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भक्त बडे़ कि भगवान, श्रीहरि का नारद को सुंदर ज्ञान

भक्त बडे़ कि भगवान, श्रीहरि का नारद को सुंदर ज्ञान

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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.एक बार नारदजी के मन में एक विचित्र सा कौतूहल पैदा हुआ. वैसे नारदजी के साथ विचित्र घटनाएं होती ही रहती हैं. उन्हें यह जानने की धुन सवार हुई कि ब्रह्मांड में सबसे बड़ा और महान कौन है?

नारदजी ने अपनी जिज्ञासा भगवान विष्णु के सामने ही रख दीं. भगवान विष्णु मुस्कुराने लगे. फिर बोले- नारदजी सब पृथ्वी पर टिका है. इसलिए पृथ्वी को बड़ा कह सकते हैं. परंतु नारदजी यहां भी एक शंका है.

स्वयं नारायण अपने उत्तर के साथ ही परंतु लगा रहे हैं. नारदजी का कौतूहल शांत होने की बजाय और बढ़ गया. नारदजी ने पूछा- स्वयं आप सशंकित हैं फिर तो विषय गंभीर है. कैसी शंका है प्रभु?

विष्णुजी बोले- समुद्र ने पृथ्वी को घेर रखा है इसलिए समुद्र उससे भी बड़ा है. अब नारदजी बोले- प्रभु आप कहते हैं तो मान लेता हूं कि समुद्र सबसे बड़ा है.

यह सुनकर विष्णुजी ने एक बात और छेड़ दी- परंतु नारदजी समुद्र को अगस्त्य मुनि ने पी लिया था इसलिए समुद्र कैसे बड़ा हो सकता है? बड़े तो फिर अगस्त्य मुनि ही बड़े हुए.

नारदजी के माथे पर बल पड़ गया.फिर भी उन्होंने कहा- प्रभु आप कहते हैं तो अब अगस्त्य मुनि को ही बड़ा मान लेता हूं.

नारदजी अभी इस बात को स्वीकारने के लिए तैयार हुए ही थे कि विष्णुजी ने नई बात कहकर उनके मन को चंचल कर दिया.

श्रीविष्णुजी बोले- नारदजी पर ये भी तो सोचिए वह रहते कहां हैं. आकाशमंडल में एक सूई की नोक बराबर स्थान पर जुगनू की तरह दिखते हैं. फिर वह कैसे बड़े, बड़ा तो आकाश को होना चाहिए.

नारदजी बोले- हां प्रभु आप यह बात तो सही कह रहे हैं. आकाश के सामने अगस्त्य ऋषि का तो अस्तित्व ही विलीन हो जाता है. आकाश ने ही तो सारी सृष्टि को घेर आच्छादित कर रखा है. आकाश ही श्रेष्ठ और सबसे बड़ा है.

भगवान विष्णुजी ने नारदजी को थोड़ा और भ्रमित करने की सोची.श्रीहरि बोल पड़े- पर नारदजी आप एक बात भूल रहे हैं. वामन अवतार ने इस आकाश को एक ही पग में नाप लिया था. फिर आकाश से विराट तो वामन हुए.

नारदजी ने श्रीहरि के चरण पकड़ लिए और बोवे- भगवन आप ही तो वामन अवतार में थे. फिर आपने सोलह कलाएं भी धारण कीं और वामन से बड़े स्वरूप में भी आए. इसलिए यह तो निश्चय हो गया कि सबसे बडे आप ही हैं.

भगवान विष्णु ने कहा- नारद, मैं विराट स्वरूप धारण करने के उपरांत भी अपने भक्तों के छोटे से हृदय में विराजमान हूं. वही निवास करता हूं. जहां मुझे स्थान मिल जाए वह स्थान सबसे बड़ा हुआ न!

इसलिए सर्वोपरि और सबसे महान तो मेरे वे भक्त हैं जो शुद्ध हृदय से मेरी उपासना करके मुझे अपने हृदय में धारण कर लेते हैं. उनसे विस्तृत और कौन हो सकता है. तुम भी मेरे सच्चे भक्त हो इसलिए वास्तव में तुम सबसे बड़े और महान हो.

श्रीहरि की बात सुनकर नारदजी के नेत्र भर आए. उन्हें संसार को नचाने वाले भगवान के हृदय की विशालता को देखकर आनंद भी हुआ और अपनी बुद्धि के लिए खेद भी.नारदजी ने कहा- प्रभु संसार को धारण करने वाले आप स्वयं खुद को भक्तों से छोटा मानते हैं फिर भक्तगण क्यों यह छोटे-बड़े का भेद करते हैं. मुझे अपनी अज्ञानता पर दुख है. मैं आगे से कभी भी छोटे-बड़े के फेर में नहीं पडूंगा.

यह कहानी मैंने आपको क्यों सुनाई, यह बताऊंगा नहीं क्योंकि कई बार कथा के पीछे का रहस्य श्रोता के सोचने के लिए छोड़ना ही उचित होता है क्योंकि श्रोता या पाठक की बुद्धि लेखक और कथाकार से बड़ी होती है. वह उचित अर्थ निकाल लेता है और वही श्रेष्ठ है.

इसीलिए तो कहते हैं- भगत के वश में हैं भगवान. भक्त अपनी निष्काम भक्ति से भगवान को वश में कर लेता है. तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोरा इसी भाव में रहिए तो त्रिलोक के स्वामी आपके पास आकर बस जाने को लालायित रहेंगे.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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