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हजार यज्ञ करने वाले धर्मात्मा राजा ने प्रजा पर थोपी भक्ति की रीति, जल गए सारे पुण्य- भक्ति थोपने का दंड

हजार यज्ञ करने वाले धर्मात्मा राजा ने प्रजा पर थोपी भक्ति की रीति, जल गए सारे पुण्य- भक्ति थोपने का दंड


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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंभक्ति ऐसा भाव है जिससे भक्त भगवान के साथ स्वयं को जोड़ लेता है. ईश्वर के साथ अपना रिश्ता किस विधि जोड़ेगा, इस पर कोई बंधन नहीं होना चाहिए. यह कथा बताती है कि एक धर्मात्मा ने भक्ति की विधि प्रजा पर थोपी तो क्या गति हुई.

राजा भुवनेश बहुत प्रतापी धार्मिक राजा थे. एक हजार अश्वमेध और दस हजार वाजपेय यज्ञ करवाए. हर यज्ञ में सवा लाख से ज्यादा गाएं दान कीं. परंतु राजा को एक विचित्र सनक थी.

उसके राज्य में वैदिक विधि के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से भक्तिभाव और पूजा-पाठ की अनुमति न थी. ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य कोई भी पूजा-पाठ में भगवान को प्रसन्न करने के लिए संगीत का प्रयोग नहीं कर सकता था.

बस शूद्रों और महिलों के लिए इसकी छूट थी. जो भी कीर्तन करता, भजन गाता पकड़ा जाता उसे कड़ा दंड़ मिलता. राजा भुवनेश के राज में हरिमित्र नाम के एक विष्णुभक्त ब्राह्मण थे.हमेशा भगवत प्रेम में डूबे रहते और प्रभु की प्रशंसा में गीत रचते और गाते रहते थे. भगवान विष्णु की मूर्ति देखते ही हरिमित्र बावले हो जाते. झूम-झूम कर गाते जाते. उनके गीत दूर-दूर तक सुनाई पड़ने लगे.

इसकी शिकायत राजा से किसी ने कर दी. अपने बनाए नियम को टूटता देख वह बौखला गया. उसने हरिमित्र को खूब पिटवाया. उनका सारा धन छीनकर घर को नष्ट करके राज्य से निकाल दिया.

कुछ बरसों बाद धर्मात्मा राजा भुवनेश मरकर स्वर्ग पहुंच गया. स्वर्ग में भुवनेश को सम्मान तो मिला पर कुछ ही देर बाद उनकी अंतड़ियां जलने लगीं. राजा यमराज के पास पहुंचे और पूछा- स्वर्ग में तो भूख प्यास लगती नहीं फिर मेरी अंतड़ियां कैसे जल रही हैं?

धर्मराज बोले- तुमसे एक घोर पाप हुआ है, तुमने एक भगवत प्रेमी की संगीत साधना भ्रष्ट की थी. संगीत से चिढ के कारण तुम्हारे यज्ञ के पुण्य का बड़ा भाग तो पहले ही नष्ट हो गए थे. अब संचित पुण्य नहीं हैं जिससे तुम स्वर्ग में रह सको.अब तुम्हें धरती पर पहाड़ की अंधेरी गुफा में उल्लू बनकर रहना होगा, अपने ही शरीर का मांस नोच-नोच कर खाना होगा. इस मन्वंतर के बीतने तक तुम घोर नरक में पड़े रहोगे. बाद में कुत्ते की योनि मिलेगी.

यमराज का इतना कहना था कि भुवनेश गुफा में उल्लू बन कर आ गिरा. गुफा में आते ही राजा भुवनेश का शव भी उसके सामने आ गिरा. उल्लू बना राजा भुवनेश भूख से बैचेन होकर अपनी ही लाश देखकर सोच में पड़ गया.

उल्लू अपने ही लाश खाने के लिए बढा ही था कि ठीक इसी समय उधर से एक चमचमाता सुनहरा विमान गुजरा. इस विमान पर हरिमित्र सवार थे. श्रीविष्णु के दूत उन्हें सम्मान सहित स्वर्ग ले जा रहे थे.

संत हरिमित्र ने राजा भुवनेश की लाश पहचान ली. एक उल्लू उसे खाने जा रहा था यह दुर्गति देख उनको राजा पर दया आई. विमान को रुकवा दिया और करीब जा पहुंचे.हरिमित्र ने उल्लू को डांट कर पूछा कि तुम राजा भुवनेश का शव कैसे खाने जा रहे थे. उल्लू फूट-फूट कर रोने लगा. उसने सारी कहानी बताई. तुम्हारी दुर्गति करने से मेरा यह हाल हुआ. मेरे सारे पुण्य बर्बाद हो गये. अब अपना ही शरीर खाने को मजबूर हूं.

हरिमित्र बड़े दयालु थे. बोले- मैंने तुम्हें हर तरह से माफ किया. यह सब नरक अब तुम्हें नहीं भोगना होगा और कुत्ता भी न बनोगे. अपने प्रसाद से मैं तुम्हें गानयोग देता हूं अब तुम गा-गाकर भगवान विष्णु को प्रसन्न करो.

हरिमित्र के ऐसा कहकर जाने के बाद ही सब कुछ बदल गया. सारे नरक समाप्त हो गए. राजा भुवनेश्वर को गान योग मिल गया था जिसकी सहायता से वे भगवान विष्णु की स्तुति कर विष्णुलोक को प्राप्त हुए. (स्रोत: लिंग पुराण)

संकलनः सीमा श्रीवास्तव

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