देवों ने क्यों ली थी हनुमानजी की परीक्षा
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।माता सीता की खोज में विभिन्न दिशाओं में वानर वीरों की टोली निकली. दक्षिण दिशा का प्रदेश वानरों के लिए सर्वाधिक अपिरिचित था. इसलिए उस दिशा में राजकुमार अंगद के नेतृत्व में हनुमानजी, जाम्वन्तजी, नल-नील आदि वीरों की टोली निकली.
इस टोली को एक स्थान पर जटायु के भाई गिद्धराज संपाति दिख गए. संपाति और वानरसेना के बीच वार्तालाप का प्रसंग अद्भुत है. इसे पहले भी सुना चुका हूं पर हनुमानभक्तों को इसमें इतना रस आता है कि वे बार-बार अनुरोध करते हैं.
संपाति के प्रसंग को आगे सुनाउंगा अभी देवताओं द्वारा हनुमानजी की परीक्षा के प्रसंग को ही बढ़ाते हैं.
संपाति ने बताया कि रावण देवी सीता को सुमद्र पार स्थित लंका ले गया है. रावण की माया और उसकी शक्तियों के बारे में संपाति को जितना पता था सब उन्होंने बता दिया.
संपाति ने लंका की दिशा और रावण के महल की जानकारी भी दी. पर लंकापुरी तो वहां से 100 योजन दूर थी सुमद्र के पार थी.
वानर वीर इस बात को लेकर चिंता करने लगे कि ऐसे विशाल समुद्र को आखिर लांघा कैसे जाए! बिना इसे पार किए लंका पहुंचना संभव नहीं.
जब तक स्वयं माता सीता के लंका में देखकर आश्वस्त न हो लें तब तक कैसे प्रभु श्रीराम को इस पर चढ़ाई के लिए कह सकते हैं.
अंगद सभी वीरों से उनकी छलांग लगाने की क्षमता की पूछताछ करने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
नल ने कहा कि वह 30 योजन तक की छलांग लगा सकते हैं. नील 50 योजन तक की छलांग लगाने में समर्थ थे. रीक्षराज जामवंतजी ने बताया कि वह 90 योजन तक की छलांग लगा सकते हैं.
अंगद ने कहा- मैं 100 योजन तक छलांग लगाकर समुद्र पार तो कर लूंगा, लेकिन लौट पाऊंगा कि नहीं, इसमें संशय है. बिना लौटे तो बात बनने वाली नहीं थी.
सब अपनी छलांग के सामर्थ्य पर बात कर रहे थे पर पवनपुत्र चुप रह गए. वह कुछ बोले ही नहीं. सबने उनकी ओर देखा.
जामवंतजी को याद आ गया कि हनुमानजी तो शापित हैं. उन्हें उनकी क्षमता तो तभी याद आएगी जब इसका स्मरण कराया जाए.
जामवंतजी बोले- का चुपि साध रहा बलवाना. हनुमानजी आप पवनसुत हैं. पवनदेव की गति से उड़़ सकते हैं. आपके लिए संसार में कुछ भी असंभ ही नहीं.
जामवंत हनुमानजी को उनके पराक्रम का स्मरण कराने लगे. जामवंत बोले- हनुमानजी आपने बचपन में छलांग लगाकर आकाश में स्थित सूर्य को पकड़ लिया था, फिर 100 योजन का समुद्र क्या है?
यह समुद्र तो आपके लिए बिलकुल वैसा ही जैसे कोई बालक अपनी कंदुक यानि गेंद को हवा में उछालने के बाद तपककर पकड़ ले. ऐसे अनेर समुद्र लांघ जाना आपके लिए बालसुलभ क्रीडा है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
जामवंतजी द्वारा अपनी शक्तियों का स्मरण कराए जाने के बाद हनुमानजी सभी वीरों के साथ अभिवादन का आदान-प्रदान करके प्रभु श्रीराम का नाम लेकर रामकाज के लिए समुद्र लांघने के उड़ चले.
