पातिव्रत्य के प्रभाव से सावित्री ने यमराज से वापस ले लिए अपने पति के प्राणः वट-सावित्री व्रत से जुड़ी कथा

पातिव्रत्य के प्रभाव से सावित्री ने यमराज से वापस ले लिए अपने पति के प्राणः वट-सावित्री व्रत से जुड़ी कथा

the-story-of-savitri-satyavan
बेहतर अनुभव और लेटेस्ट कथाओं के लिए प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प डाउनलोड करें।google_play_store_icon

वट सावित्री व्रत का तीन दिनों का अनुष्ठान आरंभ हो चुका है. सावित्री ने पति की मृत्यु का समय समीप देखकर तीन दिनों की विशेष पूजा की थी. वट सावित्री में सावित्री और सत्यवान की कथा सुनने की महिमा है.

भद्र देश के राजा अश्वपति संतान हीन थे. उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए कई वर्षों का तप किया जिससे देवी सावित्री प्रसन्न हुईं. राजा ने उनसे एक संतान की याचना की.

सावित्री की कृपा से रानी गर्भवती हुईं और समय आने पर उन्होंने एक पुत्री को जन्म दिया. देवी सावित्री की कृपा से हुई संतान का राजा अश्वपति ने नाम सावित्री ही रखा.

सावित्री सभी गुणों से संपन्न एक तेजस्वी कन्या थी. राजा को कोई भी वर उसके योग्य नहीं समझा आता था इस कारण सावित्री के पिता दुःखी रहने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

हारकर उन्होंने सावित्री से कहा कि वह स्वयं अपने योग्य वर तलाश लें. सावित्री पिता के आदेश पर वर की तलाश में निकली. घूमते-घूमते वह एक वन में जा पहुंची जहां उनकी भेंट साल्व देश के राजा द्युमत्सेन से हुई.

द्युमत्सेन के शत्रुओं ने उनका राज् छीन लिया था और वह परिवार समेत वन में रहने को विवश थे. वहां सावित्री ने उनके पुत्र सत्यवान को देखा और उन्हें पति के रूप में वरण किया.

देवर्षि नारद को जब यह बात पता चली कि सावित्री ने सत्यवान का वरण किया है तो वह राजा अश्वपति के पाए गए और उन्हें सावित्री का विवाह सत्यवान से न करने को आगाह किया.

नारद ने कहा- आपकी कन्या ने वर खोजने में भूल की है. सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा है परन्तु वह अल्पायु है. उसकी आयु अब मात्र एक वर्ष ही शेष है.

नारदजी की बात सुनकर राजा पछताने लगे. उन्होंने सावित्री से कहा- वृथा न होहिं देवऋषि बानी.” देवर्षि की वाणी झूठी नहीं हो सकती. उन्होंने अपनी पुत्री को हर तरह से समझाया कि अल्पायु से विवाह करना उचित नहीं.

पर सावित्री तैयार नहीं थीं. उन्होंने पिता से कहा- आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती है तथा कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है. अब चाहे जो हो, मैं सत्यवान को ही पतिरूप में स्वीकार कर चुकी हूं.

पुत्री की जिद के आगे पिता को झुकना पड़ा. दोनों का विधि विधान के साथ पाणिग्रहण संस्कार किया गया और सावित्री अपने ससुराल में सास-ससुर की सेवा में रत हो गई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

समय बदला. नारद का वचन सावित्री को दिन-प्रतिदिन बेचैन कर रहा था. जब उसे जान लिया कि पति की मृत्यु का दिन नजदीक आ गया है तब तीन दिन पूर्व से ही उसने उपवास आरंभ कर दिया.

पति के मृत्यु की नारद द्वारा बताई गई निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया. नित्य की भांति उस दिन भी सत्यवान अपने समय पर लकडी काटने के लिए चला तो सावित्री ने भी सास-ससुर से पति के साथ जाने की आज्ञा ली.

सत्यवान वन में पहुंचकर लकडी काटने के लिए वृ्क्ष पर चढ गया. वृ्क्ष पर चढते ही सत्यवान के सिर में असहनीय पीडा होने लगी. वह व्याकुल हो गया और वृक्ष से नीचे उतर गया.

