भगत के वश में हैं भगवान-सदना जी की विभोर करने वाली कथा

भगत के वश में हैं भगवान-सदना जी की विभोर करने वाली कथा

भगवान जगन्नाथ के प्रिय भक्त सदना कसाई की प्रेरक कथा

भक्त की लालसा होती है कि भगवान प्रसन्न होकर दर्शन दें। वह भेंट अर्पित करता है, भंडारे कराता है, जागरण कराता है, दान-पुण्य करता है। पर क्या भगवान केवल इन्हीं बातों से रीझते हैं?

संतों और भक्तों की कथाएँ बताती हैं कि भगवान के लिए सबसे बड़ा धन भक्त का निर्मल हृदय है। भक्ति में दिखावा नहीं, भाव चाहिए। यही कारण है कि कभी शबरी के जूठे बेर प्रभु को प्रिय लगते हैं, कभी विदुरानी के केले के छिलके, और कभी एक कसाई का प्रेम भगवान को अपने भक्त के पक्ष में खड़ा कर देता है।

भक्त सदना कसाई की कथा हमें यही अद्भुत सत्य बताती है। यह कथा केवल एक भक्त की नहीं, बल्कि भक्ति की महिमा, कर्मफल के रहस्य और भगवान की करुणा की कथा है।

सदना में भगवान जगन्नाथ ने कसाई नहीं, भक्त देखा
सदना में भगवान जगन्नाथ ने कसाई नहीं, भक्त देखा

सदना कसाई और शालिग्राम भगवान की अद्भुत लीला

काशी में एक ब्राह्मण रहते थे। एक दिन उनके सामने से एक गाय जान बचाकर भागती हुई एक गली में घुस गई। उसी समय एक व्यक्ति वहाँ पहुँचा और गाय के बारे में पूछने लगा।

ब्राह्मण उस समय जप में लीन थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा, केवल हाथ के संकेत से उस गली की ओर इशारा कर दिया जहाँ गाय गई थी।

ब्राह्मण यह नहीं जानते थे कि वह व्यक्ति कसाई है और गाय उसके चंगुल से बचकर भागी थी। संकेत मिलते ही कसाई ने गाय को पकड़ लिया और उसका वध कर दिया।

अनजाने में हुए इस कर्म के कारण उस ब्राह्मण को अगले जन्म में कसाई के घर जन्म लेना पड़ा। उनका नाम पड़ा—सदना।

हालाँकि पूर्वजन्म के पुण्य संस्कार उनके साथ थे। इसलिए कसाई का काम करते हुए भी उनका मन भगवान की भक्ति में लगा रहता था। वे दिनभर भगवान का नाम गुनगुनाते रहते और अपने कार्य को करते जाते।

एक दिन उन्हें मार्ग में एक सुंदर गोलाकार पत्थर मिला। उन्होंने उसे उठाकर रख लिया और दुकान पर मांस तौलने के लिए बाट की तरह उपयोग करने लगे।

उन्हें क्या पता था कि वह साधारण पत्थर नहीं, स्वयं शालिग्राम भगवान हैं। वही शालिग्राम, जिनकी वे पूर्वजन्म में श्रद्धा से पूजा किया करते थे।

सदना जब भी भगवान का भजन करते, उनकी वाणी में ऐसा प्रेम होता कि मानो भगवान स्वयं उस प्रेम में झूम उठते हों। जिस शालिग्राम को संसार पूजाघर में रखने योग्य समझता था, वही शालिग्राम भक्त के प्रेम से प्रसन्न होकर कसाई की दुकान में भी आनंदपूर्वक विराजमान थे।

एक दिन एक विद्वान ब्राह्मण की दृष्टि उस बाट पर पड़ी। वे चौंक उठे। उन्होंने पहचान लिया कि यह तो शालिग्राम भगवान हैं।

