हिंदू जरूर पढ़ें फिर ईश्वर अवतार का मजाक उड़ाने वालों को सही जवाब दें
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भगवान ने मत्स्य यानी मछली का रूप धरकर कोई संदेश दिया है या बस यूं ही लिया अवतार? भगवान भी मछली, कछुआ, शूकर और पता नहीं क्या-क्या अवतार लेते हैं. यह सब कहानियां झूठी हैं. भगवान ऐसे जीव क्यों बनेंगे. शेर, मोर गाय क्यों नहीं बनते. यह सब ढकोसला है. पुराण एक कोरी कल्पना है.
ऐसी बातें मैं रोज सुनता हूं. लोग व्हॉट्सएप्प पर या सामने की चर्चा में यह सब कहते रहते हैं. कोई उत्तर नहीं देता बस कह देता कि प्रभु शरणम् को पढ़ते रहो तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे. किसी की मूर्खता का क्या उत्तर देना?
आज कार्तिक पूर्णिमा है. आज श्रीहरि ने मत्स्य अवतार लिया था. क्या अर्थ है इस मत्स्य अवतार का आज हम इसे समझेंगे. पोस्ट को पूरा पढ़िएगा. पहले मत्स्य अवतार की कथा सुनेंगे फिर उस कथा के पात्रों का क्या औचित्य है इसकी बात करते हुए कथा का अर्थ समझेंगे. आशा है आपको आनंद आएगा.
कल्प के अंत में ब्रह्माजी के सो जाने से ब्राह्म नामक नैमित्तिक प्रलय उत्पन्न हुआ. उस प्रलय के प्रभाव से संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो गई यानी जलमें समा गई. निद्रा की स्थिति में ब्रह्माजी के मुख खुले रह गए तो उनके मुख में वास करने वाले चारो वेद देवता बाहर निकल आए.
हयग्रीव नामक दैत्य इसी ताक में था कि कब वेदों का हरण कर लिया जाए. दैत्य को यह बात पता थी कि वेद ऋचाओं के माध्यम से ही मनुष्य आदि अपनी शक्तियां देवताओं तक पहुंचाते रहते हैं जिसके कारण देवताओं का बल कभी कम नहीं होता.
हयग्रीव देवताओं के शक्तिस्रोत को बंद करना चाहता था इसलिए उसने तत्काल वेदों का हरण कर लिया ताकि देवताओं को यज्ञ और मंत्रोच्चारों से मिलने वाली शक्ति बंद हो जाए.
जल्दी ही वेदों का ज्ञान लुप्त होता चला गया तो अधर्म का बोलबाला हो गया. धर्म से देवता पुष्ट होते हैं परंतु धर्म तो लुप्त हो गया था.
देवों की शक्ति घटी तो स्वाभाविक था कि दैत्य बलशाली हो जाएं. शक्तिहीन देवताओं को दैत्यों ने प्रताडि़त करना आरंभ कर दिया. उन्हें उनके लोक से बलपूर्वक भगा दिया. उनके धन और स्त्रियों पर आधिपत्य जमा लिया.
बेघर-बेसहारा देवताओं ने भगवान श्रीविष्णु से रक्षा की गुहार लगाई. देवताओं ने भांति-भांति से स्तुति करके श्रीहरि को प्रसन्न किया और उनसे उद्धार की विनती की.
ब्रह्माजी अभी भी निद्रा में थे. सबसे आवश्यक था कि वेदों को प्राप्त किया जाए और फिर ब्रह्माजी को जगाकर उनके संरक्षण में रख दिया जाए. चूंकि समूची पृथ्वी जल से भरी थी इसलिए हयग्रीव को वेदों को छुपाने का सबसे सुरक्षित स्थान लगा- समुद्र. उसने गहरे समुद्र में वेदों को छिपा दिया.
वेदों का पता लगाने के लिए समुद्र में उथल-पुथल लाना जरूरी था क्योंकि जल के अतिरिक्त कुछ था ही नहीं.पृध्वी को भय हुआ कि नारायण द्वारा किए उथल-पुथल से कहीं उसका अद्भुत वैभव और उसकी संपदा हमेशा-हमेशा के लिए नष्ट न हो जाए.
