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श्रीराम के वंशजों को भगवती का वरदान, काशी की रक्षा के लिए करूंगी काशीवासः बनारस के दुर्गाकुंड की पौराणिक कथा

श्रीराम के वंशजों को भगवती का वरदान, काशी की रक्षा के लिए करूंगी काशीवासः बनारस के दुर्गाकुंड की पौराणिक कथा

mata rani
पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंसंसार के सबसे पुराने शहरों में से हैं वाराणसी. यहां के दुर्गाकुंड में स्थित मां पराम्बा हजारों साल से इस शहर की रक्षा करती आ रही हैं. ऐसा क्यों? इस रहस्य से पर्दा देवी भागवत पुराण की इस कथा से उठता है.

भगवान राम के कुळ में ही आगे चलकर एक राजा हुए ध्रुवसंधि. ध्रुवसंधि की दो रानियां थीं. बड़ी रानी कलिंगराज वीरसेन की बेटी मनोरमा थीं. छोटी उज्जैन नरेश की पुत्री लीलावती.

राजा के दोनों रानियों से एक-एक बेटे थे. बड़ी से सुदर्शन और छोटी से हुए पुत्र का नाम था शत्रुजित. राजा दोनों को बराबर प्रेम करते थे. ध्रुवसंधि शिकार को गए. शेर से सामना हो गया. शेर तो मरा ही ध्रुवसंधि भी स्वर्ग मारे गए.

बड़े बेटे सुदर्शन को अयोध्या की राजगद्दी दी गयी. यह बात शत्रुजित के नाना युद्धजित को हजम नहीं हुई. वह सेना के साथ अयोध्या पर चढ बैठा. सुदर्शन के समर्थन में अयोध्या की सेना, प्रजा और उनके नाना वीरसेन थे.भयंकर युद्ध हुआ. वीरसेन मारे गए तो भयभीत होकर मनोरमा ने लड़ाई रोक दी और महामंत्री विदल्ल तथा सुदर्शन के साथ भरद्वाज मुनि के आश्रम में शरण ली.

युद्धजित के सैनिक यहां भी पहुंचे पर मुनि के भय से भाग गये. सुदर्शन मां और महामंत्री के साथ यहां रहने लगा. बालक सुदर्शन ने किसी को एक दिन महामंत्री विदल्ल को क्लीव यानी डरपोक कहते सुना.

बालक ने यह शब्द सुना तो उसकी जुबान पर चढ गया. वह सोते जागते क्लीव रटने लगा. क्लीव से फिर क्लीं. दैवयोग से सुदर्शन हमेशा क्लीं रटने लगा. क्लीं मां काली का बीजमंत्र है. इस तरह रटने से सुदर्शन को वह काली मंत्र सिद्ध हो गया.

भरद्वाज मुनि ने भी सुदर्शन को अस्त्र-शस्त्र और शास्त्र की हर प्रकार की शिक्षा दिलवाई. एक बार जंगल में ही भगवती कृपा से सुदर्शन को दिव्य धनुष और तीरों से भरा तरकश भी मिल गया.

युवा सुदर्शन अब शक्ति संपन्न हो गया. इसी बीच काशी के राजा सुबाहु की जगदंबा भक्त बेटी शशिकला ने एक सपना देखा. सपने में भगवती ने उसे सुदर्शन से विवाह का आदेश दिया.

शशिकला ने देवी के आदेश पर सुदर्शन को अपना पति मान लिया और अपने पिता सुबाहु को बता दी. सुबाहु नाराज होकर बोले- असहाय जंगली से विवाह हमारी शान के खिलाफ है. बेटी न मानी तो उन्होंने स्वयंवर की घोषणा कर दी.स्वयंवर के लिए सभी राजाओं को न्योता गया पर सुदर्शन को नहीं. शशिकला ने चतुराई दिखाते हुए एक ब्राह्मण द्वारा सपने में देवी मां के संदेश की बात सुदर्शन तक पहुंचवा दी.