वे क्रोधित होकर बोले—

“अरे मूर्ख! जिन्हें पत्थर समझकर मांस तौल रहा है, वे स्वयं शालिग्राम भगवान हैं।”

ब्राह्मण शालिग्राम को अपने घर ले आए। उन्होंने गंगाजल से स्नान कराया, धूप-दीप दिखाया, चंदन लगाया और बड़े विधि-विधान से पूजा की।

रात्रि में भगवान ने उन्हें स्वप्न दिया।

भगवान बोले—

“मुझे वहीं वापस छोड़ आओ जहाँ से लाए हो।”

ब्राह्मण विस्मित रह गए। उन्होंने कहा—

“प्रभु! वहाँ तो मांस की दुकान है। वह स्थान आपके योग्य कैसे हो सकता है?”

भगवान ने कहा—

“तुम स्थान देखते हो, मैं भाव देखता हूँ।

सदना जब मुझे तराजू में रखता है तो मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरा भक्त मुझे प्रेम से झूला झुला रहा हो। वह दिनभर मेरा नाम गाता है। उसकी भक्ति में जो प्रेम है, वही मुझे प्रिय है। मुझे वापस मेरे भक्त के पास छोड़ आओ।”

अगले दिन ब्राह्मण शालिग्राम भगवान को लेकर सदना के पास पहुँचे।

See also  शुभकर्म व्यर्थ नहीं जानतेः कौन थे राजा दशरथ और कैकेयी?

जब सदना को ज्ञात हुआ कि जिनका वे बाट की तरह उपयोग करते रहे, वे स्वयं शालिग्राम भगवान हैं, तो वे पश्चाताप से भर उठे। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

उन्होंने निश्चय किया कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर उनसे क्षमा माँगेंगे।

सदना की परीक्षा और भगवान जगन्नाथ की कृपा

सदना भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए यात्रा पर निकल पड़े।

कुछ समय तक वे यात्रियों के एक समूह के साथ चलते रहे। एक दिन लोगों को पता चला कि सदना जीविका के लिए कसाई का कार्य करते हैं। यह सुनते ही लोगों का व्यवहार बदल गया।

जो लोग पहले साथ चलते थे, वे दूरी बनाने लगे। कोई उनके साथ भोजन नहीं करता था, कोई उनके पास बैठना नहीं चाहता था।

सदना ने किसी से शिकायत नहीं की। वे अकेले ही भगवान का नाम लेते हुए आगे बढ़ते रहे।

एक दिन यात्रा के दौरान उन्हें प्यास लगी। एक गाँव में कुएँ के पास वे पानी पीने रुके। वहाँ एक स्त्री पानी भर रही थी। उसने सदना को देखा और उन पर मोहित हो गई।

उसने आग्रह किया कि रात अधिक हो चुकी है, इसलिए वे उसके घर में विश्राम कर लें। सदना ने इसे सामान्य आतिथ्य समझकर स्वीकार कर लिया।

रात्रि में वह स्त्री उनके पास आई और अनुचित प्रस्ताव रखा। सदना ने उसे धर्म का स्मरण कराते हुए स्पष्ट मना कर दिया।

कामांध स्त्री क्रोधित हो गई। उसने अपने ही सोए हुए पति की हत्या कर दी और फिर रोते-चिल्लाते हुए लोगों को बुला लिया।

उसने आरोप लगाया कि सदना ने उसके पति की हत्या की है।

गाँव वालों ने सदना को पकड़ लिया और न्यायाधीश के सामने प्रस्तुत किया।

न्यायाधीश को विश्वास नहीं हो रहा था कि यह व्यक्ति हत्यारा हो सकता है। उन्होंने बार-बार सच्चाई पूछी।

पर सदना मौन रहे।

वे सोचते थे कि यदि वे उस गाँव में न आते तो यह घटना न होती। वे इसे भी अपने कर्मों का परिणाम मानकर सहने को तैयार थे।

अंततः राजा ने उन्हें मृत्युदंड के स्थान पर हाथ काटने का दंड दिया।

See also  भक्त-भगवान की स्नेह कथा,आंखें छलछला आएंगी.

