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संसर्ग के समय विष्णुद्रोही ने भूल से कर लिया नारायण मंत्र का पाठ, जन्मा भक्त प्रह्लाद

संसर्ग के समय विष्णुद्रोही ने भूल से कर लिया नारायण मंत्र का पाठ, जन्मा भक्त प्रह्लाद

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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.आज भगवान नृसिंहजी की जयंती है. भगवान श्रीहरि ने असुर हिरण्यकश्यपु का उद्धार करने के लिए लिया था यह क्रोध अवतार. यदि आप किसी तांत्रिक शक्ति की चपेट में आ गए हैं, आप पर कोई ऊपरी शक्ति प्रभावा हो रही है तो आपको भगवान नृसिंह की आराधना करनी चाहिए.

भगवान नृसिंह की आराधना से आसुरी शक्तियों का नाश होता है और मनुष्य में बल, बुद्धि, अन्याय से लड़ने की शक्ति, साहस और पराक्रम आता है. नृसिंह जयंती पर तो सूर्यास्त तक व्रत का भी विधान है.

यदि किसी कारण आप व्रत नहीं कर पाते तो भी मन में भगवान नृसिंह की छवि का ध्यान कर उनकी मानसिक पूजा कर सकते हैं. इस श्लोक से उनका ध्यान कर उनसे सभी प्रकार की गलतियों के लिए क्षमा मांगे और प्रार्थना करें कि हे प्रभु हम आपकी छत्रछाया में हैं. हमारी सदा रक्षा करें.

भगवान नृसिंह ने प्रह्लाद को एक कल्प के लिए राजा बनाकर कहा था कि तुम मेरी महिमा का श्रवण करते रहना और उसका ध्यान करते रहना, तम्हें किसी से भय न होगा. इसलिए आज के दिन भगवान नृसिंह की कथा जरूर सुननी और सुनानी चाहिए.

मैं आपको भगवान नृसिंह के चार पुुत्रों में से सबसे छोटे पुत्र प्रहलाद की कथा सुना रहा हूं कि आखिर असुर कुल में जन्मने के बाद भी वह कैसे इतने बड़े नारायणभक्त हो गए.

कथा आरंभ करने से पहले आपके लिए भगवान नृसिंह का स्तुति मंत्र इसे पढ़कर भगवान को प्रणाम करें और फिर कथा स्वयं सुनें औरों को भी सुनाएं. आज के जमाने में इसका सबसे अच्छा तरीका है कि कथा को अपने फेसबुक पर शेयर कर दें. न जाने कितने लोगों तक यह स्वयं पहुंच जाएगी.

भगवान को मानस प्रणाम करते हुए निम्न मंत्र से ध्यान करें.

श्रीनृसिंह मंत्रः

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥

(हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, आपकी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है. हे नरसिंहदेव, आपका मुख सर्वव्यापी है, आप मृत्यु के भी यम हैं और मैं आपके समक्ष आत्मसमर्पण करता हूँ। मेरी सब विधि से रक्षा करें.)

अब कथा आरंभ करते हैं-

कहां हिरण्यकश्यपु जो नारायण का कट्टर शत्रु था और कहां उसका पुत्र जो नारायण का ऐसा भक्त कि उसकी रक्षा के लिए भगवान प्रकट हो गए थे.

यह बात बहुत हैरान करने वाली है न!आखिर ऐसा कैसे हुआ!

पौराणिक काल की बात है एक बार सहस्रणीकजी के मन में यह जानने की इच्छा हुई कि हिरण्यकश्यपु जैसे विष्णुद्रोही के घर में प्रह्लाद जैसा विष्णु उपासक कैसे पैदा हुआ. उन्होंने श्री मार्कण्डेयजी से इस संदर्भ में अपनी इच्छा प्रकट की.

मार्कण्डेयजी ने उन्हें एक कथा सुनानी शुरू की- सहस्रणीक, दिति और कश्यप का पुत्र हिरण्यकश्यप बहुत बलशाली दैत्य था. एक समय ऐसा भी था कि त्रिभुवन ही उसके अधीन कहा जाने लगा.

अपार शक्तियां पाकर उसमें बड़ा घमंड़ आ गया. उसे अपनी शक्तियों से संतोष न था. वह और अधिक शक्तियां अर्जित करने की सोचने लगा.

उसने निर्णय लिया कि इसके लिए वह तप करके ब्रह्माजी को प्रसन्न कर वरदान मांगेगा. उसने ऐसा घोर तप करना आरंभ किया कि धरती कांपने लगी.

