परशुराम कथाः पितामह भृगु का प्रपौत्र को आदेश, तत्काल मेरा आश्रम छोड़क चले जाओ परशुरामः भाग-1

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भगवान परशुराम की कथा साहस, कौशल, अटूट पितृभक्ति और अनूठे आख्यानों से भरी है. अपनी मां की हत्या कर देने और 21 बार धरती से हैहय क्षत्रियों का नाश करने वाले परशुराम शिव के अनन्य भक्त और श्रीविष्णु के छठे अवतार हैं.
अश्वत्थामा, हनुमान और विभीषण की भांति परशुराम भी चिरंजीवी हैं.परशुराम पर अगले कई दिनों तक हम एक शृंखला चलाएंगे और कई ऐसी कथाएं आपके समक्ष लाने का प्रयास करेंगे जो काफी हद तक अनकही हैं.
भृगु के वंश में एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया राम. राम ने भगवान शिव की घोर तपस्या की. भोले बाबा ने प्रसन्न होकर एक दिव्य परशु यानी फरसा प्रदान किया.
जैसे नारदजी वीणा के साथ ही चलते हैं उसी तरह राम भी अपने साथ सदैव इस फरसे को रखते थे इसी कारण वह परशुराम कहे जाने लगे. वास्तव में ब्राह्मण कुल में जन्मे परशुराम का आचरण क्षत्रिय जैसा होने के पीछे उनके दादा का ही एक शाप था.
कन्नौज के राजा गाधि की एक परमरूपवती पुत्री थीं सत्यवती. भृगु पुत्र ऋचीक सत्यवती के रूप पर मुग्ध हो गए और उन्होंने गाधि से उनकी पुत्री मांग ली. भृगु के पुत्र का अनादर करने का सामर्थ्य गाधि में न था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
विवाह के कुछ समय पश्चात भृगु अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद देने आए और सत्यवती से वर मांगने को कहा. गाधि को पुत्र था इस कारण वह चिंतित रहते थे. सत्यवती ने उन से स्वयं और अपनी माता दोनों के लिए एक उत्तम पुत्र की याचना की.
भृगु ने सत्यवती को अभिमंत्रित चरू के दो पात्र दिए और बोले- इस चरू को ग्रहण करने के बाद तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का अलिंगन करें और तुम ऐसी कामना लेकर गूलर का आलिंगन करना. सावधान चरुओं की अदला-बदली न हो.
सत्यवती की माँ ने सोचा हो न हो भृगु ने अपनी पुत्रवधू को उत्तम सन्तान का चरु दिया होगा. लालच में उसने चरू की अदला-बदली कर दी. भृगु को पता चल गया. वह क्रोध में भरकर सत्यवती के पास आए.
भृगु बोले- तुम्हारी माता ने छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है. इसलिए अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्म्ण कुल में होकर भी स्वभाव से क्षत्रिय होगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
मां की हेराफेरी से दुःखी सत्यवती ने अपने श्वसुर से विनती की कि ब्राह्मण ऋषि का पुत्र यदि ब्राह्मण जैसा आचरण न करे तो लोग मेरे चरित्र पर संदेह करेंगे. अत: यदि अब होनी को नहीं टाला जा सकता तो आप अपने स्तर पर इसका एक हल कर दें.
आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा व्यवहार करे. भृगु को दया आ गई और उन्होंने सत्यवती की विनती स्वीकार ली.
सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि पैदा हुए. जमदग्नि में श्रेष्ठ ब्राह्मण वाले गुण विद्यमान थे. उनका विवाह राजा प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ. जमदग्नि से रेणुका ने पांच पुत्रों को जन्म दिआ.
रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस और राम. राम बचपन से शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र विद्या में भी सबसे आगे रहते. निस्संदेह भृगु की भविष्यवाणी रेणुका के सबसे छोटे पुत्र में ही सत्य होने वाली थी.
एक बार बालक राम अपने दादा भृगु ऋषि के पास गए. राम को देखते ही भृगु समझ गए कि यह कौन हैं और इन्होंने यह शरीर क्यों धरा है. भृगु ने राम को कुछ आवश्यक बात बताने के लिए एकांत में बुलाया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
भृगु बोले- जो मैं कह रहा हूं वह सिर्फ हमारे बीच ही रहनी चाहिए. हे राम, आप इसी समय इस आश्रम से निकल जायें. मेरे इस आदेश में ही सबका कल्याण छिपा है. आप इस आश्रम से अपने पितामह का आदेश समझकर चले जाएं.
भृगु राम से अत्यधिक स्नेह रखते थे. राम को भी अपने पितामह से बड़ा प्रेम था. वह तो अपने पितामह से कुछ दिव्य विद्याएं सीखने आए थे किंतु जब उन्हें आश्रम से चले जाने का आदेश मिला तो वह आवाक रह गए.
देवताओं द्वारा वंदनीय भृगु ने जब ऐसा कहा कि राम का आश्रम से जाना विश्व कल्याण के लिए आवश्यक है तो राम ने भारी मन से इसे स्वीकार लिया और वह चलने को तैयार हुए.
आखिर भृगु ने राम को आश्रम से निकल जाने को क्यों कहा? जो दिव्य विद्याएं सीखने राम आए थे क्या वे विद्याएं वह सीख पाए. इस प्रसंग को अगले पोस्ट में कुछ ही देर में सुनाएंगे.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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