सदना ने बिना विरोध किए अपना दाहिना हाथ कटवा लिया और फिर भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए आगे बढ़ते रहे।

जब वे जगन्नाथपुरी के निकट पहुँचे, तब भगवान ने अपने सेवक राजा को आदेश दिया—

“मेरा प्रिय भक्त आ रहा है। उसकी अगवानी करो।”

राजा गाजे-बाजे के साथ स्वागत के लिए पहुँचा, लेकिन सदना ने विनम्रतापूर्वक यह सम्मान स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

तभी भगवान जगन्नाथ ने उन्हें दर्शन दिए।

भगवान बोले—

“पूर्व जन्म में तुम वही ब्राह्मण थे जिसके संकेत से गाय की मृत्यु हुई थी। वही गाय इस जन्म में उस स्त्री के रूप में जन्मी थी। जिस व्यक्ति की उसने हत्या की, वह वही कसाई था जिसने पिछले जन्म में उसका वध किया था।

तुम्हारे कर्मों का शेष ऋण आज समाप्त हो गया है।”

फिर भगवान ने प्रेम से कहा—

“लोगों ने तुम्हारे पेशे को देखा, मैंने तुम्हारे हृदय को देखा।

तुमने विपरीत परिस्थितियों में भी मेरा स्मरण नहीं छोड़ा। संसार तुम्हें कसाई कहता रहा, पर मैं तुम्हें अपना भक्त मानता हूँ।”

भगवान के श्रीचरणों में पहुँचकर सदना का जीवन धन्य हो गया। प्रभु की कृपा से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

कथा का संदेश

संसार ने सदना को कसाई समझा, भगवान ने भक्त देखा।

लोगों ने उसके हाथ का काम देखा, प्रभु ने उसके हृदय का प्रेम देखा।

भक्त सदना कसाई की कथा हमें सिखाती है कि भगवान बाहरी आडंबर, जाति, कुल, धन और प्रतिष्ठा से प्रभावित नहीं होते। वे केवल भाव देखते हैं।

See also  भगवान जगन्नाथ रथयात्रा की पौराणिक कथा जो आपने न सुनी होगी
See also  कर्म का फल कर्मकांड से नहीं बदलता
See also  कर्मों का फल

सच्ची भक्ति वही है जिसमें मनुष्य सुख-दुःख, मान-अपमान और अनुकूलता-प्रतिकूलता में भी भगवान का स्मरण न छोड़े।

यह कथा कर्मफल के अटल नियम की भी याद दिलाती है। मनुष्य अपने कर्मों से बच नहीं सकता, लेकिन सच्ची भक्ति उसे भगवान की कृपा का पात्र अवश्य बना देती है।

यदि हृदय में प्रेम हो, स्मरण में भगवान हों और जीवन में विनम्रता हो, तो प्रभु को पाने का मार्ग दूर नहीं रहता। सदना कसाई की कथा इसी सनातन सत्य का सुंदर उदाहरण है।

संकलन: राजन प्रकाश

यदि यह प्रेरणादायक कहानी आपको पसंद आई हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य साझा करें। हो सकता है कि यह किसी को अपना अधूरा सपना फिर से शुरू करने की प्रेरणा दे।

Prabhu Sharnam ऐप पर ऐसी सैकड़ों प्रेरणादायक कहानियाँ, आध्यात्मिक प्रसंग, धार्मिक कथाएँ और जीवन को नई दिशा देने वाली सामग्री उपलब्ध है।

Prabhu Sharnam के पोस्ट WhatsApp से प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारा नंबर 9871507036 अपने मोबाइल में प्रभु शरणम् के नाम से सेव कर लें और हमें एक मैसेज भेजें SEND.

जल्द ही आपको व्हॉट्सऐप पर भी पोस्ट मिलने लगेंगे.