धरती ऐसे तपस्वी के ताप को संभालने में असमर्थ पा रही थी. पृथ्वी विचलित हुई तो भूकंप आ गया. पशु-पक्षी, जीव-जंतु भयभीत हो उठे और पूरी प्रकृति में ही हड़कंप मच गया.

हिरण्यकश्यप के दरबारी, बंधु, मित्र, भृत्य भी उसके पास पहुंचे और उसे सुझाया कि हे देव इस तप को रोक दीजिए. तीनों लोक आप के अधीन हैं. सारे देवताओं को आपने जीत रखा है.

आपको किसी का न तो भय है न ही कोई अन्य समस्या. सृष्टि का सारा ऐश्वर्य आपके अधीन है. आपकी कृपा पर ही अन्य जीव आश्रित हैं. आपको अब और क्या चाहिए?

आपके इस तप पर जाने से पूर्व आग लगने और भूकंप आने जैसे अपशकुन भी हो रहे हैं. आपके अपने हितैषी असुरों का भी कल्याण नहीं हो रहा है.हिरण्यकश्यपु के सेवकों ने कहा- इस तप का कोई अर्थ नहीं है स्वामी क्योंकि तप तो उनके लिए है जिनकी कोई आकांक्षा पूर्ण न हुई हो. आपके आगे तो सभी नतमस्तक हैं. अपने कुल के सेवकों के कल्याण के लिए तप का त्याग कर दें.

हिरण्यकश्यप में अहंकार बहुत था. उसने तो हठ कर ही लिया था कि वह स्वयं देवताओं के रूप में समस्त हविष आदि भी ग्रहण करेगा. उसने किसी की न मानी.

अपने बंधु बांधवों की बात ठुकराकर दो-तीन घनिष्ठ मित्रों को अपनी सुरक्षा मैं तैनात कर उसने तप जारी रखा. तप के लिए उसने ना स्थान चुना कैलास पर्वत.

वह कैलाश के शिखर पर पहुंचा और अपनी घोर तपस्या आरंभ कर दी. तप के कुछ ही बरस बीते होंगे कि स्वयं ब्रह्माजी भी अत्यंत चिंतित हो उठे.

उन्होंने सोचा कि यह दैत्य यदि इसी तरह दुष्कर तपस्या करता रहा तो सभी देवता इसके अधीन हो जाएंगे. फिर यह दुर्बुद्धि उन सबकी शक्तियों का नाजायज प्रयोग करेगा.

अपनी बनाई सृष्टि की व्यवस्था पर ब्रह्माजी को संकट घिरता दिख रहा था.

उन्हें चिंता हुई कि कैसे हिरण्यकश्यपु को इस कठिन तप से अलग किया जाए. वह इसी चिंता में व्याकुल थे तभी उन्हीं देवर्षि नारद दिखे.नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा- आप व्यर्थ ही व्यथित हैं. जो भगवान विष्णु पर आश्रित है उसको किसी प्रकार की चिंता नहीं करनी चाहिए. भगवान विष्णु मुझे कोई न कोई प्रेरणा देंगे और मैं इस नारायणद्रोही दैत्य की तपस्या भंग करुंगा.

इतनी कथा सुनाने के बाद मार्कंण्डेयजी बोले- नारदजी ने ब्रह्माजी को भरोसा दिलाकार उनकी चिंता कम की और फिर अपने साथ पर्वत मुनि को लेकर वहां से आगे चल दिए.

नारदजी का विश्वास ऐसे ही नहीं था. भगवान श्रीहरि की प्रेरणा से नारदजी को एक सुंदर युक्ति सूझी.

नारदजी और पर्वत मुनि दोनों ही रूप बदलने की विद्या के सिद्धहस्त हैं. दोनों ने पक्षी का रूप लिया और कैलाश शिखर के उस क्षेत्र में पहुंचे जहां हिरण्यकश्यप अपने दो तीन दैत्य मित्रों की सुरक्षा में तप कर रहा था.

जहां दैत्यराज तप कर रहा था कैलाश के उस भाग में बहुत सघन वृक्ष थे. पक्षी रूप धरकर दोनों मुनि वृक्ष की दो आमने-सामने की डाल पर बैठ गए.

दोनों मुनियों ने कलविंक पक्षी की आवाज में बड़ी ही गंभीर वाणी में “ऊं नमो नारायणाय मंत्र” का तीन बार जप किया.दोनों ने बड़े ही स्पष्ट स्वर में नारायण मंत्र का जप किया था. पर्वत के शिखर से टकराकर उनकी आवाज गूंजने लगी. बार-बार नारायण मंत्र वहां सुनाई देने लगा.

