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माता सीता ने क्या युद्ध में रावण के वंश के एक असुर का संहार भी किया था

माता सीता ने क्या युद्ध में रावण के वंश के एक असुर का संहार भी किया था

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंभगवान श्रीराम रावण को मारने के बाद फिर लंका लौटे, कारण था कुंभकर्ण के बेटे का संहार करना. पर इस बार पराक्रम दिखाया माता सीता ने, वे चंडिका की तरह लड़ीं.

भगवान् श्रीराम राजसभा में विराज रहे थे उसी समयविभीषण वहां पहुंचे. वे बहुत भयभीत और हडबड़ी में लग रहे थे. सभा में प्रवेश करते ही वेकहने लगे – हे राम ! मुझे बचाइये, कुम्भकर्ण का बेटा मूलकासुर आफत ढारहा है .अब लगता है न लंका बचेगी और न मेरा राज पाट.

भगवान श्री राम द्वारा ढांढस बंधाये जाने और पूरी बात बताये जाने पर विभीषण ने बताया कि कुम्भकर्ण का एक बेटा मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था. इसलिये उस का नाम मूलकासुर रखा गया. इसे अशुभ जान कुंभकर्ण ने जंगल में फिंकवा दिया था.

जंगल में मधुमक्खियों ने मूलकासुर को पाल लिया. मूलकासुर बड़ा हुआ तो उसने कठोर तपस्या कर के ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया, अब उनके दिये वर और बलके घमंड में भयानक उत्पात मचा रखा है. जब जंगल में उसे पता चला कि आपने उसके खानदान का सफाया कर लंका जीत ली और राज पाट मुझे सौंप दिया है वह भन्नाया हुआ है.भगवन आपने जिस दिन मुझे राजपाट सौंपा उसके कुछ दिन बाद ही वह पाताल वासियों के साथ लंका पहुँच कर मुझपर धावा बोल दिया. मैंने छः महिने तक मुकाबला किया पर ब्र्ह्माजी के वरदान ने उसे इतना ताकतवर बना दिया है कि मुझे भागना पड़ा.

अपने बेटे, मन्त्रियों तथा स्त्री के साथ किसी प्रकार सुरंग के जरिये भागकर यहाँ पहुँचा हूँ. उसने कहा कि ‘पहले धोखेबाज भेदिया विभीषण को मारुंगा फिर पिता की हतया करने वाले राम को भी मार डालूँगा. वह आपके पास भी आता ही होगा.

समय कम है, लंका और अयोध्या दोनों खतरे में हैं. जो उचित समझते हों तुरन्त कीजिये. भक्त की पुकार सुन लव, कुश तथा लक्ष्मण सहित सेना को तैयार कर पुष्पक यान पर चढ़ झट लंका की ओर चल पड़े.

मूलकासुर को श्रीरामचंद्र के आने की बात मालूम हुई, वह भी सेना लेकर लड़ने के लिये लंका के बाहर आ डटा. भयानक युद्ध छिड़ गया. सात दिनों तक घोर युद्ध होता रहा. मूलकासुर भगवान श्रीराम की सेना पर अकेले ही भारी पड़ रहा था.अयोध्या से सुमन्त्र आदि सभी मन्त्री भी आ पहुँचे. हनुमान् जी संजीवनी लाकर वानरों, भालुओं तथा मानुषी सेना को जिलाते जा रहे थे. सब कुछ होते हुये भी पर युद्ध का नतीजा उनके पक्ष में जाता नहीं दीख रहा था. भगवान् चिन्ता में थे.

विभीषण ने बताया कि इस समय मूलकासुर तंत्र साधना करने गुप्त गुफा में गया है. उसी समय ब्रह्माजी वहाँ आये और भगवान से कहने लगे – ‘रघुनन्दन ! इसे तोमैंने स्त्री के हाथों मरने का वरदान दिया है. आपका प्रयास बेकार ही जायेगा.

