भगवान के दर्शन कैसे हों? हर भक्त को दर्शन तो चाहिए पर भगवान हैं कि दर्शन देते ही नहीं. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी विधि में कुछ खोट है. छोटी सी प्रेरक कथा के माध्यम से आपको भगवान के दर्शन कराते हैं.

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भगवान कहां नहीं है. कण-कण में हैं भगवान. यह बात हम कहते-सुनते हैं पर क्या इसे मानकर इसपर अमल करते हैं? हमने इसे बस कहावत समझ लिया, इसका सारतत्व नहीं जाना. यदि इसके अर्थ को समझ लेते तो जीवन वैसा ही बदल जाता जैसा भगवान की एक प्रियभक्त का बदला था. बस यही रट लगाए हैं कि कण-कण में हैं तो भगवान के दर्शन होते क्यों नहीं. आज हम आपको कराएंगे भगवान के दर्शन.
भगवान के दर्शन के लिए धैर्य चाहिए, भक्तिभाव चाहिए. यह कथा बेशक बहुत छोटी सी है लेकिन पूजा-पाठ करने वाले, भजन-कीर्तन करने वालों के लिए आंखें खोलने वाली है. पढ़के समझ लें तो जिस भगवान के दर्शन के लिए लालायित हैं वह आपको सब ओर दिख जाएंगे. धैर्य के साथ पढ़िए, समझिए. मन आनंदित हो जाएगा.
एक स्त्री बड़ी भगवतभक्त थी. सारे पूजा-पाठ, व्रत त्योहार करती. भजन-कीर्तन, सत्संग का अगर कहीं आयोजन हो रहा हो तो वह वहां जरूर होती. पूरी श्रद्धा के साथ हर प्रकार की सेवा भी करती. इसी तरह भगवद्भक्ति में उसको रमे हुए अनगिनत साल बीत गए. उसके जैसी भगत तो उसके सारे मोहल्ले में कोई न थी. सब यही मानते थे पर उस भक्तन के मन में भगवान को लेकर एक मलाल था. वह उसे कचोटता रहता.
भगत को इस बात का बड़ा मलाल रहा कि इतनी श्रद्धाभक्ति का क्या लाभ जब भगवान ने दर्शन ही न दिए. जानती हूं अब भगवान साक्षात दर्शन तो सभी को देते नहीं. साधु-महात्माओं को ही देेते हों शायद, पर मैंने भी भक्ति में जीवन बिता दिया. इतनी भक्ति तो मेरी भी है कि साक्षात नहीं तो कम से कम भगवान सपने में दर्शन दे देते.
इतने साल से नियमपूर्वक तपस्या कर रही हूं, भगवान कभी तो सुनेंगे. किसी न किसी दिन सपने में ही दर्शन तो देंगे. वह भक्त ऐसा सोचती रहती थी. मलाल तो अपनी जगह पर था ही पर उसे दर्शन की आस भी थी. इसी आस के सहारे वह अपने पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन में जुटी रही.
अनेक वर्ष और गुजर गए. बस उसी आस से भक्ति में जुटी रही पर भगवान ने फिर भी उसे सपने में भी कभी दर्शन न दिया. यह बात उसे फिर से कचोटने लगी. “साक्षात नहीं तो क्या मैं सपनों में दर्शन के योग्य भी नहीं हूं. ऐसी गई गुजरी है मेरी भक्ति. सब व्यर्थ जा रहा है क्या!”
अगर व्यर्थ ही जा रहा है तो कुछ औऱ उपाय सोचना चाहिए. इससे तो बात नहीं बनने वाली. किसी न किसी की सहायता से भगवान तक बात तो पहुंचानी होगी. शायद मेरे मन का मलाल, मेरी बातें भगवान तक पहुंच नहीं रही हैं.
फिर सोचती इतने लोग हैं, भगवान से फरियाद करते हैं. बहुत व्यस्त होंगे इसलिए मेरी बात सुन नहीं पा रहै. तभी दूसरा ख्याल आता कि मैं हमेशा तो जिंदा रहूंगी नहीं. फिर तो कोई फायदा ही न हुआ. जैसे भी हो जिसकी मदद से भी हो, बात तो भगवान तक पहुंचानी ही होगी. दूसरा कोई रास्ता अब है नहीं.