यह सुनकर हिरण्यकश्यप बेचैन हो उठा. नारायण द्रोही के कानों में नारायण मंत्र के स्वर पड़े तो उसकी एकाग्रता भंग हो गयी.

वह तो नारायण नाम के उच्चारण तक से चिढ़ता था और उच्चारण करने वाले के वध को तत्पर रहता था.

क्रोध में आग-बबूले हिरणाकश्यप ने सोचा मेरा कोई शत्रु यहां आ पहुंचा है, संभवतः स्वयं नारायण ही यहां हैं. उसने तप छोड़ दिया और शत्रु को खोजने लगा.

नारदजी और पर्वत मुनि को सफलता मिलती दिखी. दोनों ने फिर से नारायण मंत्र का उच्चारण किया.

अब तो असुरराज के क्रोध की सीमा ही न रही. उसने देखा कि सामने वृक्ष पर बैठे दो पक्षी ही नारायण मंत्र का उच्चारण कर रहे हैं. उसने धनुष पर तीर चढ़ाकर उन पर निशाना लगाया.

दोनों ही मुनि पहले से ही सचेत थे. उसे धनुष उठाता देखा तो वे उडकर कहीं और चले. बदहवास हिरण्यकश्यप उनके पीछे मारने के लिए दौड़ा. दोनों ने अपने सिद्धिबल का प्रयोग किया और वहां से लुप्त हो गए.दैत्यराज का तप भंग हो चुका था. वह निराश था और उसने महल लौटने का निश्चय किया. वह समझ चुका था कि किसी ने छल से उसका व्रत भंग करवा दिया है.

उसकी अब तक की सारी मेहनत पर पानी फिर गया है. वह तत्काल अपने नगर को चल दिया. दैत्यराज हिरण्यकश्यपु अपने नगर पहुंचा.

उसकी पत्नी कयाधु ऋतुमति थी. लंबे अंतराल बाद हिरण्यकश्यप और कयाधु का मिलन हुआ था. मिलन के क्षणों में कयाधु ने पति हिरण्यकश्यप से एक प्रश्न पूछ लिया.

कयाधु ने पूछा- आपने जाते समय कहा था कि आपका तप दस हजार वर्ष तक चलेगा. पर आपने बीच में ही तपस्या का त्याग कर दिया. व्रत के त्यागने का कारण मैं आपसे प्रेमपूर्वक पूछ रही हूं. कृपया सच-सच बतलायें.

हिरण्यकश्यपु ने संगम में रत रहते हुए अनमने मन से कयाधु को उत्तर दिया- प्रिये मेरा तप अपने पूर्णता की ओर अग्रसर था लेकिन उन पक्षियों ने मेरा ध्यान बंटाने के लिए “ऊं नमो नारायणाय”, “ऊं नमो नारायणाय” का उच्चारण शुरू कर दिया.

दोनों पक्षी बार-बार नारायण मंत्र का जप करते थे. नारायण नाम के बार-बार श्रवण से मेरे तप में विघ्न पड़ने लगा.

मुझे नारायण से घृणा है और मेरे कानों में ऊं नमो नारायणाय की स्पष्ट ध्वनि साफ पड़ रही थी. इससे मेरा व्रत टूट गया.

मुझे आशंका हुई कि कहीं तुम्हारे साथ कुछ अशुभ न हुआ हो इसलिए मैं शीघ्र ही यहां आ गया.मार्कंण्डेयजी ने बताया- हे सहस्रणीक. जब हिरण्यकश्यप पत्नी को यह विवरण सुना रहा था तब उसका प्रेम परिणति के समीप था. दैवयोग से वह स्वयं ऊं नमो नारायणाय, ऊं नमो नारायणाय जपते हुए ही स्खलित हुआ.

तो सहस्रणीक इस प्रसंग के बाद जब कयाधु गर्भवती हुई तो उससे जो बालक पैदा हुआ वह जन्मजात नारायण का अन्नय भक्त हुआ क्योंकि उसके बीज पड़ते समय उसके पिता ने अंजाने में ही नारायण नाम लिया था.

सह्स्त्रणीक यह नारायण की ही लीला थी कि संसार के सबसे बड़े नारायण द्रोही के घर में सबसे बड़े नारायण भक्त का जन्म हुआ. दैत्यराज होकर भी वह मलिन कर्मों से दूर निर्मल भाव से रहता हुआ महान विष्णु भक्त प्रह्लाद बना.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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