विश्वामित्र ने त्रिशंकु के लिए रचा नया स्वर्ग, स्वर्ग को सहारा देने के लिए बनाया स्तंभः नारियल के फल व वृक्ष की कथा

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंराजा सत्यव्रत प्रतापी राजा थे. सत्यव्रत धर्मनिष्ठ थे. उन्होंने सभी यज्ञ किए थे. प्रजा भी धर्मनिष्ठ थी. परंतु दैवयोग से सत्यव्रत जैसे धर्मनिष्ठ के मन में एक विचित्र इच्छा पैदा हो गई.
सत्यव्रत ने ऋषियों से स्वर्ग का वर्णन सुना तो वह उसकी कल्पना में लीन रहने लगे. उनकी इच्छा हुआ कि स्वर्ग लोग उनके सुगम रहे. जब इच्छा करे वह स्वर्गलोक में जाकर भ्रमण कर सकें और जब चाहें पृथ्वी पर आ जाएं.
स्वर्गलोक पृथ्वीवासियों के ऐसा सुलभ तो है नहीं. सत्यव्रत यह बात जानते थे फिर भी मन तो चंचल होता ही है. एक बार ऋषि विश्वामित्र ने कहीं दूर-दराज क्षेत्र में समाधि लगाई और लम्बे समय से वापस नहीं आ पाए.
विश्वामित्र जब साधना में लीन थे उसी काल में भयंकर सूखा पड़ा. विश्वामित्र का परिवार अन्न-जल की तलाश में भटक रहा था, तभी राजा सत्यव्रत से भेंट हो गई. सत्यव्रत ने ऋषि की अनुपस्थिति में उनके परिवार की पूरी जिम्मेदारी ली.
जब विश्वामित्र वापस लौटे तो उन्हें परिवार वालों ने राजा के उपकार की बात बताई. विश्वामित्र सत्यव्रत के पास आए और इस उपकार के बदले एक वरदान मांगने को कहा.सत्यव्रत को यही उचित अवसर लगा अपनी इच्छा पूरी करने का. राजा ने कहा- मेरी स्वर्गलोक में सशरीर जाने की इच्छा है. क्या आप अपनी शक्तियों से मेरे लिए स्वर्ग जाने का मार्ग बना सकते हैं?
विश्वामित्र ने वचन दिया तो पूरा करने में जुटे. उन्होंने स्वर्ग के लिए वैकल्पिक मार्ग बनाने का काम शुरू कर दिया जिससे सत्यव्रत को सशरीर स्वर्ग भेजा जा सके. विश्वामित्र ने स्वर्ग की सीढ़ी भी तैयार कर ली.
इंद्र आदि देवताओं को चिंता हुई कि यदि स्वर्ग के लिए बनी सीढ़ी से मनुष्य सशरीर स्वर्ग आने लगा तो विधि की व्यवस्था बिगड़ जाएगी. उन्होंने विश्वामित्र के सामने भी अपनी चिंता रखी.
विश्वामित्र ने कहा- इंद्र आप स्वर्ग को लेकर इतने आशंकित क्यों हैं? यदि विचरण के लिए कोई मनुष्य आता है तो वह आपका क्या बिगाड़ेगा. आपकी चिंता है कि आपके मनोरंजन में विघ्न पड़ेगा. देवराज को ऐशो-आराम में नहीं डूबे रहना चाहिए.
विश्वामित्र के साथ देवताओं की काफी बहस हुई लेकिन विश्वामित्र माने नहीं. उन्होंने सत्यव्रत को उस सीढ़ी से स्वर्गलोक तक पहुंचाने का प्रबंध कर दिया. सत्यव्रत ने स्वर्ग में पहला ही कदम रखा था कि इन्द्र ने उन्हें नीचे धकेल दिया.
राजा धरती पर गिर गए और जाकर ऋषि विश्वामित्र को रोते-रोते सारी घटना का वर्णन करने लगे. देवताओं के इस व्यवहार से विश्वामित्र भी क्रोधित हो गए. अंत में स्वर्गलोक के देवताओं ने वार्तालाप करके आपसी सहमति से एक हल निकाला.इसके मुताबिक राजा सत्यव्रत के लिए अलग से एक स्वर्गलोक का निर्माण करने का आदेश दिया गया. नया स्वर्गलोक पृथ्वी एवं वास्तविक स्वर्गलोक के मध्य में स्थित हो ताकि ना ही राजा को कोई परेशानी हो और ना ही देवी-देवताओं को.
सत्यव्रत भी इस सुझाव से बेहद प्रसन्न हुए, किन्तु ना जाने ऋषि विश्वामित्र को एक चिंता ने घेरा हुआ था. उन्हें यह चिंता सता रही थी कि कहीं धरती और स्वर्गलोक के बीच होने के कारण हवा के ज़ोर से यह नया स्वर्गलोक डगमगा ना जाए.
यदि ऐसा हुआ तो राजा फिर से धरती पर आ गिरेंगे. इसका हल निकालते हुए ऋषि विश्वामित्र ने नए स्वर्गलोक के ठीक नीचे एक स्तंभ का निर्माण किया जिसके सहारे पर नए लोक को टिकाया जाना था.
माना जाता है कि वही खम्बा समय आने पर एक पेड़ के मोटे तने के रूप में बदल गया और सत्यव्रत का सिर एक फल बन गया. इसी पेड़ के तने को नारियल का पेड़ और राजा के सिर को नारियल कहा जाने लगा.
सत्यव्रत को स्वर्ग भेजने की कई कोशिशें की विश्वामित्र ने की पर उन्हें वहां से गिरा दिया जाता. इससे उनका नाम त्रिशंकु पड़ गया जो स्वर्ग और पृथ्वी लोक के बीच में भटकते रहे. ये कथा बहुत विस्तृत है हम इसे शृंखलारूप में जल्द ही सुनाएंगे.
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