सोते-जागते उसके मन में यही ख्याल चलता रहता. हारकर उसने निश्चय किया कि हो न हो अब इसका फैसला भी कर ही लेना चाहिए, ऐसे तो अब नहीं चलेगा भगवान. पर समस्या वहीं आकर अटकी कि भगवान तक उसकी फरियाद पहुंचाएगा कौन?
वह सारी रात सोचती रही. भगवान तक किसकी पहुंच है. कौन वहां जाकर मेरी बात कह सकता है. कोई जाता भी तो मेरी बात क्यों कहेगा भला. यह सोचते-सोचते न जाने उसे कब नींद आ गई.
सुबह उठी और अपने नियम अनुसार सत्संग में पहुंची. दिनभर सत्संग में सेवा की, सत्संग सुना. तभी उसे ख्याल आया कि महात्माजी की तो भगवान से रोज की भेंट मुलाकात है. क्यों न इनसे ही कहा जाए. इनका सत्संग इतने समय से सुन रही हूं, सेवा दे रही हूं. ये तो मेरी बात कह ही सकते हैं. एक बार पूछकर देखने में क्या हर्ज है.
उसने निश्चय किया कि आज तो महात्माजी से इस सिलसिले में बात करके ही रहेगी. सत्संग खक्तम होने पर उसे मौका मितो तो महात्माजी के सामने अपनी दुविधा रख दी.
उसने महात्माजी से पूछ डाला- क्या आपकी भगवान से बात हो सकती है? वहां तक मेरा एक उलाहना पहुंचाना है, क्या आप पहुंचा देंगे?
महात्माजी सोचने लगे- बड़ी विचित्र बात हो गई. पहली बार ऐसा हो रहा है जो कोई कह रहा है भगवान तक मेरा उलाहना पहुंचा दो. लोग तो भगवान तक प्रार्थना पहुंचाना चाहते हैं, इसे उलाहना भेजना है. ऐसा क्या हो गया.
इस भगत को तो लंबे समय से देख रहा हूं. निष्ठा-भक्ति में पूरी दिखाई पड़ती है, पर भगवान से इसका क्या रार हो गया.
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महात्माजी ने पूछा- वह तो सोचेंगे पर भगवान के साथ तुम्हारी नाराजगी हुई किस बात की? उन्हें किस बात का उलाहना देना है?
उस स्त्री ने कहना शुरू किया- आप कहते हैं भगवान भक्तों के साथ होते हैं. ध्यान करो तो दर्शन देते हैं. मैं इतने साल से पूरी श्रद्धा और नियम से ध्यान, अर्चन, व्रत-पूजा, सत्संग सब कर रही हूं. मुझे आज तक क्यों नहीं दिया दर्शन भगवानजी ने? मैंने तो साक्षात दर्शन की अभिलाषा भी नहीं रखी थी. स्वप्न में भी दर्शन न दिए भगवान ने. मेरा उनसे कोई झगड़ा या रार नहीं है पर ये शिकायत है. आपकी जब उनसे बात हो तो मेरा उलाहना जरूर पहुंचा देना.
महात्माजी सादगी से भरे मन से निकले इस प्रश्न से हैरान हो गए. उन्होंने कह दिया- ठीक है, भगवान मिले तो पूछकर बताउंगा. पर तब तक तुम जरा धैर्य रखना. अपनी पूजा-भक्ति में कमी न आने दो.
महात्माजी को तो भगत ने धर्मसंकट में डाल दिया, सूझता ही न था कि क्या कहें. उन्होंने गौर किया था कि वह स्त्री हमेशा अलग-अलग महिलाओं के साथ प्रवचन में बैठती है. जबकि महिलाएं स्वभाविक रूप से अपने परिचितों के साथ बैठा करती हैं. उनके मन में कौतूहल हुआ कि आखिर ऐसा क्यों है. मैं इतने जगह जाता हूं भक्तजन प्रवचन सुनने आते हैं पर बैठने की उनकी प्रवृति एक सी है. इसमें भिन्न क्यों है.
उन्होंने किसी से कहकर स्त्री के विषय में पूरी जानकारी निकालकर लाने को कहा. उस भक्त ने स्त्री के स्वभाव के बारे में बहुत कुछ बता दिया. फिर तो महात्माजी सारा माजरा समझ गए.
अगले दिन उस स्त्री ने महात्माजी से पूछा- महात्माजी आपकी भगवान से भेंट हुई थी क्या? आपने उनसे पूछा कि मुझे दर्शन क्यों नहीं दे रहे?
