दशरथ ने अपने दामाद ऋंगी से कराया था पुत्रेष्ठि यज्ञः दशरथ पुत्री शांता की प्रचलित कथा

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राजा दशरथ ने राजकुमारी कौशल्या से विवाह किया और उनकी एक पुत्री हुई शांता. अंगदेश के राजा चित्ररथ जिनका नाम रोमपद भी था दशरथ के घनिष्ट मित्र थे. रोमपद की पत्नी वर्षिणी कौशल्या की बहन लगती थीं.
रोमपद निःसंतान थे. वह राजा दशरथ से मिलने आए और हंसी-हंसी में में दशरथ से उनकी बेटी को मांग लिया. रघुवंशी होने के कारण दशरथ ने वह वचन निभाया और शांता को रोमपद को दे दिया.
रोमपद और वर्षिणी ने शांता का पालन-पालन पोषण किया. शांता का विवाह विभाण्क ऋषि के पुत्र ऋष्यशृंग जिन्हें ऋंगी भी कहा जाता है से हुआ. ऋंगी का जन्म हिरणी के गर्भ से हुआ था.
विभाण्डक परम तेजस्वी ऋषि थे जो कठोर तप किया करते थे. एक दिन विभाण्डक नदी में स्नान कर रहे थे. तभी नदी में ही उनका वीर्यपात हो गया. पास में जल पी रही एक हिरणी ने उस जल को पी लिया और गर्भवती हो गई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हिरणी ने एक बालक को जन्म दिया. हिरणी से उत्पन्न होने के कारण बालक के सिर में सींग जैसी आकृति बनी थी. विभाण्डक अपने अंश से पैदा हुए बालक को उपहास से बचाना चाहते थे. इसलिए उसे लेकर अंग देश के पास घने जंगल में चले आए.
एक बार इंद्र का उपासक एक ब्राह्मण कृषिकार्य में सहायता मांगने रोमपद के पास गया. रोमपद ने अंजाने में उसका उपहास कर दिया. अपने भक्तं के अपमान से इंद्र क्रोधित हुए और बारिश नहीं होने दी. इस कारण वहां सूखा पड़ गया.
पूरे अंग क्षेत्र में बारिश नहीं होती थी लेकिन जहां ऋंगी निवास करते थे वहां खूब बारिश होती थी. राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ. ऋषियों ने बताया कि ऋंगी का प्रभाव ऐसा है कि वह जहां जाते हैं वहां खूब बारिश होती है.
रोमपद ने ऋंगी को किसी तरह अपने राज्य में बुलाने का उपाय लगाने को मंत्रियों को कहा. विभाण्डक ने उन्हें समाज से एकदम अलग रखा था. ऋंगी ने अपने पिता के अतिरिक्त किसी मनुष्य को कभी देखा ही न था.
मंत्रियों ने कहा कि ऋंगी पुरुष से तो परिचित हैं लेकिन स्त्री से उनका परिचय नहीं हैं. इसलिए राज्य की मुख्य नर्तकियों को भेजा गया. नर्तकियां उन्हें नृत्य और सौंदर्य के मोहपाश में बांधकर वन से बाहर ले आईं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उनके आते ही भारी वर्षा हुई. अंगदेश में उत्सव का माहौल बन गया. चूंकि स्त्री के मोह में उलझाकर ऋंगी को लाया गया था इसलिए वर्षिणी और रोमपद ने निर्णय किया कि उनका विवाह एक योग्य कन्या से कराया जाए. शांता का विवाह ऋंगी से कर दिया.
ऋंगी ने रोमपाद से यज्ञ आदि करवाया और उन्हें उत्तराधिकारी प्राप्त हुआ. दशरथ भी उत्तराधिकारी विहीन होने से दुखी रहते थे. महर्षि वशिष्ठ ने सलाह दी कि ऋंग ऋषि से पुत्र कामेष्ठि यज्ञ करवाएं तो पुत्र की प्राप्ति होगी.
ऋंगी ने पहले तो मना कर दिया लेकिन अपनी पत्नी के कहने पर वह दशरथ के पुत्र कामेष्ठि यज्ञ के मुख्य ऋत्विक बनने को राजी हो गए. शांता तथा ऋंग ऋषि अयोध्या आए.
पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता है. राजा दशरथ ने ऋंग ऋषि को बहुत-सा धन दिया जिससे ऋंग ऋषि के पुत्र और कन्या का भरण-पोषण हुआ.
यज्ञ से प्राप्त खीर से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ. ऋंग ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने लगे.
भागवत पुराण में संक्षेप में यह आता है कि दशरथ ने अपने दामाद ऋंगी से पुत्रेष्ठि यज्ञ कराया था. बाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में ये प्रसंग नहीं हैं लेकिन दक्षिण भारत के रामायण में शांता का प्रसंग विस्तृत रूप से आया है.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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