ रावण अपने ही महल में अपमानित ?

कैसे हुआ रावण अपने ही महल में अपमानित ?

Lord-Ram-Darbar
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श्रीराम की सेना लंका पर आक्रमण के लिए तैयार थीं. बस युद्धघोष होने की देर थी. श्रीराम ने सोचा कि रावण को इस विनाश को रोकने का एक अवसर और देना चाहिए.

उन्होंने रावण के पास युद्ध से पहले एक शांति दूत भेंजने का निर्णय किया जो रावण को उसके अपराध बताकर प्रायश्चित के लिए समझाए ताकि असंख्य निर्दोषों के प्राण बच जाएं.

किसे दूत बनाकर भेजा जाए? रावण तो हनुमानजी का वध ही करने को तैयार था. विभीषण के समझाने पर उसने वध की जगह केवल पूंछ में आग लगाने का दंड दिया.

रावण के दरबार में अब विभीषण भी नहीं हैं. इसलिए दूत ऐसा हो जो बुद्धि और बल दोनों में श्रेष्ठ हो. अंगद दूत बनकर श्रीराम का जयघोष करते रावण के महल की ओर चले.

रावण के रक्षकों को मारते-काटते अंगद सीधे रावण के राजदरबार में जा पहुंचे. रावण ने अंगद से वास्तविक परिचय देने को कहा.

अंगद बोले- तुम्हारे लिए इतना परिचय काफी है कि मैं बालीपुत्र अंगद रामदूत हूं और अपने स्वामी का संदेश लेकर आया हूं कि क्षमा मांगकर अपना विनाश रोक लो.

बाली का नाम सुनकर रावण का क्रोध कम हुआ. उसने कहा- तो तुम मेरे मित्र बाली के पुत्र हो. सुनाओ मेरे मित्र का कुशल-मंगल.

अंगद ने कहा- यदि तुम्हारी बुद्धि ठिकाने नहीं आई तो मेरे प्रभु के हाथों तुम भी शीघ्र ही अपने मित्र के पास चले जाओगे और वहीं उनका हाल-चाल पूछना.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रावण को बाली की मृत्यु की बात जानकर आश्चर्य हुआ. उसने सोचा कि अंगद किष्किंधा का युवराज है. यदि उसे फोड़ लिया जाए तो वानर सेना में फूट हो जाएगी.

अंगद को धिक्कारते हुए कहा रावण ने कहा- अपने पिता का वध करने वाले की सेवा करते तुम्हें लज्जा नहीं आती.

तुम मेरी तरफ आ जाओ. मेरे मित्र और अपने पिता का वघ करने वाले से प्रतिशोध लो.

अंगद रावण की चाल समझ गए. वह बोले- मुझे लज्जा की बात कहने वाले राक्षसराज, क्या तुम वही रावण हो जिसे राजा बलि ने पालाक लोक में अपनी घुड़साल में बांधकर रखा था.

या वह रावण हो जिसे हैहयराज अर्जुन ने बंदी बना लिया था तब पुलस्त्य मुनि ने याचना करके उसे मुक्त कराया था.

या वह रावण हो जिसकी धृष्टता का दंड देने के लिए मेरे पिता अपनी बगल में दबाए घूमते रहे थे और उसने मित्रता की दुहाई देकर अपनी जान बचाई थी.

अंगद ने रावण की सभा में उसके अपमानजनक अतीत का स्मरण कराकर रावण का मनोबल तोड़ा. उन्होंने कुशल दूत की क्षमता का परिचय दिया.

रावण खिसियाकर बोला- जिस रावण को तुम देख रहे हो, उसने कैलाश पर्वत उठा लिया था. इंद्र, वरूण, कुबेर, यम, अग्नि आदि जिसकी चाकरी करते हैं. तेरी ओर तेरे राम की मेरे सामने क्या बिसात!

अंगद बौखला गए. मेरे प्रभु की शक्ति की तो रहने दो. अगर तुम या तुम्हारे महाबली जिनके दम पर तुम श्रीराम से युद्ध करने की सोच रहे हो.

उनमें से कोई प्रभु के इस सेवक के मात्र पैर हिलाकर दिखा दे तो हम अपनी पराजय मान कर लंका से वापस चले जाएंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इतना कहकर अंगद ने पूरी ताकत से जमीन पर पैर पटका. धरती कांप गई और रावण के सिर का मुकुट गिर गया. रावण ने अपने महारथियों से अंगद का पैर उखाड़ने को कहा.

लेकिन श्रीरामभक्त को डिगाना कोई हंसी ठठ्ठा नहीं. हजार हाथियों के बल वाला इंद्रजीत भी अंगद के पैर नहीं हिला पाया. सबको हारता देख रावण खुद अंगद के पैरों की ओर बढ़ा.

अंगद ने स्वयं अपने पैर हटा लिए और कटाक्ष किया- मूर्ख! यदि पांव पकड़ने हैं तो श्रीराम के पकड़. तेरा कल्याण हो जाएगा. पुत्रों और प्रजा संग निर्विघ्न राज करेगा.

अंगद का काम हो चुका था. वह दूत की तरह संदेश भी दे चुके थे और रावण के सेनानायकों को श्रीराम के सामर्थ्य की झलक दिखाकर उनका मनोबल भी तोड़ चुके थे.

अंगद उड़े और सीधे प्रभु के पास पहुंच गए. रामचरितमानस में अंगद-रावण प्रसंग में युवराज अंगद में बल, बुद्धि और भक्ति के अद्भुत संयोग का हृदयस्पर्शी वर्णन है.

।।सियापति रामचंद्र की जय।। ।।पवनसुत हनुमान की जय।।

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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