श्रीहरि को पृथ्वी की चिंता भी उचित लगी क्योंकि हयग्रीव साधारण दैत्य तो था ही नहीं. उसके साथ युद्ध कितना लंबा चले यह कहना मुश्किल था और तब तक पृथ्वी की संपदा की रक्षा का दायित्व भगवान किसे देते.
भगवान को दो कार्यों की राह निकालनी थी. पहला तो वेदों का पता लगाकर उन्हें हयग्रीव के बंधन से मुक्त कराकर उद्धार करना और दूसरा पृथ्वी की दुर्लभ संपदा की रक्षा करना.
भगवान श्रीविष्णु ने इसके लिए मत्स्य का रूप धारण किया. हयग्रीव के साथ युद्ध की अवधि में पृथ्वी के वैभव की रक्षा करने वाले एक पराक्रमी और उदार जीव की भी तलाश थी.
भगवान ने सत्यव्रत नामक प्रतापी और दयालु राजा को इसके लिए योग्य पाया. सत्यव्रत इस महान कार्य में कितने योग्य साबित होंगे उसकी छोटी सी परीक्षा भी भगवान ने ली.
जब सत्यव्रत नदी में स्नान कर रहे थे उसी समय श्रीहरि ने एक छोटी मछली का रूप धरा और उनकी अंजलि में आ गए. राजा ने अंजुली में आई मछली को वापस पानी में छोड़ना चाहा.
तभी मछली मनुष्यों के स्वर में बोल पड़ी- हे दयालु और विद्वान राजा सत्यव्रत मैंने आपकी बड़ी प्रशंसा सुनी है. आपके पराक्रम और ज्ञान दोनों से ही मैं प्रभावित होकर आपका दर्शन करने आई थी. उसी समय मुझ पर बड़ी मछलियों ने आघात किया.
बड़ी कठिनाई से प्राण बचाकर मैं आपकी अंजुलि में समा गई क्योंकि प्राण रक्षा का इससे सुरक्षित स्थान मुझे कोई और लगा परंतु आप तो मुझे पुनः उसी जल में प्रवाहित कर रहे हैं जहां से मैं किसी प्रकार भागकर आई हूं.
हे विद्वान नरश्रेष्ठ! आपको बताने की आवश्यकता नहीं कि जल का यही विधान है कि बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है. जलीय जीवन का क्रम यही है. आपकी अंजलि से मुक्त होते ही मुझे भी कोई बड़ी मछली खा जाएगी. मैं आपकी शरणागत हूं, आप मेरी रक्षा करिए.
मछली के इस करूण प्रार्थना सेराजा सत्यव्रत को दया आ गई. उन्होंने मछली को प्राणरक्षा का वचन दिया और उसे अपने कमंडल में रख लिया.
मछली का आकार बढ़ने लगा. वह कमंडल में नहीं समा पा रही थी तो राजा ने उसे एक मटके में रख दिया. कुछ ही पलों में मछली बढ़कर मटके के आकार की हो गई और छटपटाने लगी.
राजा ने मटके से निकालकर एक विशाल तालाब में मछली को रख दिया. रात भर में बढ़कर मछली ने पूरे तालाब को घेर लिया. छोटी सी मछली के लिए दो दिनों में ही विशाल तालाब छोटा पड़ने लगा तो सत्यव्रत समझ गए कि यह कोई मछली नहीं है बल्कि मछली के रूप में कोई देव हैं जो परीक्षा लेने आए हैं.सत्यव्रत ने मछली को प्रणाम कर अनुरोध किया- हे परमात्मा, आप प्रकट होकर मुझे दर्शन दें और कृतार्थ करें.
मत्स्य रूप त्यागकर श्रीहरि प्रकट हुए और बोले- प्रजापति सत्यव्रत मैंने आपको एक विशेष कार्य के लिए चुना है. मछली का रूप धरकर मैं तो आपकी दयालुता की परीक्षा ले रहा था.
सत्यव्रत तो कृतकृत्य हो गए. उन्होंने हर प्रकार से श्रीहरि की स्तुति और पूजा की उसके बाद शीश झुकाकर बोले- हे प्रभु आप आदेश करें. संकट में घिरी प्रजा की रक्षा के लिए मैं किस प्रकार सहयोगी हो सकता हूं.