उन्हें पवन वेग से लंका की ओर बढ़ता देख देवताओं ने सोचा कि यह रावण जैसे बलशाली की नगरी में जा रहे हैं. रावण शक्तिशाली होने के साथ-साथ बड़ा मायावी भी है.
वहां शक्ति के साथ बुद्धि कौशल की भी आवश्यकता होगी इसलिए हनुमानजी बल-बुद्धि की विशेष परीक्षा करनी आवश्यक है.
देवगण समुद्र में निवास करने वाली नागों की माता सुरसा के पास गए. सुरसा उनकी भी माता जैसी ही थीं कि नाग और देवगण कश्यप की ही संतान हैं.
उन्होंने माता सुरसा से विनती कि आप बजरंग बली के बल-बुद्धि की परीक्षा लें. सुरसा ने रामकाज में अपना योगदान देने के लिए इसे सहर्ष स्वीकार लिया.
वह हनुमानजी की परीक्षा लेने के लिए चल पड़ी. उन्होंने राक्षसी का रूप धारण किया और हनुमानजी के सामने जा खड़ी हुई.
सुरसा ने हनुमानजी से कहा- सागर के इस भाग से जो भी जीव गुजरे मैं उसे खा सकती हूं. देवताओं ने मेरे आहार की ऐसी ही व्यवस्था की है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
आज देवताओं ने मेरे आहार के रूप में तुम्हें भेजा है. तुम्हारे जैसे बलिष्ठ और विशाल जीव को भेजा है. आज तो भरपेट आहार मिला है. मैं तुम्हें खा जाउंगी.
ऐसा कहकर सुरसा ने हनुमानजी को दबोचना चाहा.
हनुमानजी ने कहा-माता! इस समय मैं श्रीराम के कार्य से जा रहा हूँ. कार्य पूरा करके मुझे लौट आने दो. उसके बाद मैं स्वयं ही आकर तुम्हारे मुँह में समा जाऊंगा.
हनुमानजी ने सुरसा से बहुत विनती की लेकिन वह मानने को तैयार न थी. हनुमान ने अपना आकार कई सौ गुना बढ़ाकर सुरसा से कहा- लो मुझे अपना आहार बनाओ.
सुरसा ने भी अपना मुंह खोला तो वह हनुमानजी के आकार से बड़ा हो गया. हनुमानजी जितना आकार बढ़ाते, सुरसा उससे बड़ा मुंह कर लेती.
हनुमानजी समझ गए कि ऐसे तो बात नहीं बनने वाली. उन्होंने अचानक अपना आकार बहुत छोटा किया और सुरसा के मुँह में प्रवेश करके तुरंत बाहर आ गए.
सुरसा बजरंगबली की इस चतुराई से प्रसन्न हो गई. वह अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुईं और हनुमानजी को आशीर्वाद देकर उनकी सफलता की कामना की.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
समुद्र ने रामभक्त को बिना विश्राम लगातार उड़ते देखा तो उसने अपने भीतर रहने वाले मैनाक पर्वत से कहा कि थोड़ी देर के लिए ऊपर उठ जाए ताकि उसकी चोटी पर बैठकर हनुमानजी थकान दूर कर लें.
समुद्र के आदेश से प्रसन्न मैनाक रामभक्त की सेवा का पुण्य कमाने के लिए हनुमानजी के पास गया अपनी सुंदर चोटी पर विश्राम का निवेदन किया.
हनुमानजी मैनाक से बोले-श्रीराम का कार्य पूरा किए बिना विश्राम करने का कोई प्रश्र ही नहीं उठता. उन्होंने मैनाक को हाथ से छूकर प्रणाम किया और आगे चल दिए.
लंका पहुंचते ही हनुमानजी का सामना लंका की रक्षक लंकिनी से हुआ. सुंदरकांड के ये सब प्रसंग भक्ति रस से सराबोर हैं.
सुंदरकांड में हनुमानजी की अपरिमित शक्तियों का वर्णण है और वे प्रभु के संकटमोचक बनते हैं.
कहते हैं जिस व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में सुंदरकांड का एक बार भी पाठ न किया हो उसे तब तक मुक्ति नहीं मिलती जब तक वह इसे सुन न ले.
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