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गय असुर के दर्शन से पापमुक्त हो प्राणी जाने लगे स्वर्गलोक, देवों ने गय को किया अचलः गया तीर्थ की कथा

गय असुर के दर्शन से पापमुक्त हो प्राणी जाने लगे स्वर्गलोक, देवों ने गय को किया अचलः गया तीर्थ की कथा

lord vishnu
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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे उस दौरान उनसे असुर कुल में गय नामक असुर की रचना हो गई. गय असुरों के संतान रूप में पैदा नहीं हुआ था इसलिए उसमें आसुरी प्रवृति नहीं थी. वह देवताओं का सम्मान और आराधना करता था.

उसके मन में एक खटका था. वह सोचा करता था कि भले ही वह संत प्रवृति का है लेकिन असुर कुल में पैदा होने के कारण उसे कभी सम्मान नहीं मिलेगा. इसलिए क्यों न अच्छे कर्म से इतना पुण्य अर्जित किया जाए ताकि उसे स्वर्ग मिले.

गयासुर ने कठोर तप से भगवान विष्णु को प्रसन्न किया. भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो गयासुर ने मांगा- आप मेरे शरीर में वास करें. जो मुझे देखे उसके सारे पाप नष्ट हो जाएं. वह जीव पुण्यात्मा हो जाए और उसे स्वर्ग में स्थान मिले.

भगवान से वरदान पाकर गयासुर घूम-घूमकर लोगों के पाप दूर करने लगा. जो भी उसे देख लेता उसके पाप नष्ट हो जाते और स्वर्ग का अधिकारी हो जाता. इससे यमराज की व्यवस्था गड़बड़ा गई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कोई घोर पापी भी कभी गयासुर के दर्शन कर लेता तो उसके पाप नष्ट हो जाते. यमराज उसे नर्क भेजने की तैयारी करते तो वह गयासुर के दर्शन के प्रभाव से स्वर्ग मांगने लगता. यमराज को हिसाब रखने में संकट हो गया था.

यमराज ने ब्रह्माजी से कहा कि अगर गयासुर को न रोका गया तो आपका वह विधान समाप्त हो जाएगा जिसमें आपने सभी को उसके कर्म के अनुसार फल भोगने की व्यवस्था दी है. पापी भी गयासुर के प्रभाव से स्वर्ग भोंगेगे.

ब्रह्मा ने उपाय निकाला. उन्होंने गयासुर से कहा कि तुम्हारा सबसे ज्यादा पवित्र है इसलिए तुम्हारी पीठ पर बैठकर मैं सभी देवताओं के साथ यज्ञ करुंगा.

उसकी पीठ पर यज्ञ होगा यह सुनकर गय सहर्ष तैयार हो गया. ब्रह्माजी सभी देवताओं के साथ पत्थर से गय को दबाकर बैठ गए. इतने भार के बावजूद भी वह अचल नहीं हुआ. वह घूमने-फिरने में फिर भी समर्थ था.

देवताओं को चिंता हुई. उन्होंने आपस में सलाह की कि इसे श्रीविष्णु ने वरदान दिया है इसलिए अगर स्वयं श्रीहरि भी देवताओं के साथ बैठ जाएं तो गयासुर अचल हो जाएगा. श्रीहरि भी उसके शरीर पर आ बैठे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.विष्णुजी को भी सभी देवताओं के साथ अपने शरीर पर बैठा देखकर गयासुर ने कहा- आप सब और मेरे आराध्य श्रीहरि की मर्यादा के लिए अब मैं अचल हो रहा हूं. घूम-घूमकर लोगों के पाप हरने का कार्य बंद कर दूंगा.

लेकिन मुझे चूंकि श्रीहरि का आशीर्वाद है इसलिए वह व्यर्थ नहीं जा सकता इसलिए श्रीहरि आप मुझे पत्थर की शिला बना दें और यहीं स्थापित कर दें.

श्रीहरि उसकी इस भावना से बड़े खुश हुए. उन्होंने कहा- गय अगर तुम्हारी कोई और इच्छा हो तो मुझसे वरदान के रूप में मांग लो.

गय ने कहा- नारायण मेरी इच्छा है कि आप सभी देवताओं के साथ अप्रत्यक्ष रूप से इसी शिला पर विराजमान रहें और यह स्थान मृत्यु के बाद किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए तीर्थस्थल बन जाए.

श्रीविष्णु ने कहा- गय तुम धन्य हो. तुमने लोगों के जीवित अवस्था में भी कल्याण का वरदान मांगा और मृत्यु के बाद भी मृत आत्माओं के कल्याण के लिए वरदान मांग रहे हो. तुम्हारी इस कल्याणकारी भावना से हम सब बंध गए हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भगवान ने आशीर्वाद दिया कि जहां गय स्थापित हुआ वहां पितरों के श्राद्ध-तर्पण आदि करने से मृत आत्माओं को पीड़ा से मुक्ति मिलेगी. क्षेत्र का नाम गयासुर के अर्धभाग गय नाम से तीर्थ रूप में विख्यात होगा. मैं स्वयं यहां विराजमान रहूंगा.

वह स्थान बिहार के गया में हुआ जहां श्राद्ध आदि करने से पितरों का कल्याण होता है.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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