श्रीहरि बोले- आज से सातवें दिन पृथ्वी प्रलय के चक्र में घिर जाएगी. प्रलयंकारी मेघ पूरे वेग से वर्षा करेंगे. पृथ्वी का रहा स्थान भी जो अभी तक जल में नहीं डूबा है वह भी जल में डूब सकता है. आपके पास एक विशाल नौका पहुँचेगी.
आप पृथ्वी के सभी दुर्लभ अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्त ऋषियों के साथ उस नौका पर बैठ जाइएगा. नागराज वासुकी इस नाव को मछली के साथ बांध देंगे. वह ही नौका कुछ समय के लिए उन दुर्लभ बीजों का आश्रयस्थल रहेगी.
जब देवकार्य पूर्ण हो जाएगा तो आपको स्वतः पता चल जाएगा कि इसके आगे क्या कार्य करना है. आप इन सात दिनों में समस्त अनाजों और औषधियों के बीजों को इकत्रित कर लें.
इतना कहकर भगवान वहां से अंतर्धान हो गए.
सत्यव्रत ने श्रीहरि के आदेशानुसार कार्य किया. सातवें दिन प्रभु ने दर्शन दिए. सत्यव्रत सप्तर्षियों के साथ श्रीहरि के बताए अनुसार बीजों, औषधियों को लेकर नौका में सवार हो गए.
वासुकि रस्सी की भांति नौका को मत्स्य रूपी भगवान के साथ लपेटकर साथ चलते रहे. भगवान उन्हें लेकर सुमेरू पर्वत की ओर चले.
रास्ते में सत्यव्रत ने भगवान से कहा- हे नाथ! मेरे लिए यह दुर्लभ अवसर है. संसार में किसी को ऐसा अवसर अब तक प्राप्त नहीं हुआ है. आपके दर्शन के बादकुछ और प्राप्त करने की न तो आवश्यकता रह जाती है और न लालसा. हे प्रभु! इस मार्ग और यात्रा और उत्तम व उपयोगी बनाने के लिए मुझे ज्ञान प्रदान करें.भगवान प्रियव्रत की इस बात से बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उपदेश करना आरंभ किया. सुमेरू तक पहुंचने के मार्ग में मत्स्य अवतार श्रीहरि ने जो उपदेश किया उसे मत्स्य पुराण के नाम से जाना जाता है.
इस तरह पृथ्वी की हर तरह की संपदा का अंश (नमूना) सुरक्षित करा लिया. पृथ्वी इस उपाय से संतुष्ट हो गई. सुमेरू तक नौका को पहुंचाने के बाद श्रीहरि वेदों को खोजने चल पड़े.
मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने हयग्रीव के साथ भीषण संग्राम किया और उसका वध करके उससे वेदों को मुक्त कराया. वेद वापस ब्रह्माजी को दे दिए गए. वह कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि थी.
सत्यव्रत भगवान श्रीहरि के दर्शन और उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान से परिपूर्ण हुए थे. ब्रह्माजी ने पुनः सृष्टि आरंभ की और प्रियव्रत को उस मन्वंतर का मनु बनाया. उस मन्वंतर का नाम वैवस्वत मन्वंतर हुआ और प्रियव्रत वैवस्वत मनु हुए.
अब हम इस कथा का निहितार्थ अर्थात गूढ़ बात समझने का प्रयास करेंगे. इसे समझने के लिए लंबी चर्चा की आवश्यकता है फिर भी सरलता से और थोड़े में कहने का प्रयास कर रहा हूं.
कथा की शुरुआत में कल्प के अंत हो जाने और चारों तरफ जल भर जाने की बात कही गई है. आखिर ऐसा क्यों कहा गया है- इसे समझते हैं. हमारा शरीर का अस्तित्व वास्तव में दो प्रकार से है- एक तो आत्मा का स्वरूप है जो दिखता नहीं बस अनुभव किया जा सकता है और दूसरा है दैहिक स्वरूप यानी देह जिसे आप देखते हैं और अनुभव भी करते हैं.