महात्माजी मुस्कुराने लगे. फिर बोले- पुत्री भगवानजी तुम पर बहुत नाराज हैं. मैंने जैसे ही तुम्हारा उलाहना उनतक पहुंचाया, वह उलटा मुझपर ही बिगड़ पड़े. वह कह रहे थे वह स्त्री हमेशा हमारे बच्चों से लड़ती है. उन्हें मारती-पीटती है. कड़वी बात कहके उनका हृद्य दुखाती है. मैं तो हर हृदय में हूं. जितने हृदय दुखाती है मुझे उतनी वेदना होती है. मैं उसे क्यों दर्शन दूंगा.
मैं उसे बिलकुल दर्शन नहीं दूंगा. तुम उसकी पैरवी लेकर कैसे आए हो? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? खबरदार जो आगे से कभी उसकी पैरवी की मेरे पास. सावधान कर रहा हूं तुम्हें. तुम्हारा भी आना-जाना बंद हो जाएगा.
इतना कहकर महात्माजी शांत हो गए. भगवान मुझसे इतने नाराज हैं कि मेरे कारण महात्माजी पर भी बिगड़ गए. वह फफफ-फफककर रोने लगी.
महात्माजी ने उसे शांत कराया. फिर बोले- अब बताओ तुम्हारे आचरण के कारण मेरा भी बिगाड़ हो गया हो गया भगवा जी से. तुम ऐसा क्यों करती हो? ऐसे आचरण नहीं छोड़ोगी तो तु्म्हारी सारी पूजा-अर्चना व्यर्थ है. सबके प्रति प्रेमभाव रखो. दयाभाव रखो. दुत्कार से नहीं प्यार से भगवान प्रियभक्त बना जाता है.
भगवान की छवि देखो कितनी निश्चल मुस्कान है. कितने शांत भाव से हैं. अमीर-गरीब, साफ-गंदा, स्वस्थ-बीमार कोई भी आ जाए क्या उनके भाव बदलते हैं. क्या वह किसी को देखकर ज्यादा मुस्कुराने लगते हैं या किसी को देखकर मुंह बिचका लेते हैं? नहीं न? सबको प्रेमभाव, करूणाभाव से देखते हैं. तुम भगवान को अब पूजन-कीर्तन से ज्यादा अपने आचरण से प्रसन्न करो. मैं संतुष्ट हुआ तो दोबारा तुम्हारी पैरवी लेकर जाउंगा चाहे भगवान से पक्का बिगाड़ ही क्यों न हो जाए.
उस स्त्री की आंखें खुल गईं. उसका व्यवहार और आचरण बदल गया. इस बदलाव से उसे बहुत सम्मान मिलने लगा. भगवान की अनन्य भक्त तो पहले से ही थी, सब उसमें भगवान की छवि देखने लगे. उस शांति में ही उसे भगवान की उपस्थिति का अनुभव करने लगी.
कुछ समय बाद महात्माजी ने पूछा- बता देना तुम्हारी पैरवी लेकर अगर जाना हो तो, मैं कह आऊंगा भगवान से.
भगत ने कहा- अब तो मुझे रोज दर्शन हो रहे हैं, साक्षात. फिर स्वप्न में दर्शन के लिए पैरवी क्यों लगवाऊं. दोनों ठठाकर हंस पड़े.
कितनी बड़ी बात है. पूजा-अर्चना, सत्संग-कीर्तन मन के नेत्र खोलने के लिए बने हैं. प्रभु तो भाव के प्रेमी हैं. कहते हैं मुझे पाना है तो मुझमें आ मिलो. अब पानी में तेल तो मिल नहीं सकता. पानी में मिलने के लिए पानी ही बनना पड़ेगा. निर्मल बनके भक्ति करें, तो प्रभु स्वयं आएंगे आपके द्वार.
भगवान के बनाए जीव भी भगवान के अंश हैं. उनके साथ किटकिट करते हैं और भगवान के सामने भक्ति में भरकर झूमते हैं तो यह सब व्यर्थ है. परहित सरिस धर्म नहीं भाई. क्या भगवान के दर्शन नहीं हो सकते. आप किसी का जीवन संवार दें- निष्काम भाव से. उपकार के बाद प्रति उपकार की आशा न रखें. जो किया हो किसी के लिए उसे गिनाइए भी नहीं. धैर्य रखिए एक दिन वह आपमें अपना भगवान देखेगा. उस आनंद की कोई सीमा न होगी.
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-राजन प्रकाश
