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भागवत कथाः श्रीकृष्ण लीला- कंस के दूतों केशी और व्योमासुर का संहार

भागवत कथाः श्रीकृष्ण लीला- कंस के दूतों केशी और व्योमासुर का संहार

krishna balarama

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंकंस ने केसी नामक दैत्य को श्रीकृष्ण की हत्या के लिए व्रज में भेजा. केशी ने घोड़े का रूप धरा और तूफान की गति से दौड़ता हुआ आया. वह इतने जोरों से हिनहिना रहा था कि सभी उसकी आवाज़ से भयभीत थे.

व्रज को इस तरह आक्रांत करते केशी दैत्य को देखकर श्रीकृष्ण क्रोधित हो गए. उन्होंने केशी को चुनौती दी. केशी ने जोरदार दुलत्ती के प्रहार से श्रीकृष्ण का अहित करना चाहा.

प्रभु ने उसके दोनों पैर पकड़ लिए और हवा में उसे कई बार घुमाते हुए जोर से झटक दिया. केशी चार सौ हाथ की दूरी पर जाकर गिरा. उसके गिरने की आवाज भी बड़ी भयानक थी.

उसने अपनी शक्ति फिर से बटोरी ओर श्रीकृष्ण की ओर लपका. दुलत्ती चलाने पर होने वाली दुर्दशा उसने देख ली थी. इसलिए इस बार उसने अपनी रणनीति बदली.

उसके तीखे और बड़े-बड़े दांत थे. उसने सोचा छल से बालकृष्ण को इऩ दांतों के बीच जकड़ लेता हूं. प्रभु के पास आकर उसने अचानक अपना मुंह खोला और उन्हें काटने के लिए लपका.

प्रभु ने अपना हाथ उसके मुंह में दे दिया. उनके कोमल हाथ प्रचंड अग्नि के ताप जैसे जल रहे थे. ताप का प्रचंड ऐसा था कि केसी के दांत तत्काल झड़ गए. वह तड़पने लगा.

भगवान ने हाथ और लंबे किए और उसके कंठ में फंसा दिया. अब तो केसी की सांस ही रूक गई थी. दम घुटने से वह तड़पता हुए पैर पटकने लगा. शरीर पसीने से लथपथ था. आंखें चढ़ गईं.प्रभु खड़े मुस्कराते रहे. फिर तड़पते हुए केशी का शरीर ही फट गया. उसके प्राण निकल गए. प्रभु के हाथों उसका उद्धार हुआ. दैत्यकुल से निकलकर वह सीधे मोक्ष को प्राप्त हुआ.

भगवान केशी का उद्धार करके पुनः ग्वाल बालों के साथ खेल-कूद में लग गए. केशी के साथ-साथ कंस ने व्योमासुर को भी अपने कार्य में उसकी सहायता के लिए भेजा था.

व्योमासुर असुरों के विश्वकर्मा समझे जाने वाले सबसे बड़े मायावी राक्षस मयासुर का पुत्र था. उसे भी समस्त माया की कलाएं आती थीं. वह श्रीकृष्ण और उनकी टोली के खेल पर नजर रख रहा था.

ग्वाल बाल आपस में चोर और रक्षक बनकर छिपने-छुपाने का खेल खेल रहे थे. वह बालक बनकर शामिल हो गया और खेल में चोर बन जाता था. फिर ग्वाल बालों को चुराकर एक गुफा में बंद कर देता.

गुफा के द्वार पर बड़ी सी चट्टान रखकर उसे बंद कर देता था. इस तरह केवल चार-पांच ग्वाल बाल ही बचे. संख्या कम होती देख प्रभु को चिंता हुई. फिर उन्होंने ध्यान लगाया तो सारा खेल समझ में आ गया.व्योमासुर फिर एक बालकर को लेकर चला तो पीछे से श्रीकृष्ण ने उसे दबोच लिया. राक्षस बहुत बलवान था लेकिन प्रभु की पकड़ इतनी सख्त थी कि वह छटपटाने लगा.

हारकर उसने अपना असली रूप प्रकट किया. उसका शरीर किसी पहाड़ जैसा विशाल था. वह श्रीकृष्ण के पंजे से खुद को छुड़ाने के लिए उलट-पुलट और गुलाटी मारने लगा परंतु भगवान उसे छोड़े हीं नहीं.

श्रीकृष्ण ने उसे उठाकर जमीन पर पटका और फिर किसी पशु की तरह उसका गला दबाकर उस राक्षस का उद्धार कर दिया. भगवान ने गुफा को तोड़कर अपने मित्रों को निकाला और गायें लेकर घर की ओर चले.

ग्वाल बाल एक दिन में दो-दो बार हुए इस तरह के अनिष्ट के प्रयास से भयभीत थे परंतु श्रीकृष्ण ने उन्हें मोहित करके उनकी स्मृति से सारी बातें मिटा दीं जैसे कुछ हुआ ही न हो.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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