बिना देह स्वरूप के कार्य हो नहीं सकते, खेती-बाड़ी से लेकर जीवन के सभी कार्य शरीर से ही तो होंगे. इसी से सृष्टि चल रही है परंतु मूल स्वरूप तो आत्मा का है क्योंकि देह नष्ट हो जाएगा पर आत्मा नहीं.
आत्मस्वरूप जब देह स्वरूप में आता है तो सृष्टि चलती है लेकिन जब देहस्वरूप वापस अपने मूलरूप यानी आत्मास्वरूप में जाता है तो सब नष्ट हो जाता है. शरीर मर जाता है- यही प्रलय का प्रतीक है.
जब हमारा मन स्थिर रहता है तो हम ज्ञान की बातें करते हैं, हमारे भीतर एक शांति आ जाती है जो सुंदर-सुंदर बातें कहती है और फिर उसमें इतने लीन हो जाते हैं कि अपनी सुध-बुध भी नहीं रहती. जैसे मीरा कृष्णभक्ति में लीन हो जाती हैं तो ध्यान ही नहीं रहा कि वस्त्र किधर और केश किधर.
आत्मा में लीन होते ही हमारे अंदर का ज्ञान मुक्त होता है- इसी बात को समझाने के लिए कहा गया है कि ब्रह्माजी जब सृष्टि निर्माण के कार्यों से विश्राम लेकर आनंद में डूबे तो उनके मुख से वेद बाहर निकल आए.
जब आपके अंदर से ज्ञान की राशि प्रकट होती है तो आपका व्यक्तित्व बड़ा हो जाता है. आपकी प्रशंसा होने लगती है, आपके पास लोगों का तांता लग जाता है. उसी समय आपके अंदर अभिमान जागता है कि हम तो इतने बड़े हो गए. हम महान हो गए. वह अभिमान ही हयग्रीव दैत्य है.
उसके जागते ही हमारी सारी महानता हमारा सारा ज्ञान उसके वश में हो जाता है और हम पतन की ओर बढ़ते हैं जिसे प्रलय कहा गया है. उस समय सत्य पर जिसकी निष्ठा बनी रहती है वैसे सत्यव्रत की संगति में आकर ही पुनः उद्धार हो सकता है.
सत्यव्रत से प्रेम करेंगे तो वासुकि जैसे नाग भी आपके मित्र हो जाएंगे, आपके वश में हो जाएंगे क्योंकि आप हरि की शरण में होंगे. हरि सत्यपथ पर चलने वाले का ही हाथ थामते हैं. इस प्रकार आप पुनः नई सृष्टि बनाने में सफल होंगे. यही जीवन का क्रम है. उत्थान से पतन और फिर पतन से पहले से भी ज्यादा सुंदर उत्थान का मार्ग.
हमारे पुराणों में जो बातें कही गई हैं वह सब सांकेतिक हैं. उनका अभिप्राय, उनका अर्थ हमें समझना होगा. सांकेतिक रूप में इसलिए कही गईं क्योंकि ज्ञान हमेशा योग्य के पास ही होना चाहिए अन्यथा वह इसका दुरुपयोग करेगा जैसे रावण ने किया.
सांकेतिक ज्ञान को आप आज की भाषा में कोड वाले मैसेज समझिए. कोड को खोलने के लिए आपको परिश्रम करना होगा. परिश्रम करते-करते आपका मन पावन हो जाएगा और फिर आपमें समझ आएगी कि इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए.
पुराणों और उनकी कथाओं का उपहास करने वाले इस परिश्रम से बचने की फिराक में हैं और सबसे सरल कार्य है किसी का उपहास कर देना. यही आज्ञानता है. तो विधर्मियों के समक्ष आपको दबने की जरूरत नहीं. उन्हें तर्क से करारा जवाब देने की जरूरत है. सनातन ज्ञान का मुकाबला कोई नहीं कर सकता. गर्व करें इस पर.
प्रभु शरणम् के माध्यम से मैं यह प्रयास करना चाहता हूं कि उन कोडेड मैसेज को समझा जाए, परखा जाए और लाभ लिया जाए. यह भी मंत्र जप, भजन, हवन, कीर्तन से कम पुण्यकारी कार्य नहीं है.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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