श्रीराम, इससे संबंधित एक बात और है, उसे भी जान लेना फायदेमंद हो सकता है.जब इसके भाई बिरादर लंका युद्ध में मारे जा चुके तो एक दिन इसने मुनियों के बीच दुखी हो कर कहा, ‘चण्डी सीता के कारण मेरा समूचा कुल नष्ट हुआ’. इस पर एक मुनि ने नाराज होकर उसे शाप दे दिया – ‘दुष्ट ! तुने जिसे चण्डी कहा है, वही सीता तेरी जान लेगी. ’ मुनि का इतना कहना था कि वह उन्हें खा गया.बाकी मुनि उस के डर से चुप चाप खिसक गये.तो हे राम, अब कोई दूसरा उपाय नहीं है.अब तो केवल सीता ही इसका वध करसकती हैं. आप उन्हें यहाँ बुला कर इसका वध करवाइये,इतना कहकर ब्रह्माजी चले गये. भगवान् श्रीराम ने हनुमानजी और गरुड़ को तुरन्त पुष्पक विमान से सीताजी को लाने भेजा

इधर सीता देवी-देवताओं की मनौती मनातीं, तुलसी, शिव-प्रतिमा, पीपल आदि के फेरे लगातीं, ब्राह्मणों से ‘पाठ, रुद्रीय’ का जप करातीं, दुर्गाजी की पूजा करती कि विजयी श्रीराम शीघ्र लौटें. तभी गरुड़ और हनुमान् जी उनके पास पहुँचे.

पति के संदेश को सुनकर सीता तुरन्त चल दीं. भगवान श्री राम ने उन्हें मूलकासुरके बारे में सारा कुछ बताया. फिर तो भगवती सीता को गुस्सा आ गया . उनके शरीर से एक दूसरी तामसी शक्ति निकल पड़ी, उसका स्वर बड़ा भयानक था.

यह छाया सीता चंडी के वेश में लंका की ओर बढ चलीं . इधर श्रीराम ने वानर सेना को इशारा किया कि मूलकासुर जो तांत्रिक क्रियाएं कर रहा है उसको उसकी गुप्त गुफा में जा कर तहस नहस करें.

वानर गुफा के भीतर पहुंच कर उत्पात मचाने लगे तो मूलकासुर दांत किट्किटाता हुआ,सब छोड़छाड़ कर वानर सेना के पीछे दौड़ा. हड़बड़ी में उसका मुकुट गिर पड़ा. फिर भी भागता हुआ वह युद्ध के मैदान में आ गया.युद्ध के मैदान में छायासीता को देखकर मूलकासुर गरजा, तू कौन? अभी भाग जा.मैं औरतों पर मर्दानगी नही दिखाता. छायासीता ने भी भीषण आवाज करते हुये कहा,‘मैं तुम्हारी मौत-चण्डी हूँ. तूने मेरा पक्ष लेने वाले मुनियों और ब्राह्मणों को खा डाला था, अब मैं तुम्हें मारकर उसका बदला चुकाउंगी.

इतना कहकर छायासीता ने मूलकासुर पर पाँच बाण चलाये. मूलक ने भी जवाब में बाण चलाये. कुछ देर कहुत घोर युद्द हुआ पर अन्त में ‘चण्डिकास्त्र’ चलाकर छायासीता ने मूलकासुर का सिर उड़ा दिया. वह लंका के दरवाजे पर जा गिरा.

राक्षस हाहाकार करते हुए इधर उधर भाग खड़े हुए. छायासीता लौटकर सीता केशरीर में प्रवेश कर गयी. मूलका सुर से दुखी लंका की जनता ने मां सीता की जयजयकार की और विभीषन ने उन्हें धन्यवाद दिया. कुछ दिनों तक लंका में रहकर श्रीराम सीता सहित पुष्पकयान से अयोध्या लौट आये ।

(स्रोत: आनन्द रामायण)

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