उधर युद्धजित अपने नाती शत्रुजित को लेकर स्वयंवर में आ गए. सुदर्शन को शशिकला ने मन ही मन अपना पति चुन लिया है यह बात भी अब तक छुपी नहीं थी. शत्रुजित को इससे क्रोध आया.

उसने सुबाहु को धमकाया कि मैं तुम्हारी और सुदर्शन की हत्या कर शशिकला को उठा ले जाउंगा. सुबाहु घबराए पर देवी के आदेश वाली बात सुनकर कई राजाओं को सुदर्शन के प्रति सहानुभूति हो गई.

उन्होंने सुदर्शन को समझाया कि एक दिन का समय है. अपने प्राणों की रक्षा करो. प्राण रहेंगे तब तो विवाह करोगे. सुदर्शन ने कहा- मैं न तो किसी का बुरा सोचकर आया हूं और न किसी का अहित करुंगा.

मैं तो अपनी आराध्या मां भगवती के आदेश का पालन करने आया हूं, बिना उनके संकेत के कहीं नहीं जाउंगा. मुझे पूरा भरोसा है कि वे मेरी हर तरह से रक्षा करेंगी. वह काशी में ही डटा रहा.

सारे राजा स्वयंवर में सजधज कर आए पर शशिकला ने स्वयंवर में आने से साफ इंकार कर दिया. सुबाहु ने शशिकला को समझाया कि इस तरह स्वयंवर आयोजित करने के बाद तुम्हारे नहीं जाने से क्रोधित राजा आक्रमण कर देंगे.शशिकला न मानी. उस दिन सुबाहु ने तो राजाओं से यह कह दिया कि कल आएं. आज शशिकला तैयार नहीं है. स्वयंवर में आए राजा मान गए पर शशिकला किसी हाल में तैयार न हुई.

शशिकला ने कहा- इतना ही भय है तो अब एक ही रास्ता है. सुदर्शन इसी नगर में हैं. उन्हें बुलवाइए, रातों रात गुप्त रीति से विवाह कराकर हम दोनों को अपने राज्य की सीमा से बाहर ले जाकर सुरक्षित छोड़ आइये.

राजा सुबाहु के पास और कोई चारा भी न था. सुदर्शन को बुलाकर शीघ्रता में शादी करायी और दोनो को सुबह होने से पहले काशी से बाहर ले जाने के लिए निकले परंतु शत्रुजित के जासूसों ने यह खबर उस तक पहुंचा दी थी.

शत्रुजित अपने नाना की सेना के साथ सुदर्शन और सुबाहु के सामने आ खड़ा हुआ. उसने ललकारा तो सुदर्शन भी अपना दिव्य तीर धनुष ले तैयार हो गया. एक तरफ वह अकेला था तो सामने सेना. यह अन्याय देख स्वयं देवी वहां प्रकट हो गयीं.

देवी को देखते ही युद्धजित की सारी सेना भाग खड़ी हुई. शत्रुजित अपने नाना समेत मारा गया. मां जगदम्बा सुदर्शन पर प्रसन्न थीं. मां ने कहा- सुदर्शन कोई इच्छित वर मांग लो.सुदर्शन ने कहा- मां, आपके चरणों में मेरी भक्ति आजीवन बनी रहे. साथ ही आप इस काशीपुरी की रक्षा हमेशा करती रहें, मेरी बस यही अभिलाषा. आप इसे पूर्ण करें.

जगदंबा ने सुदर्शन से कहा- ऐसा ही होगा. तुम अयोध्या का शासन संभालो. मैं तुम्हारी इच्छा की पूर्ति के लिए काशी में वास करूंगी. जब भी कोई संकट आएगा तो इसकी रक्षा करूंगी.

अपने भक्त सुदर्शन को दिया वचन निभाने के लिए माता जगदंबा काशी नगरी में दुर्गाकुंड में वास करने लगीं और उस समय से आजतक वाराणसी की रक्षा कर रही हैं.

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