श्री दुर्गा सप्तशती सातवां अध्याय: चण्ड और मुण्ड वध
श्री दुर्गा सप्तशती सातवां अध्याय: चण्ड और मुण्ड वध
श्री दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय में मां काली के प्राकट्य और महादैत्य चण्ड-मुण्ड के वध की अत्यंत ओजस्वी कथा वर्णित है।
श्री दुर्गा सप्तशती छठा अध्याय
महर्षि मेधा द्वारा कथा का वर्णन
महर्षि मेधा ने कहा— दैत्यराज शुम्भ और निशुम्भ की आज्ञा पाकर चण्ड और मुण्ड अपनी चतुरंगिनी सेना और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर देवी से युद्ध करने के लिए चल दिए। हिमालय पर्वत पर पहुँचकर उन्होंने सिंह पर सवार, मंद-मंद मुस्कराती हुई जगदम्बा को देखा।
जब असुर तलवारें तानकर उन्हें बंदी बनाने के लिए आगे बढ़े, तब भगवती अम्बिका को उन पर भीषण क्रोध आया। अत्यधिक क्रोध के कारण उनका मुखमंडल काला पड़ गया और उनकी भृकुटियाँ तन गईं। उसी समय उनके ललाट से अत्यंत विकराल, विस्तृत मुख और रक्तिम नेत्रों वाली मां काली प्रकट हुईं।
मां काली का संहारक रूप
मां काली अपने हाथों में तलवार और पाश लिए हुए थीं। वे विचित्र खड्ग धारण किए, चीते के चर्म की साड़ी और नरमुण्डों की माला पहने हुए थीं। उनका मांस सूखा हुआ था, शरीर केवल अस्थि-पंजर के समान प्रतीत हो रहा था और वे अपने भयंकर गर्जन से सम्पूर्ण दिशाओं को गुंजायमान कर रही थीं।
वे क्षण भर में असुर सेना पर टूट पड़ीं और दैत्यों का संहार करने लगीं।
वे पार्श्व रक्षकों, अंकुशधारी महावतों, हाथियों पर सवार योद्धाओं और घंटासहित हाथियों को एक-एक हाथ से पकड़कर मुख में डालने लगीं।
घोड़ों, रथों, सारथियों और सैनिकों को मुख में डालकर भयानक वेग से चबाने लगीं। किसी असुर के केश पकड़कर, किसी को पैरों तले कुचलकर तो किसी को छाती से मसलकर समाप्त कर दिया। दैत्यों द्वारा छोड़े गए बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्रों को वे मुख में पकड़कर दांतों से चूर्ण करने लगीं।
इस प्रकार भगवती काली ने क्षण भर में शुम्भ-निशुम्भ की विशाल सेना का संहार कर दिया।
चण्ड और मुण्ड का वध
अपनी सेना का विध्वंस देख महापराक्रमी चण्ड देवी काली की ओर झपटा और मुण्ड ने भी बाणों व हजारों चक्रों की वर्षा शुरू कर दी। वे चमचमाते बाण और चक्र मां काली के मुख में ऐसे समा रहे थे, मानो मेघों की घटा में अनेक सूर्य विलीन हो रहे हों।
इसके बाद देवी काली ने प्रचंड गर्जना करते हुए विकट अट्टहास किया। हाथ में तलवार लेकर उन्होंने हुंकार भरी और चण्ड के केश पकड़कर एक ही झटके में उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया।
चण्ड को धराशायी देख मुण्ड क्रोध से भरकर देवी पर टूट पड़ा, परंतु महाकाली ने अपनी तीक्ष्ण तलवार के एक ही प्रहार से उसे भी यमलोक पहुंचा दिया। अपने सेनापतियों का वध होते देख बची हुई असुर सेना प्राण बचाकर भाग खड़ी हुई।
मां काली बनीं चामुण्डा
चण्ड और मुण्ड के कटे हुए सिरों को लेकर काली भगवती चण्डिका के पास पहुँचीं और भीषण अट्टहास करते हुए बोलीं— “हे देवी! मैंने चण्ड और मुण्ड नामक दो महादैत्यों को मारकर आपको भेंट कर दिया है। अब महाबली शुम्भ और निशुम्भ का वध आपको स्वयं संग्राम में करना है।”
महर्षि मेधा ने कहा— चण्ड और मुण्ड के कटे सिरों को देखकर कल्याणमयी देवी चण्डी ने अत्यंत मधुर वाणी में काली से कहा—
“हे देवी! तुमने चण्ड और मुण्ड दोनों को मारकर मुझे समर्पित किया है, इसलिए संसार में तुम्हारी ख्याति ‘चामुण्डा’ के नाम से होगी।”
(इस प्रकार श्री दुर्गा सप्तशती का सातवां अध्याय समाप्त हुआ।)
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