सावित्री समझ गई कि सत्यवान पर काल की गति मंडरा रही है. उसने सत्यवान का सिर अपनी गोद में रखकर उसे भूमि पर लिटा लिया. उसी समय दक्षिण दिशा से महिष परसवार यमराज आते दिखे.

धर्मराज सत्यवान के जीवन को जब लेकर चलने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पडी. पहले तो यमराज ने उसे दैवीय-विधान समझाया परन्तु सावित्री कुछ भी सुनने को तैयार न थी.

सावित्री की निष्ठा और पतिपरायणता को देख कर यमराज भी प्रभावित हुए. उन्होंने कहा कि वह पति के प्राणों के बदले उनसे कोई वर मांग ले.

सावित्री बोली- मेरे सास-ससुर वनवासी तथा अंधे हैं. उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें. यमराज ने कहा ऎसा ही होगा और अब तुम लौट जाओ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

यमराज की बात सुनकर सावित्री ने कहा- भगवान मुझे अपने पतिदेव के पीछे पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है. पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है.

सावित्री को वापस भेजने के लिए यमराज ने उससे एक और वरदान मांगने को कहा. सावित्री ने मांगा-मेरे ससुर का राज्य छिन गया है. उसे पुन: प्राप्त कर सकें और धर्मपरायण बने रहें. यमराज ने तथास्तु कहकर सावित्री को चले जाने के लिए कहा.

सावित्री ने कहा- प्रभु मैं आपसे कुछ भी याचना नहीं कर रही, बस अपने पति के मार्ग का अनुसरण कर रहीं हूं. अर्धांगिनी को पति के मार्ग का अनुसरण कर चाहिए मुझे यही सिखाया गया है. वे यमलोक दे द्वार तक पहुंच गए.

यमराज ने कहा- देवी आप पति के प्राणों के अलावा जो भी वर मांगना है मांग लो और लौट जाओ क्योंकि इस सीमा के आगे जीवित प्राणियों के प्रवेश की मनाही है.

इस बार सावित्री ने मांगा- हे धर्मराज आप मुझे अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान दीजिए. यमराज ने तथास्तु कह दिया और चलने को तैयार हुए.

सावित्री अब भी उनके पीछे पीछे चलती रही. अब यमराज का धैर्य जवाब दे रहा था. वह क्रोधित होने लगे. यमराज को क्रोधित होते देख सावित्री उन्हें नमन किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

सावित्री ने कहा- प्रभु आपने मुझे सौ पुत्रों की मां बनने का आशीर्वाद तो दे दिया लेकिन बिना पति के मैं मां किस प्रकार से बन सकती हूं इसलिए आप अपने तीसरे वरदान को पूरा करने के लिए मुझे मेरा पति लौटा दें.

सावित्री के पतिव्रत धर्म पर यमराज बहुत प्रसन्न हो गए. उन्होंने सत्यवान के प्राण को अपने पाश से मुक्त कर दिया. यमराज ने कहा- तुमने अपने पातिव्रत्य धर्म के बल से अपने पति को जीवनदान दिया. तुम्हारा यश सर्वदा बना रहेगा.

सावित्री सत्यवान के प्राणों लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची और सत्यवान जीवित होकर उठ बैठे. दोनों हर्षित होकर अपनी राजधानी की ओर चल पडे. यमराज की कृपा से उनके माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई थी.

इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहें. सावित्री ने तीन दिवस का अनुष्ठान किया था. इसलिए तीन दिवस तक अनुष्ठान की मान्यता है.

सत्यवान के प्राण यमराज ने उसी वट वृक्ष के नीचे हरे थे और सावित्री के कारण वहीं वापस भी मिले इसलिए इस व्रत का नाम वट सावित्री है.

मान्यता है कि वट सावित्री की इस कथा को सुनने और उपवास रखने से वैवाहिक जीवन या जीवनसाथी की आयु पर आया संकट टल जाता है.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
प्रभु शरणम्

error: Content is protected !!