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हर तरह के भय से मुक्तकर आत्मविश्वास बढ़ाता है श्रीविष्णु कवचः बृहस्पतिवार को विशेष फलदायी

हर तरह के भय से मुक्तकर आत्मविश्वास बढ़ाता है श्रीविष्णु कवचः बृहस्पतिवार को विशेष फलदायी

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंजीवन में बहुत सी ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जिनको याद करके आप व्यथित हो जाते हैं. आपका आत्मबल गिर जाता है और आप उसे किसी को बता भी नहीं पाते.

श्रीविष्णु का इस कवच का पाठ आरंभ करें. आपमें आत्मबल का संचार होगा और उस परेशानी का सामना करने की क्षमता आएगी.

जो लोग निरपराध हैं फिर भी राजदंड का भय (जेल जाने का भय) हो, शत्रु का भय हो या किसी बुरी शक्ति द्वारा पीड़ित हो जाने का भय हो उनके लिए भी बहुत कारगर है श्री विष्णु का यह कवच.

वामन पुराड़ और गरूड़ पुराण में वर्णित यह कवच देवों तक का भय दूर करने वाला है. यदि आपमें किसी कारणवश आत्मबल की कमी आ गई हो तो इसका पाठ आरंभ करें, आपके आत्मबल में निश्चित ही वृद्धि होगी.

गुरुवार श्रीहरि का दिन है इसलिए इसका आरंभ यदि गुरुवार से करें तो विशेष फलदायी है.।।श्रीविष्णुपञ्जर स्तोत्रम्।।

नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्।
प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गत:।।1

(हे गोविंद! आपको नमस्कार है. आप अपना सुदर्शन चक्र धारण करें और पूर्व दिशा से मुझ शरणागत की रक्षा करें.)

गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभामितेद्युते।
याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गत:।।2

हे पद्ममाभ! अपने हाथों में कौमोदकी गदा धारण करें और मुझ शरणागत की दक्षिण दिशा से रक्षा करें.)

हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम।
प्रतीच्यां रक्ष मे विष्णो त्वामहं शरणं गत:।।3

हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है. हाथों में सौनन्द हल लेकर पश्चिम दिशा से मुझ शरणागत की रक्षा करें)

मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्।
उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गत:।।4

हे पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है. हाथों में शातन मुसल धारणकर जगन्नाथ आप उत्तर दिशा से मेरी रक्षा करें.शारंगमादाय च धनुरस्त्रं नारायणं हरे।
नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ऐशान्यां शरणं गत:।।5

हे नारायण! आपको नमस्कार है. हाथों में शारंग धनुष धारण कर हे रक्षोघ्न आप ईशान कोण(उत्तर-पूर्व) से मुझ शरणागत की रक्षा करें.

पाञ्चजन्यं महाशंखम् अन्तर्बोध्यम् च पङ्कजम्।
प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेयर्या यज्ञसूकर।।6

हे वराह अवतार प्रभु! आपको नमस्कार है. पांचजञ्य महाशंख और पद्म अस्त्र को धारण कर हे विष्णु आप आग्नेय कोण से मुझ शरणागत की रक्षा करें.

चर्म सूर्यशतं गृह्यं खड्गं चन्द्रमसं तथा।
नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्त्ते नृकेसरिन्।।7

(हे भगवान नरसिंह! आपको नमस्कार है. आप सूर्य और चंद्रमा के समान प्रकाशवान हैं. हाथों में अपना चर्म खड्ग धारण कर आप नैऋत्य कोण से मुझ शरणागत की रक्षा करें.)

वैजयन्तीं प्रगृह्य त्वं श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्।
वायव्यां रक्ष मां देव हयग्रीव नमोस्तुते।।8

(हे हयग्रीव अवतार! आपको नमस्कार है. आप हाथों में बैजयतीं माला और गले में श्रीवत्स कंठाहार से सुशोभित होकर वायव्य कोण से मुझ शरणागत की रक्षा करें.)वैनतेयं समारुह्य त्वन्तरिक्षे जनार्दन।
मां त्वं रक्षाजित सदा नमस्ते त्वपराजित।।9

(हे जनार्दन! आपको नमस्कार है. आप विनीतापुत्र गरूड़ पर सवार होकर अंतरिक्ष से मुझ शरणागत की रक्षा करें.)

विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले।
अकूपार नमस्तुभ्यं महामोह नमोस्तु ते।।10

(हे विशालाक्ष! आपको नमस्कार है. भवसागर से पार लगाने वाले हे महामीन, आप रसातल में स्थित होकर मुझ शरणागत की रक्षा करें.)

करशीर्षांगम् द्यङ्गलीषु तथा अष्टबाहु पञ्जरम्।
कृत्वा रक्षस्व मां देव नमस्ते पुरुषोत्तम।।11

(हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है. हे सत्य, आप कवच बनकर मेरी भुजा, हाथ, सिर और उगलियों की रक्षा करें.)

।।इति श्री वामनपुराणोक्तम् विष्णुपञ्जरस्तोत्रम्।।

संकलनः डॉ.नीरज त्रिवेदी
ज्योतिषाचार्य, पीएचडी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय

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