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श्रीहरि-लक्ष्मी ने अश्वरूप में दिया पुत्र को जन्मः पुत्र पर जगदंबा की कृपा, दत्तात्रेय का वरदान- कौन थे सहस्त्रबाहु के पूर्वज?

श्रीहरि-लक्ष्मी ने अश्वरूप में दिया पुत्र को जन्मः पुत्र पर जगदंबा की कृपा, दत्तात्रेय का वरदान- कौन थे सहस्त्रबाहु के पूर्वज?

prabhusharnam laxmi Vishnu
श्रीकृष्ण के सभी स्वरूप कल्याणकारी हैं. उनके चमत्कारिक स्वरूपों के दुर्लभ मन्त्रों, भागवत महापुराण व अन्य पुराणों में वर्णित कृष्ण लीलाएं, संपूर्ण गीता ज्ञान के लिए डाउनलोड करें “कृष्ण लीला” एंड्राइड एप्प.

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंभगवान विष्णु के क्रोधित होकर शाप देने से माता लक्ष्मी घोड़ी बन गईं. यह श्रीहरि की माया थी. लक्ष्मीजी ने शिवजी का घोर तप किया. शिवजी ने प्रसन्न होकर उनकी मुक्ति का मार्ग बताया.

शिवजी के वरदान से श्रीहरि-लक्ष्मीजी को एक वीर पुत्र जन्मा जिसका नाम एकवीर पड़ा. श्रीहरि ने उस पुत्र को अपने भक्त राजा हरिवर्मा को सौंप दिया. यहां तक आपने पिछली कथा (श्रीहरि के शाप से घोड़ी बनी….पढ़ने के लिए क्लिक करें) में पढ़ा. अब आगे.

एकवीर श्रीहरि और लक्ष्मीजी का अंश था इसलिए उसमें रूप-गुण के साथ-साथ अद्भुत पराक्रम भी था. शिवजी के वरदान से उसका जन्म हुआ था इसलिए वह शिवगणों और असुरों द्वारा अविजीत था.

एकवीर ने राजा बनने के बाद बहुत कुशलतापूर्वक शासन आरंभ किया. उसकी प्रजा अत्यंत प्रसन्न थी. एकवीर के पड़ोसी राजा थे- रैभ्य. रैभ्य भी कुशल राजा थे और उनकी भी बड़ी ख्याति थी.राजा रैभ्य संतानहीन थे. उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराया. यज्ञ के पुण्य से रैभ्य की पत्नी रानी रूक्मरेखा गर्भवती हुईं और समय आने एक उन्होंने एक परम सुंदर कन्या को जन्म दिया.

कन्या स्वर्ग के अप्सराओं के सौदंर्य को झुठलाने वाली थी. उसके जैसी कोई कन्या थी ही नहीं इसलिए उसका नाम रखा गया- एकावली. एकावली इतनी सुंदर और गुणी थी कि उसकी तुलना चंद्रमा की कलाओं से होती थी.

एकबार एकावली अपनी प्रिय सखी यशोवती के साथ गंगास्नान को गई. उसी समय कालकेतु नामक दैत्य उधर से गुजरा. कालकेतु ने गंधर्वों को परास्त किया था. देवता भी उससे नहीं उलझते थे.

कालकेतु ने एकावली को देखा तो उसे देखता ही रह गया. मोहित कालकेतु ने एकावली का उसकी सखी यशोवती के साथ ही हरण कर लिया. यशोवती माता जगदंबा की बड़ी भक्त थी. उसने जगदंबा के बीज मंत्र की साधना कर रखी थी.

कालकेतु के कारावास में उसने बीजमंत्रों का जप आरंभ कर दिया. यशोवती के एक महीने तक निरंतर साधना से देवी ने उसे स्वप्न में दर्शन दिया और मुक्ति का मार्ग सुझाया.

देवी ने कहा- कल तुम्हारे लिए बंदीगृह से निकलकर गंगातट पर जाने का मार्ग खुला मिलेगा. वहां तुम्हारी भेंट राजा एकवीर से होगी. वह मेरा भक्त है. तुम उसे जाकर स्वप्न की बात कहो. एकवीर कालकेतु का वध करके एकावली से विवाह करेगा.स्वप्न में दर्शन देकर देवी अंतर्धान हो गईं. कालकेतु के सैनिक भगवती की माया से भ्रमित हो गए तो यशोवती गंगा किनारे पहुंच गई. वहां राजा एकवीर शिकार के बाद विश्राम कर रहे थे. उसने देवी के निर्देश पर एकवीर को सारी बात सुना दी.

तभी भगवती की माया से भगवान दत्तात्रेय वहां पधारे. यशोवती ने एकवीर को परामर्श दिया कि वह भगवान दत्तात्रेय से भगवती के महामंत्र की दीक्षा ले लें. इससे असुरों के संहार में शक्ति मिलेगी.

दत्तात्रेयजी ने एकवीर को भगवती के गुप्त महामंत्र की दीक्षा दी. इस महामंत्र को त्रिलोकी का तिलक कहा जाता है. इस महामंत्र से एकबीर को सबकुछ जानने और कहीं भी पहुंच जाने की शक्ति प्राप्त हो गई.

भगवती के नाम का उदघोष करता हुआ एकबीर सेना सहित कालकेतु पर आक्रमण के लिए चल पड़ा. कालकेतु अपनी सेना लेकर एकबीर से लड़ने आया. दोनों में भीषण युद्ध हुआ. दोनों दिव्यास्त्रों के ज्ञाता थे.

एकबीर ने रौद्ररूप धरकर युद्ध आरंभ किया तो दैत्यसेना आतंकित होकर भागने लगी. कालकेतु सेना को समेटने में उलझा था कि एकबीर तलवार लेकर उसके रथ पर कूदा.इससे पहले कि कालकेतु कुछ समझकर सावधान हो पाता, एकबीर ने तलवार के भरपूर प्रहार से उसकी गर्दन ही उड़ा दी. राजा के मरते ही दैत्य सेना भाग खड़ी हुई. एकबीर की सेना ने उसका दूर तक पीछा करके बहुत संहार किया.

राज्य जीतने के बाद एकबीर ने एकावली को मुक्त कराया. यशोवती और एकावली को लेकर वह राजा रैभ्य के राज्य पहुंचा. राजा रैभ्य ने उसके पराक्रम की बात सुनी तो बहुत प्रसन्न हुए और एकावली के साथ एकबीर का विवाह करा दिया.

एकबीर और एकावली की संतान हुई जिसका नाम पड़ा कृतवीर्य. कृतवीर्य इतना पराक्रमी था कि इंद्र ने कई युद्धों में उसकी सहायता मांगी और स्वयं उसकी अगवानी करने आते थे.

इसी कृतवीर्य के पुत्र थे कार्तवीर्य अर्जुन जिसे सहस्त्रबाहु के नाम से भी जाना जाता है. उससे हैहय वंश शुरू हुआ जिसका नाश परशुराम ने किया था.

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